लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अनुस्वार तथा वा पदान्तस्य (८०) द्वारा उसे विकल्प करके परसवर्ण—मकार करने मे—'पुम्भ्याम्, पुभ्याम्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। पुस् + सुप् । संयोगान्तलोप, अनुस्वार की मकाररूप मे परिणति तथा मोऽनु- स्वार (७१) से अनुस्वार होकर 'पुंसु'। यहा यय् परे न रहने से वा पदान्तस्य (८०) प्रवृत्त नही होता'। 'पुम्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० पुमान् पुमांसौ पुमांस प० पुस पुम्भ्याम् पुम्क्य द्वि० पुमासम् ,, पुंसः प० ,, पुंसो पुंसाम् तृ० पुंसा पुम्भ्याम्† पुम्भि स० पुंसि ,, पुंसु च० पुंस ,, पुम्भ्य सं० हे पुमन् ! हे पुमांसौ ! हे पुमास ! † भ्याम्, भिस् और भ्यस् मे अनुस्वारपक्षीय रूप भी न भूलें। [लघु०] ऋदुशनस्० (२०५) इत्यनङ् । उशना । उशनसौ ॥ व्याख्या—उशनस् (शुक्राचार्य)। शुक्रो दैत्यगुरु काव्य उशना भार्गव कवि — इत्यमर' । वश कान्तौ (अदा० प०) धातु से वशे कनसिं (उणा० ६७८) द्वारा 'कनसिं' प्रत्यय तथा ग्रहिज्या० (६३४) से सम्प्रसारण और सम्प्रसारणाच्च (२५८) से पूर्वरूप होकर 'उशनम्' शब्द निष्पन्न होता है। उशनस् + सुँ । यहा ऋदुशनस्० (२०५) सूत्र से सकार को अनङ् आदेश होकर अङ् अनुबन्ध के लुप्त हो जाने पर—उशन अनू + सु । अतो गुणे (२७४) से पररूप हो—उशनन् + सु । सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ (१७७) से नान्त की उपधा को दीर्घ हो—उशनान् + सु्। हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) सूत्र से सुंलोप तथा न लोप ० (१८०) से नकार का भी लोप होकर—'उशना' प्रयोग सिद्ध होता है। इसी प्रकार उशनम् + औ = उशनसौ । इत्यादि । हे उशनम् + स् । यहां अग्रिम वार्त्तिक प्रवृत्त होता है— [लघु०] वा०—(२८) अस्य सम्बुद्धौ वाऽनङ् नलोपश्च वा वाच्यः॥ हे उशन ! , हे उशनन् ! , हे उशनः ! । हे उशनसौ ! । उशनोभ्याम् । उशन सु, उशनस्सु ॥ अर्थ—सम्बुद्धि परे होने पर उशनस् शब्द के सकार को विकल्प से अनङ् आदेश हो तथा नकार का लोप भी विकल्प से हो। १. जनश्रुति है कि अनुभूतिस्वरूपाचार्य के मुख से एक वार पण्डितसभा मे 'पुंसु' के स्थान पर 'पुक्षु' प्रयोग उच्चरित हो गया । पण्डितो ने इस पर उन का बहुत उपहास किया । इस उपहास से खिन्न होकर उन्होंने 'पुंक्षु' प्रयोग की साधुता के लिये सरस्वती देवी की कृपा से अपना नया व्याकरण (सारस्वतव्याकरण) रचा। इस मे उन्होंने असम्भवे पुंसः कक् सौ सूत्र बना कर सप्तमीबहुवचन के परे रहते पुस् के अन्त में क्क् का आगम कर सयोगमध्यगत सकार का किसी तरह लोप कर 'पुंक्षु' की सिद्धि दर्शाई है।