भारतकोश
संग्रह पर लौटें

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७१ व्याख्या—सम्बुद्धि में 'हे उशनस् + स्' यहां प्रकृतवार्त्तिक से उशनस् के सकार को विकल्प कर के अनँङ् आदेश हो कर अनँङ्पक्ष में अनुबन्धलोप, पररूप, सुंलोप तथा नकार का वैकल्पिक लोप करने से—'हे उशन, हे उशनन्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। अनँङ् के अभाव में सुंलोप, रुँत्व तथा रेफ को विसर्ग आदेश करने पर—'हे उशनः' यह एक रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार कुल मिला कर सम्बुद्धि में तीन रूप बनते हैं— अनँङ्पक्षे (नकारलोपे) $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (१) हे उशन ! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ " (नकारलोपाऽभावे) $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (२) हे उशनन्! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ अनँङोऽभावे $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ (३) हे उशनः! $\left.\begin{aligned} \end{aligned}\right}$ काशिका में यहां एक सुन्दर प्राचीन श्लोक दिया हुआ है— सम्बोधने तूशनसस्त्रिरूपं सान्तं तथा नान्तमथाप्यदन्तम् । माध्यन्दिनिर्वष्टि गुणं त्विगन्ते नपुंसके व्याघ्रपदां वरिष्ठः॥ नोट—यहां यह विशेष ज्ञातव्य है कि इस वार्त्तिक का उल्लेख महाभाष्य में कहीं नहीं आया। कौमुदीकार ने काशिका का भावानुवाद प्रस्तुत किया प्रतीत होता है। अत एव कई लोग इसे प्रमाण नहीं मानते। उशनस् + भ्याम्। यहां पदान्त में ससजुषो रुः (१०५) से रुँत्व, हशि च (१०७) से उत्व तथा आद् गुणः (२७) से गुण होकर—उशनोभ्याम्। उशनस् + सुप्। यहां पदान्त में रुँत्व, खरवसानयोः० (६३) से विसर्ग आदेश हो विसर्जनीयस्य सः(१०३) सूत्र से सकार के प्राप्त होने पर उस के अपवाद वा शरि (१०४) सूत्र से वैकल्पिक विसर्ग आदेश करने से—'उशनःसु, उशनस्सु' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। इस की रूपमाला यथा— प्रथमा उशना उशनसौ उशनसः द्वितीया उशनसम् " " तृतीया उशनसा उशनोभ्याम् उशनोभिः चतुर्थी उशनसे " उशनोभ्यः पञ्चमी उशनसः " " षष्ठी " उशनसोः उशनसाम् सप्तमी उशनसि " उशनःसु, उशनस्सु सम्बोधन हे उशन, उशनन्, उशनः! हे उशनसौ ! हे उशनसः ! [लघु०] अनेहा । अनेहसौ । हे अनेहः ! ॥ व्याख्या—अनेहस् = (समय)। कालो दिष्टोऽप्यनेहापि — इत्यमरः। 'नञ्' उपपद वाली हन हिंसा-गत्योः (अदा० प०) धातु से नञि हन एह च (उणा० ६६३) सूत्र द्वारा 'असि' प्रत्यय तथा हन् को 'एह' आदेश होकर नञ्कार्य करने से—'अनेहस्' १. शेखरकार तथा बालमनोरमाकार का अनेहस् शब्द को असुँन्नन्त लिखना ठीक नहीं, क्योंकि तब उगिदचाम्० (२८६) द्वारा नुँम् प्रसक्त होगा।

