लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४६६ असुँङ् ।१।१। 'सर्वनामस्थाने' में परसप्तमी मानने से 'परमपुमान्' यहां अनिष्ट स्वर प्राप्त होता है । अतः विषय-सप्तमी मान कर 'विवक्षिते' का अध्याहार कर लेते हैं। अर्थः—(सर्वनामस्थाने) सर्वनामस्थान विवक्षित होने पर (पुंसः) पुंस् शब्द के स्थान पर (असुंङ्) असुंङ् आदेश हो जाता है । सर्वनामस्थान (सुं, औ, जस्, अम्, औट्) लाने से पूर्व उस के लाने की इच्छा- मात्र होने पर ही असुंङ् आदेश हो जाता है। असुंङ् डित् है, अतः वह ङिच्च (४६) द्वारा 'पुंस्' के अन्त्य अल्-सकार के स्थान पर होता है । पुंस् (पुरुष)। पूञ् पवने(भ्वा० उभ०) धातु से पूजो डुम्सुन्¹(उणा० ६१८) द्वारा 'डुम्सुन्' प्रत्यय हो कर उणादयो बहुलम् (८४८) सूत्र में बहुलग्रहणसामर्थ्य से आदिर्निटुडवः(४६२) द्वारा डु की इत्सञ्ज्ञा नहीं होती किन्तु चुटू (१२६) से केवल डकार की ही इत्सञ्ज्ञा होकर उस का तथा उँन् अनुबन्ध का लोप करने से—पू+ उम्स् । डित्त्वकरणसामर्थ्य से टि का भी लोप हो कर—प्+उम्स्=पुम्स् । अब नश्चापदान्तस्य झलि (७८) द्वारा अपदान्त मकार को अनुस्वार करने पर 'पुंस्' शब्द निष्पन्न होता है । अब 'सुं' सर्वनामस्थान करने की इच्छामात्र में, प्रत्यय करने से पूर्व हीं पुंसो- ऽसुंङ् (३५४) द्वारा सकार को असुंङ् आदेश होने पर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः से अनुस्वार भी अपने पूर्वस्वरूप मकार में परिणत हुआ—पुमस् । अब सुंप्रत्यय लाने पर उगिदचांम्०(२८६) से नुँम्, अनुबन्धलोप, सान्तमहत ० (३४२) से दीर्घ, सुंलोप तथा संयोगान्तलोप होकर—'पुमान्' प्रयोग सिद्ध होता है । सम्बुद्धि में केवल सान्तमहतः०(३४२) से दीर्घ नहीं होता शेष सब प्रक्रिया सुंप्रत्ययवत् जानें—हे पुमन् ! । पुंस्+औ=पुमस्+औ । नुँम्, दीर्घ तथा अनुस्वार होकर—पुमांसौ । इसी प्रकार अन्य सर्वनामस्थान प्रत्ययों में भी जान लें । अब आगे शसादि विभक्तियों की विवक्षा में असुँङ् न होगा । पुंस्+अस् (शस्) = पुंसः । पुंस्+भ्याम् । यहां संयोगान्तस्य लोपः (२०) से संयोगान्त² सकार का लोप होकर निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः इस न्यायानुसार अनुस्वार पुनः मकाररूप में परिणत हो जाता है—पुम्+भ्याम् । अब मोऽनुस्वारः (७७) से पदान्त मकार को १. 'पातेर्डुम्सुन्' इति पाठान्तरम् । सूतेः सस्य पः ह्रस्वो म्सुंप्रत्यय इति स्त्रियामिति सूत्रे भाष्य उक्तम् । न्यासे तु—'पुनातेर्मक्सुँन् ह्रस्वश्चे'ति पठितम् । उपेयप्रति- पत्त्यर्था उपाया अव्यवस्थिता इति तत्त्वम् । २. अयोगवाहों (यम, अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय) की गणना अट्- प्रत्याहार तथा शर्प्रत्याहार में भाष्यकार ने स्वीकार की है । इस से अनुस्वार को हल् मान कर हलोऽनन्तराः संयोगः(१३) से संयोगसञ्ज्ञा हो जाती है ।