लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४४७ अनिदिताम्० (३३४) द्वारा नकारलोप प्राप्त होने पर नाञ्चेः पूजायाम् (३४१) से निषेध कर दिया जाता हैं। अतः गति अर्थ होने पर ही नकार का लोप होता है पूजा अर्थ में नहीं। पीछे 'प्राङ्' से लेकर 'तिर्यङ्' तक सर्वत्र गत्यर्थक अञ्चुं धातु का ही प्रयोग हुआ है। अब पूजा अर्थ में प्रयोग दिखलाते हैं— प्राञ्च्—'प्र' पूर्वक पूजार्थक 'अञ्चुं' धातु से क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, अनिदितां हलः० (३३४) मे उपधाभूत नकार का लोप प्राप्त होने पर—नाञ्चेः पूजा- याम् (३४१) से निषेध, सवर्णदीर्घ हो कर प्रातिपदिक संज्ञा करने से सुं आदि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं। नलोपी अञ्चुं न होने से उगिदचाम्० (२८६) वाला नुंम् भी न होगा। प्राञ्च् + स् । सुंलोप, संयोगान्तलोप तथा क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से नकार को ङकार होकर—प्राङ् । नोट—नकारलोप के निषेध का फल शसादियों में स्पष्ट होता है। सर्वनाम- स्थान तक तो गत्यर्थक और पूजार्थक दोनों अवस्थाओं में प्रक्रियाओं का अन्तर होने पर भी रूप एक समान होते हैं ! पूजायाम्—'प्राञ्च्' (उत्तमरीति से पूजा करने वाला) १ प्र० प्राङ् प्राञ्चौ प्राञ्चः | प० प्राञ्चः प्राङ्भ्याम् प्राङ्भ्यः द्वि० प्राञ्चम् ,, ,, † | ष० ,, प्राञ्चोः प्राञ्चाम् तृ० प्राञ्चा प्राङ्भ्याम् ‡ प्राङ्गिः | स० प्राञ्चि ,, प्राङ्ख्पु,-क्षु,-पु* च० प्राञ्चे ,, प्राङ्भ्यः | सं० हे प्राङ् ! हे प्राञ्चौ ! हे प्राञ्चः ! † 'प्राञ्च् + अस्' यहां नकारलोप न होने से अचः (३३५) द्वारा भसंज्ञक अकार का भी लोप नहीं होता, उस के अर्थ में 'लुप्तनकारस्याञ्चतेः' ऐसा लिख चुके हैं। फिर चौ (३३६) से दीर्घ भी नहीं होता। किन्तु सवर्णदीर्घ होकर कार्यनिष्पत्ति होती है। ‡ 'प्राञ्च् + भ्याम्' यहाँ संयोगान्तलोप होकर क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) द्वारा नकार को ङकार हो जाता है।
- 'प्राञ्च् + सु' यहां संयोगान्तलोप तथा नकार को ङकार हो—ङ्णोः कुक्टुक् शरि (८६) द्वारा विकल्प कर के कुँक् आगम होकर एकपक्ष में चयो द्वितीयाः शरि० (वा० १४) वार्तिक द्वारा ककार को खकार हो जाता है। पुनः दोनों पक्षों में आदेश- प्रत्यययोः (१५०) से षत्व हो जाता है। पूजायाम्—'प्रत्यञ्च्' (विपरीत रीति से पूजा करने वाला) प्र० प्रत्यङ् प्रत्यञ्चौ प्रत्यञ्चः | प० प्रत्यञ्चः प्रत्यङ्भ्याम् प्रत्यङ्भ्यः द्वि० प्रत्यञ्चम् ,, ,, | ष० ,, प्रत्यञ्चोः प्रत्यञ्चाम् तृ० प्रत्यञ्चा प्रत्यङ्भ्याम् प्रत्यङ्गिः | स० प्रत्यञ्चि ,, प्रत्यङ्ख्पु,-क्षु,-पु च० प्रत्यञ्चे ,, प्रत्यङ्भ्यः | सं० हे प्रत्यङ् ! हे प्रत्यञ्चौ ! हे प्रत्यञ्चः ! १. इन शब्दों के पूजा अर्थ में प्रयोग अन्वेष्टव्य हैं।