भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 461

४४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

टेरद्रघञ्चतावप्रत्यये से)। तिरस् ।६।१। तिरि ।१।१। समास —नास्ति लोपो यस्य सोऽलोपस्तस्मिन् = अलोपे । नञ्बहुव्रीहिसमास । यहां लोप से तात्पर्य चो (३३६) द्वारा किये अकारलोप से ही है । अर्थ —(अलोपे) अलुप्त अकार वाली (वप्रत्यये) वप्रत्ययान्त (अञ्चतौ) अञ्चु धातु के परे होने पर (तिरस् ) तिरस् के स्थान पर (तिरि) तिरि आदेश हो जाता है । अञ्चु धातु के अकार का लोप भसञ्ज्ञको में अचः (३३५) सूत्र द्वारा हुआ करता है । अतः भसञ्ज्ञा के अभाव मे ही तिरस् को तिरि यह आदेश होता है । भसञ्ज्ञकों मे 'तिरि' आदेश नही होता । 'तिरस्' पूर्वक 'अञ्चु' धातु से क्विन्, उस का सर्वापहार लोप, नकारलोप, तिरसस्तिर्यलोपे (३४०) से तिरस् के स्थान पर तिरि आदेश होकर—'तिरि अच्' । अब सुँ प्रत्यय आकर नुम् आगम, उम्-लोप, सुँलोप, संयोगान्तलोप तथा क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से कुत्व अर्थात् नकार को ङकारादेश और पुनः इको यणचि (१५) मे यण् होकर 'तिर्यङ्' प्रयोग सिद्ध होता है । 'तिरस् + अच्' (टेढ़ा चलने वाला अर्थात् जो मनुष्य की तरह सीधा खड़ा हो कर नही चलता—पशु पक्षी आदि) की रूपमाला यथा— प्र० तिर्यङ् तिर्यञ्चौ तिर्यञ्चः | प० तिरश्च तिर्यग्भ्याम् तिर्यग्भ्यः द्वि० तिर्यञ्चम् ,, तिरश्च † | ष० ,, तिरश्चोः तिरश्चाम् तृ० तिरश्चा तिर्यग्भ्याम् तिर्यग्भिः | स० तिरश्चि ,, तिर्यक्षु च० तिरश्चे ,, तिर्यग्भ्यः | सं० हे तिर्यङ् ! तिर्यञ्चौ ! तिर्यञ्च ! † तिरस् अच् + अस् । यहां अचः (३३५) सूत्र से अकार का लोप होकर स्तोः श्चुना श्चुः (६२) से श्चुत्व हो जाता है। इसी प्रकार आगे भी भसञ्ज्ञकों मे समझ लेना चाहिये । ध्यान रहे कि इन स्थानो पर 'तिरि' नही होगा, क्योकि यहाँ अकार का लोप है । [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४१) नाञ्चेः पूजायाम् ।६।४।३०॥ पूजार्थस्याञ्चतेरुपधाया नस्य लोपो न । प्राङ् । प्राञ्चौ । नलोपा- भावादल्लोपो न । प्राञ्चः । प्राङ्भ्याम् । प्राङ्क्षु । एवम् पूजार्थे प्रत्यङ्ङा- दयः ॥ अर्थ—पूजार्थक 'अञ्चु' धातु के उपधाभूत नकार का लोप नही होता । व्याख्या—पूजायाम् ।७।१। अञ्चेः ।६।१। उपधायाः ।६।१। (अनिदितां हल उपधायाः से) । न ।६।१। (श्नान्नलोप से, यहां षष्ठी का लुक् हुआ है) । लोपः ।१।१। (श्नान्नलोपः से)। न इत्यव्ययपदम् । अर्थ—(पूजायाम्) पूजा अर्थ मे (अञ्चेः) अञ्चु धातु के (उपधायाः) उपधा के (न = नस्य) नकार का (लोपः) लोप (न) नही होता । अञ्चु धातु के दो अर्थ होते हैं । एक गति और दूसरा पूजा । पूजा अर्थ मे