४७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां शब्द निष्पन्न होता है। इसकी प्रक्रिया भी 'उशनस्' शब्दवत् होती है केवल सम्बुद्धि मे इस का एक रूप बनता है। रूपमाला यथा— प्र० अनेहा† अनेहसौ अनेहस | प० अनेहस अनेहोभ्याम् अनेहोभ्य द्वि० अनेहसम् ,, , | ष० ,, अनेहसो अनेहसाम् तृ० अनेहसा अनेहोभ्याम्‡ अनेहोभि | स० अनेहसि ,, अनेह सु-स्सु* च० अनेहस ,, अनेहोभ्य | स० हे अनेह । @ अनेहसौ। अनेहस । †ऋदुशनस्० (२०५) से अनङ्, अनुबन्धलोप, पररूप, नान्त की उपधा को दीर्घ, सुँलोप तथा नलोप होकर— 'अनेहा' सिद्ध होता है। ‡ससजुषो रुँ (१०५), हशि च (१०७), आव्गुण (२७) । *रुँत्व विसर्ग होकर वा शरि (१०४) प्रवृत्त हो जाता है । @सुँलोप, रुँत्व तथा अवसान मे रेफ को विसर्ग हो जाते हैं । 'अनेहस्' की तरह प्रक्रिया तथा रूपमाला वाला केवल एक ही शब्द है— पुरुदमस् । इस का वेद मे ही प्रयोग देखा जाता है । इस का अर्थ 'इन्द्र' आदि है। 'बहुत कर्मों वाला' इस अर्थ मे यह विशेषणवाची होने से त्रिलिङ्गी है। इसे वैदिक समझ कर ही कौमुदीकार ने सम्भवत इस का उल्लेख नही किया । [लघु०] वेधा । वेधसौ ।'हे वेध '। वेधोभ्याम् ॥ व्याख्या—वेधस् = (ब्रह्मा) । स्रष्टा प्रजापतिर्वेधा इत्यमरः । विपूर्वकं डुधाञ् धारणपोषणयो (जुहो० उभ०) धातु से विधाञो वेध च (उणा० ६६४) इस औणा- दिकसूत्र द्वारा 'असिँ' प्रत्यय तथा सोपसर्ग 'धा' को 'वेध्' आदेश होकर 'वेधस्' शब्द निष्पन्न होता है । वेधस् + सुँ । असन्तस्य चाधातो (३४३) मे दीर्घ, हल्ङ्याब्भ्यो ०(१७६) से सुँलोप तथा प्रकृति के सकार को रुँत्व विसर्ग करने से—वेधा । अन्य विभक्तियो मे 'अनेहस्' की तरह प्रक्रिया जानें । रूपमाला यथा— प्र० वेधा वेधसौ वेधस | प० वेधस वेधोभ्याम् वेधोग्य द्वि० वेधसम् ,, ,, | ष० ,, वेधसो वेधसाम् तृ० वेधसा वेधोभ्याम्† वेधोभि | स० वेधसि ,, वेध सु,-स्सु च० वेधसे ,, वेधोग्य | स० हे वेध । * वेधसौ । वेधस । †रुँत्व, उत्व तथा गुण हो जाता है । *सुँलोप, रुँत्व तथा विसर्ग होते हैं । इसीप्रकार—१. वनौकस् (बन्दर), २ दिवौकस् (देवता), ३ हिरण्यरेतस् (सूर्य वा अग्नि), ४ चन्द्रमस् (चन्द्रमा), ५. सुमनस् (देवता), ६ प्रचेतस् (वरुण), ७ सुमेधस् (अच्छी बुद्धि वाला), ८ नृचक्षस् (मनुष्यों पर दृष्टि रखने वाला । अथर्व०), ९ जातवेदस् (अग्नि), १० अङ्गिरस् (एक ऋषि) ११. विश्ववेदस् (सब कुछ जानने वाला), १२ पुरोधस् (पुरोहित), १३ वयाधस् (तरुण, जवान) १४.

