लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५४ | भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
होकर समुदित का होता है। इस का विशेष विवेचन काशिका और महाभाष्य में देखना चाहिये। ददत् - ददत् (देता हुआ)। दा (डुदाञ् दाने, जुहो० उभ०) धातु से लँट्, उस का शतृँ, शप् प्रत्यय, शप् का श्लु (लोप), श्लु पर होने पर षष्ठाध्यायस्थ श्लौ (६।१।१०) सूत्र से द्वित्व, अभ्यासह्रस्व तथा श्नाभ्यस्तयोरात (६१६) से आकार का लोप होकर ददत् शब्द निष्पन्न होता है। षाष्ठद्वित्वप्रकरणस्थ श्लौ (६।१।१०) सूत्र से द्वित्व होने के कारण 'दद्' की उभे अभ्यस्तम् (३४४) से अभ्यस्तसञ्ज्ञा हो जाती है। अब अग्रिमसूत्र द्वारा अभ्यस्तसञ्ज्ञा का प्रयोजन बतलाते हैं— [लघु०] निषेध सूत्रम्—(३४५) नाभ्यस्ताच्छतुः ।७।१।७८॥ अभ्यस्तात् परस्य शतुर्नुम् न स्यात् । ददत्, ददद् । ददतौ । ददतः ॥ अर्थ —अभ्यस्त से परे शतृँ प्रत्यय को नुँम् का आगम नहीं होता। व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। अभ्यस्तात् ।५।१। शतुः ।६।१। नुम् ।१।१। (इदितो नुम् धातोः से)। अर्थ —(अभ्यस्तात्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक से परे (शतुः) शतृँ का अवयव (नुँम्) नुँम् (न) नहीं होता। ददत्+स् (सुँ)। यहां उगिदचां० (२८६) से प्राप्त नुँम् आगम का नाभ्यस्ताच्छतुः (२४५) से निषेध हो जाता है। अब हल्ङ्याब्भ्यो० (१७६) से सुँ का लोप कर जश्त्व चर्त्व प्रक्रिया से— ददत्, ददद्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार आगे भी सर्वनामस्थानों में नुँम् का निषेध कर लेना चाहिये। इस की रूपमाला यथा— प्र० ददत्,-द् ददतौ ददतः | पं० ददतः ददद्भ्याम् ददद्भ्यः द्वि० ददतम् ददतौ ददतः | ष० " ददतोः ददताम् तृ० ददता ददद्भ्याम्* ददद्भिः | स० ददति " ददत्सु च० ददते " ददद्भ्यः | सं० हे ददत्-द् ! हे ददतौ ! हे ददतः ! *झलां जशोऽन्ते (६७) से तकार को दकार हो जाता है। इसी प्रकार—दधत् (धारण करता हुआ), जुह्वत् (हवन करता हुआ), बिभ्यत् (डरता हुआ), बिभ्रत् (धारण करता हुआ), जहत् (छोड़ता हुआ), जिहि- यत् (शर्माता हुआ) आदि जुहोत्यादिगणीय शत्रन्तों के रूप होते हैं। अब कुछ उन शत्रन्तों का वर्णन करते हैं जिन में नुँम् का निषेध तो अभीष्ट है परन्तु षाष्ठद्वित्व न होने से अभ्यस्तसञ्ज्ञा प्राप्त नहीं। [लघु०] सञ्ज्ञा सूत्रम् —(३४६) जक्षित्यादयः षट् ।६।१।६॥ षड् धातवोऽन्ये जक्षितिश्च सप्तम एतेऽभ्यस्तसञ्ज्ञाः स्युः । जक्षत्, जक्षद् । जक्षतौ । जक्षतः । एवम् जाग्रत्, दरिद्रत्, शासत्, चकासत् ॥ अर्थ —जागृ आदि छ धातु तथा सातवीं 'जक्ष्' धातु अभ्यस्तसञ्ज्ञक हों। व्याख्या—जक्ष् । १।१। इत्यादयः । १।३। षट् । १।३। अभ्यस्तम्