लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३३६) चौ ।६।३।१३७॥ लुप्ताकारनकारेऽञ्चतौ परे पूर्वस्याणो दीर्घः स्यात् । प्राचः । प्राचा । प्राग्भ्याम् । प्रत्यङ् । प्रत्यञ्चौ । प्रतीचः । प्रत्यग्भ्याम् । उदङ् । उदञ्चौ ॥ अर्थ—लुप्त अकार-नकार वाली 'अञ्चु' धातु पर हो तो पूर्व अण् को दीर्घ आदेश हो । व्याख्या—चौ ।७।१। (यहां 'चु' से लुप्त अकार-नकार वाली 'अञ्चु' धातु का ग्रहण अभिप्रेत है) । पूर्वस्य ।६।१। अणः ।६।१। दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से) । अर्थ—(चौ) लुप्त अकार-नकार वाली 'अञ्चु' धातु के पर होने पर (पूर्वस्य) पूर्व (अणः) अण् के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है । प्र च्+अस् यहां लुप्ताकारनकारवाली 'च्' यह अञ्चु धातु परे है अतः पूर्व अण् अर्थात् 'प्र' के रेफोत्तर अकार को दीर्घ होकर—प्राच्+अस् = 'प्राचः' प्रयोग सिद्ध होता है । इसी प्रकार आगे भी भसंज्ञकों में जान लेना चाहिये । नोट—यद्यपि यहां अचः (३३५) और चौ (३३६) सूत्रों के बिना भी 'प्र अच्+अस्' इस अवस्था में अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ होकर 'प्राचः' प्रयोग सिद्ध हो सकता था तथापि इन सूत्रों की 'प्रतीचः' आदि के लिये परम आव- श्यकता थी अतः यहां भी न्यायवशात् प्रवृत्ति दिखा दी है । 'प्र+अञ्च्' (उत्तमरीति से या पहले चलने वाला अथवा पूर्व के देश, काल, जन आदि) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० प्राङ् प्राञ्चौ प्राञ्चः | प० प्राक् प्राग्भ्याम् प्राग्भ्यः द्वि० प्राञ्चम् ,, प्राचः | ष० ,, प्राचोः प्राचाम् तृ० प्राचा प्राग्भ्याम्* प्राग्भिः | स० प्राचि ,, प्राक्षु† च० प्राचे ,, प्राग्भ्यः | सं० हे प्राङ् ! हे प्राञ्चौ ! हे प्राञ्चः ! *यहां चोः कुः (३०६) की दृष्टि में क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) तथा झलां जशोऽन्ते (६७) दोनों के असिद्ध होने से प्रथम चकार को ककार होकर पुनः झलां जशोऽन्ते (६७) से गकार करने पर 'प्राग्भ्याम्' आदि रूप सिद्ध होते हैं । यहां पर भत्व न होने से अचः (३३५) तथा चौ (३३६) न होंगे, सवर्णदीर्घ हो कर उक्त प्रयोग सिद्ध हो जाते हैं । इसी प्रकार हलादि विभक्तियों में आगे भी प्रक्रिया जाननी चाहिये । †यहां चोः कुः (३०६) द्वारा कुत्व होकर आदेशप्रत्यययोः (१५०) से सकार को षकार हो जाता है । 'प्रति' पूर्वक अञ्चु धातु से ऋत्विग्दधृक्० (२०१) से क्विन्, उस का सर्वा- पहारलोप तथा अनिदितां हलः (३३८) से नकारलोप होकर प्रातिपदिकसञ्ज्ञा करने से सुँ आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं । प्रति अच्+स् (सुँ) । उगिदचां० (२८६) से नुँम् आगम, उँम् अनुबन्ध