भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 480

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६५ [लघु०] चिकीः। चिकीर्षौ। चिकीर्भ्याम्। चिकीर्षु ॥ व्याख्या—चिकीर्षू (करने की इच्छा वाला) । कर्तुमिच्छतीति चिकीः। डुकृञ् करणे (तना० उभ०) धातु से धातोः कर्मणः० (७०५) से सन्प्रत्यय, इको झल् (७०६) से कित्त्व के कारण गुणाभाव, अज्झनगमां सनि (७०८) से दीर्घ, ऋत इद्धातोः (६६०) से इत्त्व, रपर, हलि च (६१२) ने उपधादीर्घ, द्वित्व, अभ्यासकार्य, कुहोश्चुः (४५४) से चुत्व तथा आदेशप्रत्यययोः (१५०) से षत्व हो कर—'चिकीर्ष'। अब सनाद्यन्ता धातवः (४६८) से धातुसञ्ज्ञा होकर कर्त्ता में क्विँप्, उस का सर्वापहार- लोप तथा अतो लोपः (४७०) ने अकार का लोप करने पर—'चिकीर्षू' शब्द निष्पन्न होता है। कृदन्त होने से प्रातिपदिकसंज्ञा हो कर इस से स्वादिप्रत्यय उत्पन्न होते हैं। 'चिकीर्षू + स्' यहाँ सुँलोप होकर संयोगान्तस्य लोपः (२०) के प्राप्त होने पर रात्सस्य (२०६) के नियमानुसार सकार का लोप हो जाता है—'चिकीर्'। अब अवसान में खरवसानयोः० (६३) से रेफ को विसर्ग करने पर—'चिकीः' प्रयोग सिद्ध होता है। इस की रूपमाला यथा— प्र० चिकीः चिकीर्षौ चिकीर्षः । प० चिकीर्षः चिकीर्भ्याम् चिकीर्भ्यः द्वि० चिकीर्षम् " " । ष० " चिकीर्षोः चिकीर्षाम् तृ० चिकीर्षा चिकीर्भ्याम् चिकीर्भिः स० चिकीर्षि " चिकीर्षु* च० चिकीर्षे " चिकीर्भ्यः सं० हे चिकीः ! चिकीर्षौ ! चिकीर्षः ! † यहां पदान्त में रात्सस्य (२०६) के नियमानुसार सकार का लोप हो जाता है। ध्यान रहे कि रात्सस्य (८.२.२४) की दृष्टि में षत्व (८.३.५६) असिद्ध है। वह इसे सकार ही समझता है।

  • यहां रोः सुपि (२६८) के नियमानुसार रेफ को विसर्ग आदेश नहीं होता। अभ्यास (४५) (१) 'उपपद' किसे कहते हैं ? सूत्र बता कर व्याख्यान करें। (२) स्पृशोऽनुदके क्विन् सूत्र में 'अनुदके' कथन का क्या प्रयोजन है ? (३) 'चिकीर्षु' में खर् परे होने पर भी रेफ को विसर्ग क्यों नहीं होता ? (४) पिपठिष्, तादृश्, चिकीर्षू, घृतस्पृश्— शब्दों की प्रकृतिप्रत्ययनिर्देशपुरःसर शब्दनिष्पत्ति करें। (५) 'चिकीर्षू + सुप्' यहां षकार में रात्सस्य सूत्र कैसे प्रवृत्त हो सकता है ? (६) निम्नलिखित रूपों की सूत्रनिर्देशपूर्वक सिद्धि करें— १. षट् । २. यादृक् । ३. नक् । ४. षण्णाम् । ५. दधृग्भ्याम् । ६. घृत- स्पृक् । ७. पिपठीः । ८. विट् । ६. चिकीः । १०. पिपठिष्षु । (७) नुम्विसर्जनीयशर्व्यवायेऽपि, र्वोरुपधाया दीर्घ इकः, आ सर्वनाम्नः—इन सूत्रों की सविस्तर व्याख्या करें। (८) चिकीर्षू, पिपठिष्, ईदृश्, उदकस्पृश्—शब्दों की रूपमाला लिखें । (यहां षकारान्त पुंल्लिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) —: : ० : : — ल० प्र० (३०)