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७३ दुर्वासस् (एक ऋषि), १५. विमनस् (दुःखी पुरुष), १६. विडौजस् (इन्द्र) प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं।¹ अदस् (वह-दूरवर्त्ती पदार्थ जिसका अङ्गुली से निर्देश नहीं किया जा सकता)। न दस्यते = उत्क्षिप्यतेऽङ्‌गुलिर्यत्र-इस विग्रह में नञ्पूर्वक दस् धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'अदस्' शब्द निष्पन्न होता है। त्यदादियों के अन्तर्गत होने के कारण इस की सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) द्वारा सर्वनामसंज्ञा होती है। यह शब्द त्रिलिङ्गी है। यहां पुंलिङ्ग में इस की सुबन्त-प्रक्रिया का निरूपण करते है— [लघु०] विधि-सूत्रम्- (३५५) अदस औ सुँलोपश्च ॥७।२।१०७॥ अदस औत् स्यात् सौ परे सुँलोपश्च। तदोः० (३१०) इति सः। असौ। त्यदाद्यत्वम्। पररूपत्वम्। वृद्धिः॥ अर्थः-सुँ परे होने पर अदस् शब्द के अन्त्य सकार को औकार तथा सुं का लोप हो जाता है। व्याख्या-सौ ।७।१। (तदोः सः सावनन्त्ययोः से)। अदसः ।६।१। औ ।१।१। (यहां विभक्ति का लुक् हुआ है)। सुंलोपः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। समासः--सोर्लोपः = सुलोपः, षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः- (सौ) सुँ परे होने पर (अदसः) अदस् शब्द के स्थान पर (औ) 'औ' आदेश होता है (च) तथा (सुंलोपः) सुँ का भी लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि द्वारा यह औकार आदेश अन्त्य अल् सकार के स्थान पर होगा। 'अदस औ' इस अंश में यह सूत्र त्यदादीनामः (१६३) सूत्र का अपवाद है। अदस् + सुँ। यहां त्यदादीनामः (१६३) के प्राप्त होने पर अदस औ सुँलो- पश्च (३५५) सूत्र से सकार को औकार तथा सुं का लोप होकर - अद+औ। वृद्धि- रेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने से- 'अदौ'। अब प्रत्ययलक्षण द्वारा लुप्त हुए सुँ- प्रत्यय को मान कर तदोः सः सावनन्त्ययोः (३१०) सूत्र से दकार को सकार करने पर- 'असौ' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि 'अदौ' इस अवस्था में अदसोऽसेर्दादु दो मः (८.२.८०) सूत्र भी प्राप्त होता है परन्तु तदोः सः० (७.२.१०६) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध होने से वह प्रवृत्त नहीं होता। अदस् + औ। यहां त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से सकार को अकार तथा अतो १. यहां यह ज्ञातव्य है कि असन्त शब्द में 'अस्' यदि धातु का अवयव होगा तो अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) सूत्र में 'अधातोः' कथन के कारण उस असन्त की उपधा को दीर्घ न होगा। यथा-सुपूर्वक वस् आच्छादने (अदा० आ०) धातु से क्विन् प्रत्यय करने पर 'सुवस्' (अच्छी तरह ढांपने वाला) शब्द निष्पन्न होता है। यह शब्द असन्त तो है पर इस के अन्त में 'अस्' यह 'वस्' धातु का अवयव है अतः 'सुवस्+स्' में उपधादीर्घ न होगा, सुंलोप हो कर सकार को रुँत्व-विसर्ग करने से- सुवः, सुवसौ, सुवसः - आदि रूप बनेगे। इसी प्रकार पिण्ड- ग्रस्, पिण्डग्लस् (पिण्ड खाने वाला) आदि शब्दों के रूप समझने चाहियें।

