भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 459, कुल 633 में से

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पृष्ठ 459

४४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां प्र० उदङ् उदञ्चौ उदञ्चः प० उदीचः उदग्भ्याम् उदग्भ्यः द्वि० उदञ्चम् ,, उदीचः प० ,, उदीचोः उदीचाम् तृ० उदीचा उदग्भ्याम् उदग्भिः स० उदीचि ,, उदक्षु च० उदीचे ,, उदग्भ्यः स० हे उदङ् । उदञ्चौ । उदञ्चः । [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३३८) समः समि ।६।३।९२॥ वप्रत्ययान्तेऽञ्चतौ परे [समः सम्यादादेशः स्यात्] । सम्यङ् । सम्यञ्चौ । समीचः । सम्यग्भ्याम् ॥ अर्थ —वप्रत्ययान्त अञ्चुं धातु परे हो तो सम् को समि आदेश हो। व्याख्या—वप्रत्यय' ।७।१। (विश्वग्देवयोश्च टेरद्रघञ्चतावप्रत्यये मे)। अञ्चतौ ।७।१। (विश्वग्देवयोश्च० से) । समः ।६।१। समि ।१।१। (नपुंसक मे निर्देश किया गया है) । समास —वः प्रत्ययो यस्मात् स वप्रत्ययः । तस्मिन्=वप्रत्यये । बहुव्रीहि- समास । 'व्' से यहाँ क्विन्, क्विप् आदि वकारघटित प्रत्यय अभिप्रेत हैं। अर्थः— (वप्रत्यये) जिस से 'व्' प्रत्यय किया गया हो ऐसे (अञ्चतौ) अञ्चुं धातु के परे होने पर (समः) सम् के स्थान पर (समि) समि आदेश हो जाता है । 'समि' में इकार अनुनासिक नहीं अतः उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) सूत्र से उस की इत्संज्ञा नहीं होती । 'सम्' पूर्वक 'अञ्चुँ' धातु से ऋत्विग्दधृक्० (३०१) द्वारा क्विन्, उस का सर्वापहारलोप तथा अनिदितां हलः ० (३३४) से नकारलोप होकर—'सम् अच्' । अब वप्रत्ययान्त या अप्रत्ययान्त 'अञ्चुँ' परे होने के कारण समः समि (३३८) द्वारा सम् को समि आदेश होकर प्रातिपदिकसंज्ञा करने से सुं आदि की उत्पत्ति होती है— समि अच्+स् । उगिदचां० (२८६) से नुम्, उँम् अनुबन्ध का लोप, सुं- लोप तथा संयोगान्तलोप होकर—'समि अङ्' । क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से नकार को ङकार तथा इको यणचि (१५) से यण् करने पर—'सम्यङ्' प्रयोग सिद्ध होता है । सम्यञ्चौ, सम्यञ्चः —यहाँ पूर्ववत् नुम्, अनुस्वार तथा परसवर्ण जानें । समि अच्+अस् (शस्) । अ्रश्चः (३३५) से अकारलोप तथा चौ (३३६) से पूर्व इकार को दीर्घ करने से—'समीचः' । 'सम्यच्' (ठीक चलने वाला) शब्द की समग्र रूपमाला यथा— १. कई लोग विश्वग्देवयोश्च टेरद्रघञ्चतावप्रत्यये (६ ३ ९१) ऐसा पाठ मान कर समः समि(३३८) सूत्र में 'प्रत्यये' का अनुवर्त्तन करते हैं। तब इस सूत्र का— अविद्यमान-प्रत्ययान्त अञ्चुं धातु के परे होने पर सम् को समि आदेश हो— ऐसा अर्थ होता है । 'अविद्यमान प्रत्यय' से क्विन् क्विप् आदि प्रत्ययों का ही ग्रहण होता है, क्योंकि ये प्रत्यय सर्वापहारलोप के कारण सदा अविद्यमान ही रहते हैं ।

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