भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 470

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४५५ । १ । १ । (उभे अभ्यस्तम् ने) । समासः—इति (इतिशब्देन जक्ष्परामर्शो भवति) आदिर्येषान्ते = इत्यादयः, अतद्गुणसंविज्ञानबहुव्रीहिसमासः, 'षड्' इतिग्रहणात् । अर्थः— (जक्ष्) जक्ष् धातु तथा (इत्यादयः) जक्ष् से अगली (षट्) छः धातुएं अर्थात् कुल सात धातुएं (अभ्यस्तम्) अभ्यस्तसञ्ज्ञक होती हैं। इन सात धातुओं का सङ्ग्रह एक प्राचीन श्लोक में यथा— जक्षि-जागृ-दरिद्रा-शास्-दीधीङ्-वेवीङ्-चकास्तयः । अभ्यस्तसञ्ज्ञा विज्ञेया धातवो मुनिभाषिताः ॥ १. जक्ष भक्षहसनयोः (अदा० प०) । २. जागृ निद्राक्षये (अदा० प०) । ३. दरिद्रा दुर्गतौ (अदा० प०) । ४. चकासृँ दीप्तौ (अदा० प०) । ५. शासुँ अनु- शिष्टौ (अदा० प०) । ६. दीधीङ् दीप्तिदेवनयोः (अदा० आ०) । ७. वेवीङ् वेतिना तुल्ये (अदा० आ०) । इन सात में पिछली दीधीङ् और वेवीङ् धातुओं का प्रयोग वेद में ही होता है। इन के शत्रन्त रूप क्रमशः यथा—१. जक्षत् = खाता वा हँसता हुआ। २. जाग्रत् = जागता हुआ। ३. दरिद्रत् = दरिद्रता या दुर्गति को प्राप्त होता हुआ। ४. चकासत् = चमकता हुआ। ५. शासत् = शासन करता हुआ। ६. दीध्यत् = क्रीडा करता हुआ। ७. वेव्यत् = गति करता हुआ। इन सातों शत्रन्तों से सर्वनामस्थान परे होने पर उगिदचाम्० (२८६) द्वारा नुँम् आगम प्राप्त था जो अब जक्षित्यादयः षट् (३४६) सूत्र से अभ्यस्तसञ्ज्ञा हो जाने के कारण नाभ्यस्ताच्छतुः (३४५) द्वारा निषिद्ध हो जाता है। उदाहरणार्थ 'जक्षत्' की रूपमाला यथा— प्र० जक्षत्-द्¹ जक्षतौ जक्षतः प० जक्षतः जक्षद्भ्याम् जक्षद्भ्यः द्वि० जक्षतम् ,, ,, प० ,, जक्षतोः जक्षताम् तृ० जक्षता जक्षद्भ्याम् जक्षद्भिः स० जक्षति ,, जक्षत्सु च० जक्षते ,, जक्षद्भ्यः सं० हे जक्षत्-द् ! जक्षतौ ! जक्षतः ! 1 हल्ङ्याब्भ्यः० (१७६), झलां जशोऽन्ते (६७), वाऽवसाने (१४६) । इसी प्रकार अन्य छः शत्रन्तों के रूप बनते हैं। तकारान्त पुंल्लिङ्गों के विषय में विशेष वक्तव्य— तकारान्त पुंल्लिङ्गों को चार श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं— (१) 'महत्' शब्द। सान्तमहतः संयोगस्य (३४२) सूत्र में केवल 'महत्' शब्द का वर्णन होने से यह अपने ढङ्ग का अकेला शब्द है अतः इस के सदृश अन्य किसी तकारान्त पुंल्लिङ्ग का उच्चारण नहीं होता। (२) अत्वन्त शब्द। इस श्रेणी में मत्वन्त, वत्वन्त, क्तवत्वन्त शब्द तथा डवतुंप्रत्ययान्त सर्वनाम 'भवत्' शब्द आता है। मत्वन्तों और क्तवत्वन्तों का बृहत् सङ्ग्रह इस व्याख्या के अपने-अपने प्रकरणों में देखें। (३) शत्रन्त शब्द। इस श्रेणी में अभ्यस्त शत्रन्तों को छोड़कर अन्य सब शत्रन्त शब्द आ जाते हैं।