भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 479, कुल 633 में से

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पृष्ठ 479

४६४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'पिपठिष् + भ्याम्' । यहा भी रुँत्व तथा दीर्घ हो कर —पिपठीर्भ्याम् । 'पिपठिष् + सु' (सुप्)। रुँत्व तथा दीर्घ हो कर—पिपठीर् + सु। अब आदेश- प्रत्यययो (१५०) से षत्व तथा खरवसानयोर्विसर्जनीय (६३) मे विसर्ग आदेश युग- पत् प्राप्त होते हैं । परन्तु षत्व के असिद्ध होने से प्रथम विसर्ग आदेश हो जाता है — पिपठीः सु । पुन वा शरि (१०४) मे विकल्प कर के विसर्ग को विसर्ग और पक्ष में विसर्जनीयस्य स (१०३) से सकार आदेश हो जाना है—१ पिपठीः सु २ पिपठीस्सु । अब इन दोनो रूपो मे क्रमश विसर्ग और सकार का व्यवधान पडने से ईकार—इण् से परे सकार को आदेशप्रत्यययो (१५०) से षत्व प्राप्त नही हो सकता । इस पर षत्व करने के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५२) नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि ।८।३।५८॥ एतै प्रत्येक व्यवधानेऽपि इण्कुभ्या परस्य सस्य मूर्धन्यादेश स्यात् । ष्टुत्वेन पूर्वस्य ष —पिपठीष्षु । पिपठीः षु ।। अर्थ —नुम्, विसर्जनीय और शर् इन मे किसी एक के व्यवधान होने पर भी इण् कवर्ग से परे सकार को मूर्धन्य आदेश हो जाता है । व्याख्या—इण्को ।५।२। (यह अधिकृत है) । नुम्विसर्जनीयशर्व्यवाये ।७।१। अपि इत्यव्ययपदम् । स ।६।१। (सहे साडः स से) । मूर्धन्य ।१।१। (अपदान्तस्य मूर्धन्य ग) । समास —नुम् च विसर्जनीयश्च शर् च=नुम्विसर्जनीयशर, इतरेतर- द्वन्द्व । तेषा व्यवाय (व्यवधानम्) =नुम्विसर्जनीयशर्व्यवाय, तस्मिन्=नुम्विसर्ज- नीयशर्व्यवाये, षष्ठीतत्पुरुष । यहा भाष्यकार ने प्रत्येक का व्यवधान स्वीकार किया है [प्रत्येक व्यवायशब्द परिसमाप्यत इति भाष्यम्] । अर्थ —(इण्को ) इण् प्रत्या- हार अथवा कवर्ग से परे (स ) स् के स्थान पर (मूर्धन्य ) मूर्धन्य आदेश (नुम्विसर्ज- नीयशर्व्यवाये) नुम्, विसर्ग अथवा शर् इन मे से किसी एक का व्यवधान होने पर (अपि) भी हो जाता है । सकार को मूर्धन्य (मूर्धा स्थान वाला) षकार हो जाता है—यह पीछे आदेशप्रत्यययो (१५०) सूत्र पर स्पष्ट कर चुके हैं । 'पिपठीः सु' यहा विसर्ग का व्यवधान तथा 'पिपठीस्सु' यहा शर्-सकार का व्यवधान होने पर भी इण् ईकार से परे दोनों जगह प्रकृतसूत्र से सकार को मूर्धन्य षकार हो जाता है—१ पिपठीः षु, २ पिपठीस् षु । अब सकारपक्ष मे ष्टुना ष्टुः (६४) से सकार को षकार होकर—'१ पिपठीः षु, २ पिपठीष्षु' इस प्रकार दो रूप निष्पन्न होते हैं । इसकी समग्र रूपमाला यथा— प्र० पिपठीः , पिपठिषौ पिपठिष | ष० पिपठिष विपठिषो पिपठिषाम् द्वि० पिपठिषम् ,, ,, | स० पिपठिषि ,, { पिपठीः षु तृ० पिपठिषा पिपठीर्भ्याम् पिपठीर्भिः | { पिपठीष्षु च० पिपठिषे , पिपठीर्भ्य | स० हे पिपठीः ! विपठिषौ ! विपठिष ! प० पिपठिष ,, पिपठीर्भ्य | —०—

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