भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 463

४४८ भैमोध्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां पूजायाम्—‘उदञ्च्’ (उत्कृष्ट रीति से पूजा करने वाला) प्र० उदङ् उदञ्चौ उदञ्चः प० उदञ्चः उदङ्भ्याम् उदङ्भ्यः द्वि० उदञ्चम् ,, ,, प० ,, उदञ्चो उदञ्चाम् तृ० उदञ्चा उदङ्भ्याम् उदङ्भिः स० उदञ्चि ,, उदङ्क्षु,-क्षु,-पु च० उदञ्चे ,, उदङ्भ्य स० हे उदङ् ! हे उदञ्चौ ! हे उदञ्चः ! नकारलोप न होने से शसादियो मे उद ईत् (३३७) सूत्र प्रवृत्त न होगा। पूजायाम्—‘सम्यञ्च्’ (सम्यग्रीति से पूजा करने वाला) प्र० सम्यङ् सम्यञ्चौ सम्यञ्चः प० सम्यञ्चः सम्यङ्भ्याम् सम्यङ्भ्यः द्वि० सम्यञ्चम् ,, ,, प० ,, सम्यञ्चो सम्यञ्चाम् तृ० सम्यञ्चा सम्यग्भ्याम् सम्यग्भिः स० सम्यञ्चि ,, सम्यङ्क्षु,-क्षु,-पु च० सम्यञ्चे ,, सम्यङ्भ्यः स० हे सम्यङ् ! सम्यञ्चौ ! सम्यञ्चः ! भसंज्ञको मे अकार का लोप तथा दीर्घ न होगा। समः समि (३३८) तो लोप वा अलोप दोनो पक्षों मे सर्वत्र हो ही जाता है। पूजाया—‘सध्र्यञ्च्’ (साथ पूजा करने वाला) प्र० सध्रयङ् सध्रयञ्चौ सध्रयञ्च प० सध्रयञ्च सध्रनङ्भ्याम् सध्रयङ्भ्य द्वि० सध्रयञ्चम् ,, ,, प० ,, सध्रयञ्चो सध्रचञ्चाम् तृ० सध्रयञ्चा सञ्चड्म्याम् सध्रयङ्भि स० सध्रयञ्चि ,, सध्रयङ्क्षु,-क्षु, पु च० सध्रयञ्चे ,, सध्रयङ्भ्य सं० हे सध्रयङ् ! सध्रयञ्चौ ! सध्रयञ्च ! भत्व मे अचः (३३५) से अ का लोप तथा चौ (३३६) से दीर्घ न होगा। ‘सधि’ तो लोप तथा अलोप दोनों मे ही सर्वत्र हो जाता है। पूजाया—‘तिर्यञ्च्’ (विपरीत रीति मे पूजा करने वाला) प्र० तिर्यङ् तिर्यञ्चौ तिर्यञ्च प० तिर्यञ्च तिर्यङ्भ्याम् तिर्यट्ग्य द्वि० तिर्यञ्चम , ,, प० ,, तिर्यञ्चो तिर्यञ्चाम् तृ० तिर्यञ्चा तिर्यट्भ्याम तिर्यग्भि स० निर्यञ्चि ,, तिर्यङ्सु,-क्षु,-पु च० न्त्यञ्चे ,, तिर्यट्ग्य स० हे तिर्यङ् ! हे तिर्यञ्चौ ! हे तिर्यञ्च ! ट्म मे नकारलोप न होने से अचः (३३५) द्वारा अकारलोप कही नही होता, अन तिरसस्तिर्यलोपे (३४०) द्वारा सर्वत्र ‘तिरि’ आदेश हो जाता है। [लघु०] क्रुङ् । क्रुञ्चौ । क्रुङ्भ्याम् ॥ व्याख्या—क्रुञ्च गतिशौटिल्याल्पीभावयो (भ्वा० प०) धातु मे ऋत्विग्दधृक्० (३०१) द्वारा क्विन्-प्रत्यय उसका सर्वापहारलोप तथा अनिदिताम्० (३३४) द्वारा नलोप प्राप्त होने पर नत्वभाव का निपातन करने से ‘क्रुञ्च्’ (क्रौञ्चपक्षी) शब्द निष्पन्न होता है। भाष्यकार के मत मे यह आपद्य धातु है; अत लोप की प्राप्ति ही नही। क्रुञ्च्+स् (सुं) । हल्ङ्यादिलोप तथा संयोगान्तलोप होकर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपाय के अनुसार वकार को नकार हो जाता है—क्रुन् । अब क्विन्प्रत्यय-