भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 467

४५२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां उगिदचां० (२८६) से नुँम् आगम—धीमा न् त्+स् । अब सुँलोप और संयोगान्त- लोप होकर—'धीमान्' प्रयोग सिद्ध होता है। 'धीमत्' की समग्र रूपमाला यथा— प्र० धीमान् धीमन्तौ धीमन्तः प० धीमतः धीमद्भ्याम् धीमद्भ्यः द्वि० धीमन्तम् ,, धीमतः ष० ,, धीमतोः धीमताम् तृ० धीमता धीमद्भ्याम् धीमद्भिः स० धीमति ,, धीमत्सु च० धीमते ,, धीमद्भ्यः स० हे धीमन्*! धीमन्तौ धीमन्तः सम्बुद्धि में अत्वसन्तस्य० (३४३) द्वारा दीर्घ नहीं होता। इसी प्रकार—भगवत्, बुद्धिमत्, धनवत्, मतिमत्, गतवत्, कृतवत् आदि मत्वन्त, वत्वन्त और क्तवत्वन्त शब्दों के रूप होते हैं। [लघु०] भातेर्डवतुं । डित्त्वसामर्थ्यादभस्यापि टेर्लोपः । भवान् । भवन्तौ । भवन्तः । शतृन्तस्य—भवन् ॥ व्याख्या—भवतुँ = भवत् (आप) । भा दीप्तौ (अदा० प०) धातु से भातेर्ड- वतुँ (उणा० ६३) इस औणादिकसूत्र द्वारा 'डवतुँ' प्रत्यय करने में—'भा+डवतुँ'। डवतुँ के अनुबन्धों का लोप कर 'अवत्' शेष रह जाता है—'भा+अवत्'। अब 'भा' की भसञ्ज्ञा न होने पर भी डवतुँ को डित् करने के सामर्थ्य से भकारोत्तर आकार का टेः(२४२) से लोप होकर—'भवत्' शब्द निष्पन्न होता है। भवत्+सु(सुँ) । वत्वन्त होने से अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) से उपधा- दीर्घ, उगिदचां० (२८६) से नुँम् आगम, सुँलोप तथा संयोगान्तलोप करने में 'भवान्' प्रयोग सिद्ध होता है। इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया 'धीमत्' शब्द के समान होती है। रूपमाला यथा— प्र० भवान् भवन्तौ भवन्तः प० भवतः भवद्भ्याम् भवद्भ्यः द्वि० भवन्तम् ,, भवतः ष० ,, भवतोः भवताम् तृ० भवता भवद्भ्याम् भवद्भिः स० भवति ,, भवत्सु घ० भवते ,, भवद्भ्यः स० हे भवन्! भवन्तौ ! भवन्तः *सम्बुद्धि में अत्वसन्तस्य० (३४३) प्रवृत्त नहीं होता। 'भवत्' शब्द 'त्यदाद्यन्तर्गत सर्वनाम है। सर्वनामसञ्ज्ञा का प्रयोजन 'भवद्वान्' आदि में अव्यय सर्वनाम्नाकच् प्राक्टेः (१२२६) द्वारा अकच् प्रत्यय करना है। त्यदादियों का यद्यपि सम्बोधन नहीं होता तथापि ऊपर सम्भावनामूल्य से दर्शाया गया है। भवन् = भवत् (होता हुआ)। भू सत्तायाम् (भ्वा० प०) धातु से लट्, उस के स्थान पर शतृँ प्रत्यय, शतृँ के सार्वधातुक होने से शप् विकरण, गुण, अवादेश तथा अतो गुणे (२७४) से पररूप करने पर 'भवत्' शब्द निष्पन्न होता है। यह 'भवत्' थत्वन्त की उपधा 'न्' ही मिलेगी जिसे दीर्घ नहीं हो सकेगा क्योंकि अचश्च (१२२८) परिभाषा द्वारा ह्रस्व, दीर्घ, प्लुत अचों के स्थान पर ही हुआ करते हैं। अतः वचनसामर्थ्य से प्रथम उपधादीर्घ होकर पश्चात् नुँम् आगम होता है।