भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 486

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७१ व्याख्या—सम्बुद्धि में 'हे उशनस् + स्' यहां प्रकृतवार्त्तिक से उशनस् के सकार को विकल्प कर के अनँङ् आदेश हो कर अनँङ्पक्ष में अनुबन्धलोप, पररूप, सुंलोप तथा नकार का वैकल्पिक लोप करने से—'हे उशन, हे उशनन्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। अनँङ् के अभाव में सुंलोप, रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने पर—'हे उशनः' यह एक रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार कुल मिला कर सम्बुद्धि में तीन रूप बनते हैं— अनँङ्पक्षे (नकारलोपे) $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (१) हे उशन ! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ " (नकारलोपाऽभावे) $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (२) हे उशनन्! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ अनँङोऽभावे $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (३) हे उशनः! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ काशिका में यहां एक सुन्दर प्राचीन श्लोक दिया हुआ है— सम्बोधने तूशनसस्त्रिरूपं सान्तं तथा नान्तमथाप्यदन्तम् । माध्यन्दिनिर्वष्टि गुणं त्विगन्ते नपुंसके व्याघ्रपदां वरिष्ठः॥ नोट—यहां यह विशेष ज्ञातव्य है कि इस वार्त्तिक का उल्लेख महाभाष्य में कहीं नहीं आया। कौमुदीकार ने काशिका का भावानुवाद प्रस्तुत किया प्रतीत होता है। अत एव कई लोग इसे प्रमाण नहीं मानते। उशनस् + भ्याम्। यहां पदान्त में ससजुषो रुः (१०५) से रुँत्व, हशि च (१०७) से उत्व तथा आद् गुणः (२७) से गुण होकर—उशनोभ्याम्। उशनस् + सुप्। यहां पदान्त में रुँत्व, खरवसानयोः० (६३) से विसर्ग आदेश हो विसर्जनीयस्य सः(१०३) सूत्र से सकार के प्राप्त होने पर उस के अपवाद वा शरि (१०४) सूत्र से वैकल्पिक विसर्ग आदेश करने से—'उशनःसु, उशनस्सु' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इस की रूपमाला यथा— प्रथमा उशना उशनसौ उशनसः द्वितीया उशनसम् " " तृतीया उशनसा उशनोभ्याम् उशनोभिः चतुर्थी उशनसे " उशनोभ्यः पञ्चमी उशनसः " " षष्ठी " उशनसोः उशनसाम् सप्तमी उशनसि " उशनःसु, उशनस्सु सम्बोधन हे उशन, उशनन्, उशनः! हे उशनसौ ! हे उशनसः ! [लघु०] अनेहा । अनेहसौ । हे अनेहः ! ॥ व्याख्या—अनेहस् = (समय)। कालो दिष्टोऽप्यनेहापि — इत्यमरः। 'नञ्' उपपद वाली हन हिंसा-गत्योः (अदा० प०) धातु से नञि हन एह च (उणा० ६६३) सूत्र द्वारा 'असि' प्रत्यय तथा हन् को 'एह' आदेश होकर नञ्कार्य करने से—'अनेहस्' १. शेखरकार तथा बालमनोरमाकार का अनेहस् शब्द को असुँन्नन्त लिखना ठीक नहीं, क्योंकि तब उगिदचाम्० (२८६) द्वारा नुँम् प्रसक्त होगा।