लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 465, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें(८) निम्नलिखित शब्दों की रूपमाला लिखें— १ क्रुञ्च्, २ अग्निमथ्, ३ सह+अञ्च् (दोनों पक्षों में), ४ तिरस्+ अञ्च् (दोनों पक्षों में) ५ प्रति+अञ्च् (दोनों पक्षों में) । (६) निम्नलिखित सूत्रों की व्याख्या करें— १ अनिदितां हल उपधायाः क्ङिति । २ अचः । ३ घोः । ४ तिरस- स्तिर्यलोपे । ५ उद ईत् । ६ सहस्य सधिः । (यहाँ चकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) ० —— ० अब तकारान्त पुंलिङ्गों का वर्णन करते हैं— [लघु०] उगित्वान्नुम् ॥ व्याख्या—महत् (बड़ा) शब्द वर्तमाने पृषद्-बृहन्महज्जगच् शतृवच्च (उणा० २४१) इस औणादिक सूत्र द्वारा मह् पूजायाम् (भ्वा० प०) धातु से अति प्रत्यय कर निपातित किया गया है और साथ ही इसे शतृ-प्रत्यय के समान आदिष्ट भी किया गया है । शतृ प्रत्यय अन्त्य ऋकार के इत् होने से उगित् है । इस प्रकार महत् शब्द को भी उगित् मान कर उगित्कार्य नुम् आदि हो जायेंगे । महत्+सुं (स्) । शतृवत् अतिदेश के कारण उगित् होने से उगिदचां सर्व- नामस्थानेऽधातोः (२८६) से नुँम् का आगम होकर—मह् नुँम् त्+स्=महन्त्+ स् । अब निम्नस्थ सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधिसूत्रम्—(३४२) सान्त महतः संयोगस्य ।६।४।१०॥ सान्तसंयोगस्य महतश्च यो नकारस्तस्योपधाया दीर्घः स्यादासम्बुद्धौ सर्वनामस्थाने । महान् । महान्तौ । महान्तः । हे महन् ! । महद्भ्याम् ॥ अर्थ —सम्बुद्धिभिन्न सर्वनामस्थान परे होने पर सकारान्त संयोग के तथा महत् शब्द के नकार की उपधा को दीर्घ हो जाता है । व्याख्या—सान्तः ।६।१। (यहाँ षष्ठीविभक्ति का लुक् हुआ है । यह ‘संयोगस्य’ का विशेषण है) । संयोगस्य ।६।१। महत् ।६।१। न ।६।१। (नोपधायाः से । यहाँ षष्ठी का लुक् हुआ है)। उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से ) । दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। असम्बुद्धौ ।७।१। सर्वनामस्थाने ।७।१। (सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ से)। अर्थ — (सान्तः) सकारान्त (संयोगस्य) संयोग के तथा (महतः) महत् शब्द के (न—नस्य) नकार की (उपधायाः) उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ आदेश हो जाता है (असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान परे होने पर । सकारान्त संयोग के नकार की उपधा को दीर्घ करने के उदाहरण आगे—विद्वांसौ, विद्वांसः, यशांसि, मनांसि आदि आएँगे । 'महन्त् +स्' । यहाँ प्रकृतसूत्र से महत् शब्द के अवयव नकार की उपधा— हकारोत्तर अकार को दीर्घ होकर—'महान्त् +स्' । अब सुँलोप तथा संयोगान्तलोप