लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५३ शब्द शतृ प्रत्ययान्त है। शतृँ प्रत्यय के ऋकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् (२८) से इत्संज्ञा होती है। अतः 'भवत्' शब्द उगित् है। उगित् होने से सर्वनामस्थान में इसे नुँम् का आगम (२८६) हो जायेगा। इस की रूपमाला यथा— प्र० भवन्† भवन्तौ भवन्तः | प० भवतः भवद्भ्याम् भवद्भ्यः द्वि० भवन्तम् ,, भवतः | प० ,, भवतोः भवताम् तृ० भवता भवद्भ्याम् भवद्भिः | स० भवति ,, भवत्सु च० भवते भवद्भ्याम् भवद्भ्यः | सं० हे भवन् ! हे भवन्तौ ! हे भवन्तः ! † यहाँ अत्वन्त न होने से अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) सूत्र से उपधादीर्घ नहीं होता। नुँम्, सुँलोप तथा संयोगान्तलोप पूर्ववत् होते हैं। इसी प्रकार—गच्छत् (जाता हुआ), चलत् (चलता हुआ), पतत् (गिरता हुआ), खादत् (खाता हुआ) प्रभृति शत्रन्त शब्दों के रूप होते हैं। शत्रन्तों का सार्थ वृहत्-संग्रह इस व्याख्या के द्वितीयभागस्थ शतृँप्रकरण में देखें। अब शत्रन्त शब्दों में कुछ विशेष प्रक्रिया वाले शब्द कहे जाते हैं— [लघु०] सञ्ज्ञा-सूत्रम्—(३४४) उभे अभ्यस्तम्¹ ।६।१।५॥ षाष्ठद्वित्वप्रकरणे ये द्वे विहिते ते उभे समुदिते अभ्यस्तसञ्ज्ञे स्तः ॥ अर्थः—षष्ठाध्याय के द्वित्वप्रकरण में द्वित्व से जिन दो शब्दस्वरूपों का विधान होता है वे दोनों समुदित (इकट्ठे न कि पृथक्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक हों। व्याख्या—उभे ।१।२। द्वे ।१।२। (एकाचो द्वे प्रथमस्य से)। अभ्यस्तम् ।१।१। अर्थः—(उभे) समुदित (द्वे) दोनों शब्दस्वरूप (अभ्यस्तम्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक होते हैं। द्वित्व अर्थात् एक शब्द को दो शब्द विधान करने वाले अष्टाध्यायी में दो प्रकरण आते हैं। पहला—छठे अध्याय के प्रथमपाद के प्रथमसूत्र से लेकर बारहवें सूत्र तक। दूसरा अष्टम अध्याय के प्रथमपाद के प्रथमसूत्र से लेकर पन्द्रहवें सूत्र तक। यहां अभ्यस्तसञ्ज्ञा षष्ठाध्याय वाले शब्दस्वरूपों की होती है अष्टमाध्याय वाले शब्द- स्वरूपों की नहीं। इस का कारण यह है कि—अनन्तरस्य विधिर्वा भवति प्रतिषेधो वा (प०) अर्थात् विधि और निषेध समीप पठित के ही होते हैं दूरपठित के नहीं। उभे अभ्यस्तम् (६.१.५) सूत्र छठे अध्याय के द्वित्वप्रकरण में पढ़ा गया है अतः अभ्यस्तसञ्ज्ञा भी छठे अध्याय के द्वित्वप्रकरण में विहित समुदित शब्दस्वरूपों की ही होगी। 'द्वे' पद का अनुवर्त्तन होने पर भी 'उभे' का ग्रहण इस बात को बतलाने के लिये है कि दोनों की इकट्ठी अभ्यस्तसञ्ज्ञा हो प्रत्येक की पृथक् २ न हो। इस से 'नेनिजाति' आदि में अभ्यस्तानामादिः (६.१.१८३) द्वारा प्रत्येक को आद्युदात्त न १. 'उभे+अभ्यस्तम्' में ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम् (५१) द्वारा प्रगृह्यसञ्ज्ञा और प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम् (५०) द्वारा प्रकृतिभाव हो जाने से सन्धि नहीं होती। एवम् वृत्ति में 'ते उभे समुदिते अभ्यस्तसञ्ज्ञे' यहां पर भी सन्ध्यभाव जानना चाहिये।