भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 466

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५१ होकर 'महान्' प्रयोग सिद्ध होता है। संयोर्गान्तलोप के असिद्ध होने से नकार का लोप नहीं होता। 'महत्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० महान् महान्तौ महान्तः | प० महतः महद्भ्याम् महद्भ्यः द्वि० महान्तम् " महतः | ष० " महतोः महताम् तृ० महता महद्भ्याम्‡ महद्भिः | स० महति " महत्सु च० महते " महद्भ्यः | सं० हे महन्*! हे महान्तौ! हे महान्तः! †उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् तथा सान्तमहतः० (३४२) से नकार की उपधा को दीर्घ होकर अनुस्वार (७८) और परसवर्ण (७६) हो जाते हैं। ‡झलां जशोऽन्ते (६७) से तकार को जश्त्व-दकार हो जाता हैं। *उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् होकर सुँलोप तथा संयोगान्तलोप हो जाते हैं। सम्बुद्धि परे होने से सान्तमहतः० (३४२) प्रवृत्त नहीं होता। [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३४३) अत्वसन्तस्य चाधातोः।६।४।१४॥ अत्वन्तस्योपधाया दीर्घो धातुभिन्नाऽसन्तस्य चाऽसम्बुद्धौ सौ परे। धीमान्। धीमन्तौ। धीमन्तः। हे धीमन्! । शसादौ महद्वत्॥ अर्थः—सम्बुद्धि-भिन्न सुँ परे होने पर, 'अतुँ' जिस के अन्त में हो उस की उपधा को दीर्घ होता है एवम् धातु को छोड़कर 'अस्' जिस के अन्त में हो उसकी उपधा को भी दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—अतुँ ।६।१। (यहां षष्ठी का लुक् हुआ है। अङ्गस्य का विशेषण होने से तदन्तविधि होकर 'अत्वन्तस्य' बन जाता है)। असन्तस्य ।६।१। च इत्यव्यय- पदम्। अङ्गस्य ।६।१। (यह अधिकृत है)। उपधायाः ।६।१। (नोपधायाः से)। दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। असम्बुद्धौ ।७।१। (सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ से)। सौ ।७।१। (सौ च से)। अर्थः — (अतु-अन्तस्य) अत्वन्त (अङ्गस्य) अङ्ग की (च) तथा (अधातोः) धातुभिन्न (असन्तस्य) अस् अन्त वाले (अङ्गस्य) अङ्ग की (उपधायाः) उपधा के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ होता है (असम्बुद्धौ) सम्बुद्धिभिन्न (सौ) सुँ परे हो तो। 'अतुँ' से 'मतुँप्, वतुँप्, डवतुँ, क्तवतुँ' आदि प्रत्ययों का ग्रहण होता है। 'अस्- अन्त' का उदाहरण आगे मूल में ही 'वेधाः' आदि पर स्पष्ट हो जायेगा। यहां अत्वन्त का उदाहरण दर्शाया जाता है— धीमत् (बुद्धिमान्)। धीरस्त्यस्येति धीमान्। 'धी' शब्द से तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुँप् (११८१) सूत्र द्वारा मतुँप् प्रत्यय करने पर 'धीमत्' शब्द निष्पन्न होता है। 'धीमत् + सुँ' यहां धीमत् शब्द के अतु + अन्त (मतुँ = म् + अतुँ) होने से प्रथम¹ अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) से उपधादीर्घ होकर—धीमात् + सुँ। पुनः १. ध्यान रहे कि 'धीमत् + सुँ' में अत्वसन्तस्य० (३४३) द्वारा उपधादीर्घ तथा उगिदचाम्० (२८६) से नुँम् आगम युगपत् प्राप्त होते हैं। नुँम् आगम नित्य तथा पर होने पर भी प्रथम नहीं होता। क्योंकि यदि ऐसा किया जाये तो सर्वत्र