भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 481

४६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अब सकारान्त पुँल्लिङ्ग शब्दों का निरूपण करते हैं— [लघु०] विद्वान्। विद्वांसौ। हे विद्वन् १॥ व्याख्या—विद् ज्ञाने (अदा० प०) धातु से लँट्, उसके स्थान पर शतृँ, शप्, उस का लुक् तथा विदेः शतुर्वसुः (८३३) से शतृँ को वसुँ आदेश करने से 'विद्वस्' शब्द निष्पन्न होता है। वसुँ आदेश में उकार की इत्सञ्ज्ञा होती है अतः 'विद्वस्' शब्द उगित् है। यह शब्द विशेष्यलिङ्ग के आश्रित होने से त्रिलिङ्गी है। यहां पुँल्लिङ्ग में इस के रूप दर्शाये जायेंगे। विद्वस् + सु। उगित् होने से उगिदचां० (२८६) द्वारा नुँम् आगम, सान्त- महत संयोगस्य (३८२) म सान्तसंयोग के नकार की उपधा को दीर्घ होकर— विद्वान्स् + स्। अब सुँलोप तथा संयोगान्तस्य लोप (२०) से संयोगान्तलोप करने से 'विद्वान्' प्रयोग सिद्ध होता है। संयोगान्तलोप के असिद्ध होने से नकार का लोप नहीं होता। किञ्च सान्त-वस्वन्त न होने म वसुंस्रंसुध्वंस्वनडुहां द (२६२) द्वारा दत्व भी नहीं होता। 'विद्वस् + औ'। नुँम् आगम तथा सान्तमहत ०(३४२) स दीर्घ हो—विद्वान्स्

  • औ। नश्चापदान्तस्य झलि (७८) म नकार को अनुस्वार करने पर 'विद्वांसौ' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यय् परे न होने स अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (७६) सूत्र प्रवृत्त नहीं होना। कई लोग 'विद्वासौ' वा 'विद्वान्सौ' लिखते हैं—वे ठीक नहीं। इसी प्रकार—'विद्वांसः' आदि बनते हैं। विद्वस् + अम् (शस्)। यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५३) वसोः सम्प्रसारणम् ॥६।४।१३१॥ वस्वन्तस्य भस्य सम्प्रसारणं स्यात्। विदुषः। वसुंस्रंसु० (२६२) इति द—विद्वद्भ्याम्॥ अर्थ—वसुंप्रत्ययान्त भसञ्ज्ञक अङ्ग को सम्प्रसारण हो जाता है। व्याख्या—वसोः ६।१। (भस्य का विशेषण होने से अथवा प्रत्यय होने से तदन्तविधि हो जाती है)। भस्य ६।१। (अधिकृत है)। अङ्गस्य ६।१। (अधिकृत है)। सम्प्रसारणम् १।१। अर्थ—(वसोः = वस्वन्तस्य) वसुंप्रत्ययान्त (भस्य) भसञ्ज्ञक (अङ्गस्य) अङ्ग के स्थान पर (सम्प्रसारणम्) सम्प्रसारण हो जाता है। विद्वस् + शस्। यहां 'विद्वस्' यह वसुंप्रत्ययान्त भसञ्ज्ञक अङ्ग है अतः इस के द्वितीय वकार [न सम्प्रसारणे सम्प्रसारणम् (२६१) का ध्यान कर लें] को उकार सम्प्रसारण होकर—विद् उस् + अस्। सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप तथा आदेश- प्रत्यययो (१५०)१ म प्रत्यय के सकार को षकार करने पर—विदुषस् = 'विदुषः' १. ऋग्वेद (१।२५।६) के भाष्य में सायणमाधव ने 'दाशुषे' प्रयोग में शासिवसि- घसीनां च (५५४) में षत्व किया है, पर यह ठीक नहीं। पूर्वोत्तरसाहचर्य से