गुणे (२७४) से पररूप कर—'अद्+औ'। अब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने पर—'अदौ'। इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(३५६) अदसोऽसेर्दादु दो मः ॥८।२।८०॥ अदसोऽमान्तस्य दात् परस्य उदूतो स्तो दस्य मश्च। आन्तरतम्याद् ह्रस्वस्य-उ, दीर्घस्य-ऊ। अमू। जस शी (१५२)। गुण ॥ अर्थ --जिस के अन्त में सकार न हो ऐसे अदस् शब्द के दकार से पर वर्ण को उकार और ऊकार हो जाता है तथा दकार को मकार भी होता है। व्याख्या—अदस ।६।१। असे ।६।१। दात् ।५।१। उ ।१।१। द ।६।१। मः ।१।१। (मकारादकार उच्चारणार्थं) । समास—नास्ति सि = सकार (सकाराद् इकार उच्चारणार्थ ) यस्मिन् स =असि, तस्य =असे । नञ्बहुव्रीहिसमास. । यह 'अदस' का विशेषण है। अदस् शब्द के अन्त में सकार होता है अत यहां असकारान्त अदस् शब्द का ग्रहण अभिप्रेत है। उश्च ऊश्च=उ, समाहारद्वन्द्व । अर्थ -(असे.) असान्त अर्थात् जिस के अन्त में सकार विद्यमान नही ऐस (अदस ) अदस् शब्द के (दात्) दकार स पर वर्ण के स्थान पर (उ) उकार या ऊकार आदेश हो जाता है तथा (द ) दकार के स्थान पर (म ) म् आदेश भी हो जाता है। असान्त अदस् शब्द के दकार से परे वाला वर्ण प्राय ह्रस्व या दीर्घ हुआ करता है¹। स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा ह्रस्व वर्ण के स्थान पर ह्रस्व उकार तथा दीर्घ वर्ण के स्थान पर दीर्घ ऊकार होगा²। 'अदौ' यहां असान्त अदस् शब्द के दकार से परे दीर्घ ओकार विद्यमान है। अत प्रकृतसूत्र से ओकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर—'अमू' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस् + अस् (जस्) । यहा त्यदादीनाम (१६३) से सकार को अकार, अतो गुणे (२७४) से पररूप, जसः शी (१५२) से जस् को शी तथा आदगुण (२७) सूत्र से गुण होकर—'अदे'। अब अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) से प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५७) एत ईद् बहुवचने ॥८।२।८१॥ अदसो दात्परस्य एत ईद्, दस्य च मो बहुह्वर्थोक्तौ। अमी। पूर्वत्रा- १. कही-कही 'हल्' भी पाया जाता है, जैस—अदद्र्यङ्, अमुमुयङ्। यहा दकार से परे 'र्' है। २. आन्तर्य अर्थात् सादृश्य चार प्रकार का होता है—यह हम पीछे स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र पर लिख चुके हैं। यहाँ प्रमाणकृत (मात्राकृत) आन्तर्य द्वारा ह्रस्व के स्थान पर ह्रस्व तथा दीर्घ के स्थान पर दीर्घ आदेश होता है। दकार से परे यदि हल् हो तो उसे भी ह्रस्व उकार आदेश होता है।

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७५ सिद्धम् (३१) इति विभक्तिकार्यं प्राक्, पश्चाद् उत्व-मत्वे । अमुम् । अमू । अमून् । मुत्वे कृते घिसञ्ज्ञायां नाभावः ॥ अर्थः— अदस् शब्द के दकार से परे एकार को ईकार तथा दकार को मकार हो जाता है बहुत अर्थों की उक्ति में । व्याख्या—अदसः ।६।१। दात् ।५।१। (अदसोऽसेर्दादु० से) । एतः ।६।१। ईत् ।१।१। दः ।६।१। मः ।१।१। (अदसोऽसेः० से) । बहुवचने ।७।१। समासः—बहूनां वचनम्—उक्तिः=बहुवचनम्, तस्मिन्=बहुवचने । षष्ठीतत्पुरुषसमासः । अर्थः— (बहुवचने) बहुत्व की विवक्षा में (अदसः) अदस् शब्द के अवयव (दात्) दकार से परे (एतः) 'ए' के स्थान पर (ईत्) 'ई' आदेश हो जाता है तथा (दः) उस दकार के स्थान पर भी (मः) 'म्' आदेश हो जाता है । 'अदे' यहां प्रकृतसूत्र से एकार को ईकार तथा दकार को मकार होकर— 'अमी' प्रयोग सिद्ध होता है । अदस् + अम् । यहां त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—'अद + अम्' । अब यहां अमि पूर्वः (६.१.१०३) से पूर्वरूप तथा अदसोऽसेर्दादु दो मः (८.२.