भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 483

४६८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां ईयसुन्प्रत्ययान्तों के रूप भी प्राय 'विद्वस्' शब्द की तरह होते हैं। केवल शसादियों में सम्प्रसारणकार्य तथा भ्याम् आदि मे दत्त्व नहीं होता। निदर्शनार्थ 'श्रेयस्' (दोनों में अधिक अच्छा) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० श्रेयान् श्रेयांसौ श्रेयांस प० श्रेयस श्रेयोभ्याम् श्रेयोभ्यः द्वि० श्रेयांसम् " श्रेयस प० ,, श्रेयसो. श्रेयसाम् तृ० श्रेयसा श्रेयोभ्याम्‡ श्रेयोभि स० श्रेयसि " श्रेयस्सु, -स्सु† च० श्रेयसे " श्रेयोभ्य स० हे श्रेयन् ! श्रेयांसौ ! श्रेयांसः !- ‡ ससजुषो रुः (१०५), हशि च (१०७) । † वा शरि (१०४) । इसीप्रकार निम्नस्थ ईयसुंन्प्रत्ययान्त शब्दों के रूप बनते हैं— १ अणीयस् = दोनों में अधिक सूक्ष्म | १५ नेदीयस् = दोनों में अधिक निकट २ अल्पीयस् = दोनों में अधिक थोड़ा | १६ पटीयस् = दोनों में अधिक चतुर ३, ऋजीयस् = दोनों में अधिक सरल | १७ पापीयम् – दोनों में अधिक पापी ४. कनीयम् = { दोनों में अधिक युवा | १८ प्रथीयरू = दोनों मे अधिक विस्तृत { दोनों मे अधिक छोटा | १६ प्रेयस् = दोनो में अधिक प्रिय ५ क्रशीयस् = दोनों में अधिक कृश | २०, बलीयस् = दोनों में अधिक बलवान् ६ क्षेपीयस् = दोनों में अधिक तेज | २१ भूयम् = दोनो में अधिक मात्रा वाला ७ क्षोदीयस् = दोनों में अधिक क्षुद्र | २२ महीयस् = दोनों में अधिक बड़ा ८ गरीयस् = दोनों में अधिक भारी | २३. म्रदीयम् = दोनों में अधिक मृदु ६. जवीयस् = दोनों में अधिक वेगवान् | २४ यवीयम् = दोनों में अधिक युवा १०. ज्यायस् = { दोनों में अधिक प्रशस्य | २५ लघीयम् = दोनों में अधिक छोटा { दोनों में अधिक वृद्ध | २६. वरीयस् = दोनों में अधिक विशाल ११ दवीयस् = दोनों में अधिक दूर | २७. साधीयस् = दोनों में अधिक अच्छा १२ द्रढीयस् = दोनों में अधिक दृढ | २८. स्थवीयस् = दोनों में अधिक स्थूल १३ द्राघीयम् = दोनों में अधिक दीर्घ | २६. स्थेयस् = दोनों में अधिक स्थिर १४ धनीयम् = दोनों में अधिक धनी | ३०. ह्रसीयस् = दोनों में अधिक छोटा नोट–जब ईयसुंन्प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग में आते हैं तब उगिदचश्च (१२४६), से ङीप् प्रत्यय होकर – श्रेयसी, अल्पीयसी, कनीयसी, प्रभृति शब्द बन जाते हैं। वसुं- प्रत्ययान्तों में भी स्त्रीत्व में ङीप् होता है परन्तु सम्प्रसारण विशेष होता है। यथा— विदुषी, स्तुषी आदि । इन सब का उच्चारण नदीशब्दवत् समझना चाहिये। नपुंसक में वस्वन्तों को पदान्त मे दत्व होगा - विद्वत्, विदुषी, विद्वांसि आदि। [लघु०] विधि-सूत्रम्— (३५४) पुंसोऽसुङ् ।७।१।८६॥ सर्वनामस्थाने विवक्षिते पुसोऽसुङ् स्यात् । पुमान् । हे पुमन् । पुमांसौ । पुंसः । पुम्भ्याम् । पुंसु ॥ अर्थ.—सर्वनामस्थान की विवक्षा हो तो 'पुस्' को असुङ् आदेश होता है। व्याख्या—सर्वनामस्थाने ।७।१। (इतोऽत्सर्वनामस्थाने से) । पुमः ।६।१।