८०) से उत्व- मत्व युगपत् प्राप्त होते हैं । पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा उत्वमत्वविधायक सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम पूर्वरूप होकर 'अदम्' बन जाता है । तदनन्तर उत्व-मत्व हो 'अमुम्' प्रयोग सिद्ध होता है । पूर्वत्रासिद्धम् (३१) इति विभक्तिकार्यं प्राक्, पश्चादुत्वमत्वे । अर्थात् पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र से—अदसोऽसेः० (३५६) तथा एत ईद् बहुवचने (३५७) सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम अमि पूर्वः (१३५) आदि सूत्रों द्वारा विभक्तिकार्य होगा तदनन्तर उन सूत्रों की प्रवृत्ति होगी । परन्तु अब इस पर यह विचार उपस्थित होता है कि क्या पूर्वत्रासिद्धम् (३१) से कार्य असिद्ध किया जाता है या शास्त्र असिद्ध ? यदि किये हुए कार्य को असिद्ध मानेंगे तो प्रथम कार्य का विद्यमान होना आवश्यक होगा; क्योंकि यदि कार्य ही विद्यमान न रहेगा तो पुनः वह असिद्ध कैसे हो १. यहां 'बहुवचन' शब्द से पारिभाषिक बहुवचन—जस्, शस् आदि का ग्रहण नहीं करना चाहिये । क्योंकि वैसा अर्थ करने से 'अदेभ्यः=अमीभ्यः, अदेभिः= अमीभिः' आदि प्रयोगों के सिद्ध हो जाने पर भी 'अदे=अमी' यहां प्रयोगसिद्धि न हो सकेगी । क्योंकि 'अदे' में एकार स्वयं बहुवचन है इस से परे अन्य कोई बहुवचन नहीं है । अतः यहां 'बहुवचने' पद को यौगिक स्वीकार कर 'बहुतों की उक्ति अर्थात् बहुत्व की विवक्षा में' ऐसा अर्थ करना उचित है । इस अर्थ से 'अदे' आदि सब स्थानों पर बहुत्व की विवक्षा वर्तमान रहने से कोई दोष प्राप्त नहीं होता । इस सूत्र पर भाष्यकार ने लिखा है—नेदं पारिभाषिकस्य बहुवचन- स्य ग्रहणम् । किन्तर्हि ? अन्वर्थग्रहणमेतत् । बहूनामर्थानां वचनम्=बहुवचनम् ।

सकेगा ? अतः कार्यासिद्धपक्ष में प्रथम विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) सूत्र के बल से भावी असिद्ध कार्य कर चुकने पर पश्चात् पूर्वत्रासिद्धम् (३१) से वह पूर्व की दृष्टि में असिद्ध होगा अन्यथा नहीं। इस पक्ष में 'अद + अम्' यहां प्रथम विप्रतिषेधे परं कार्यम् (३१) द्वारा पूर्वरूप की अपेक्षा पर होने से उत्व-मत्व होकर—'अमु + अम्' बन जायगा। तदनन्तर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा मुकार्य को पूर्वरूप की दृष्टि में असिद्ध माना जायगा। अब इस मुकार्य के असिद्ध मान जाने पर भी पूर्वरूप नहीं हो सकेगा, क्योंकि- देवदत्तस्य हन्तरि हते देवदत्तस्य पुनरुन्मज्जनं न भवति अर्थात् देव- दत्त के हन्ता के मारे जाने पर भी देवदत्त की पुनरुत्पत्ति नहीं हो सकती। इस न्याया- नुसार 'द' के हन्ता 'मु' के असिद्ध होने पर भी पुनः 'द' नहीं आ सकेगा, क्योंकि उस का तो विनाश हो चुका है। इस प्रकार 'द' के न आने से अक् नहीं मिलेगा तब अमि पूर्वः (१३५) द्वारा पूर्वरूप न हो सकेगा। अतः यह पक्ष ठीक नहीं। अब यदि शास्त्रासिद्धपक्ष स्वीकार करते हैं तो इस पक्ष में दोनों सूत्रों के युगपत् प्राप्त होने पर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा परशास्त्र असिद्ध अर्थात् अभावात्मक हो जाता है। इस से पूर्वके सवासप्त अध्यायों के सूत्रों की दृष्टि में वह सूत्र नहीं रहता, उस के न रहने से विप्रतिषेध नहीं हो सकता, क्योंकि विप्रतिषेध वहां होता है जहां अन्यत्रान्यत्रलब्धावकाश सूत्र परस्पर की दृष्टि में भावात्मक होते हुए एक स्थान पर प्राप्त हों। यहां पूर्व की दृष्टि में पर सूत्र अभावात्मक होने से वर्तमान नहीं रहता अतः प्रथम पूर्वसूत्र प्रवृत्त होता है और तदनन्तर असिद्ध सूत्र। इस प्रकार इस पक्ष के स्वीकार करने में 'अद + अम्' यहां पर अदसोऽसे ० तथा अमि पूर्वं इन दोनों सूत्रों के युगपत् प्राप्त होने पर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा अमि पूर्वं (६।१।१०२) की दृष्टि में अदसोऽसे० (८।२।८०) सूत्र असिद्ध अर्थात् अभावात्मक हो जाता है। अतः प्रथम पूर्वरूप होकर 'अदम्' हो जाने पर पश्चात् उत्व-मत्व करने से 'अमुम्' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार कोई दोष उत्पन्न नहीं होता। अतः पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र में शास्त्रासिद्धपक्ष ही स्वीकार करना चाहिये, कार्यासिद्ध नहीं। अत एव ग्रन्थकार ने भी पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र की वृत्ति में इसी पक्ष का अनुमोदन किया है—'सपादसप्ताध्यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा, त्रिपाद्यामपि पूर्वं प्रति परं शास्त्रम् असिद्धम्” । विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) सूत्र पर भी यही स्वीकार किया है—"पूर्वत्रासिद्धमिति रोरीत्यस्यासिद्धत्वाद् रुत्वमेव”। भाष्यकार भी इसी पक्ष के पक्षपाती हैं—पूर्वत्रासिद्धे नास्ति विप्रतिषेधोऽभावादुत्तरस्य। इस विषय पर अन्य विस्तृत विचार व्याकरण के उच्चग्रन्थों में देखें। अदस् + अस् (शस्)। त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—अद + अस्। अब अदसोऽसे ० (३५६) के असिद्ध होने से, प्रथम विभक्तिवत्कार्य—पूर्वसवर्णदीर्घ और शस् के सकार को नकार करने से—'अदान्'। अब अदसोऽसे ० (३५६) से दकारोत्तर आकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर 'अमूंन्' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस् + आ (टा)। त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—अद + आ। अब यहां

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७७ यद्यपि अदसोऽसेः० (३५६) के असिद्ध होने से, प्रथम विभक्तिकार्य अर्थात् टाङसिँ- ङसामिनात्स्याः (१४०) सूत्र से टा को इन आदेश प्राप्त होता है तथापि न मु ने (३५८) सूत्र के आरम्भसामर्थ्य से¹ वह नहीं होता; अतः अदसोऽसेः० (३५६) से दकारोत्तर अकार को उकार तथा दकार को मकार हो जाता है अमु+आ। अब यहां 'मु'- भाव के असिद्ध होने से शेषो घ्यसखि (१७०) द्वारा घिसञ्ज्ञा नहीं हो सकती, और बिना घिसञ्ज्ञा के आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) सूत्र से टा को ना नहीं हो सकता; पर हमें 'ना' करना अभीष्ट है। अतः 'मु' भाव को सिद्ध करने के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है – [लघु०] निषेध-सूत्रम्— (३५८) न मु ने ॥८।२।३॥ 'ना'भावे कर्तव्ये कृते च 'मु'भावो नाऽसिद्धः। अमुना। अमूभ्याम् ३। अमीभिः। अमुष्मै। अमीभ्यः २। अमुष्मात्। अमुष्य। अमुयोः २। अमी- षाम्। अमुष्मिन्। अमीषु ॥ अर्थः—'ना' आदेश करना हो या कर चुके हों तो 'मु' आदेश असिद्ध नहीं होता । व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। मु। १।१। ने ।७।१। असिद्धम् ।१।१। (पूर्वत्रा- सिद्धम् से)। समासः—म् च उश्च = मु। समाहारद्वन्द्वः । 'ने' यह ना-शब्द के सप्तमी का एकवचन है—ना+ङि=ना+इ=ने। यहां परसप्तमी या विषयसप्तमी समझनी चाहिये । अर्थः—(ने) 'ना' के विषय में अथवा 'ना' परे होने पर (मु) 'मु' आदेश (असिद्धम्) असिद्ध (न) नहीं होता । 'अमु+आ' यहां ना के विषय में 'मु' आदेश असिद्ध न हुआ तो घिसञ्ज्ञा होकर आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) से टा को ना करने पर—'अमुना' प्रयोग सिद्ध हुआ। सूचना—ध्यान रहे कि 'अमुना' में 'ना' के परे होने पर 'मु' आदेश के असिद्ध होने से सुपि च (१४१) द्वारा दीर्घ प्राप्त होता है। वह भी न मु ने (३५८) से 'मु' आदेश के सिद्ध हो जाने पर नहीं होता। इसीलिये तो 'ने' में दो प्रकार की सप्तमी स्वीकार कर के 'ना करने में या ना परे होने पर' ऐसा अर्थ किया गया है। अदस्+भ्याम्। त्यदाद्यत्व और पररूप करने पर सुपि च (१४१) से दीर्घ हो जाता है—अदाभ्याम्। अब अदसोऽसेः० (३५६) से ऊत्व-मत्व करने से— 'अमूभ्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस्+भिस्। त्यदाद्यत्व और पररूप कर 'अद+भिस्'। इस अवस्था में १. यदि यहाँ टा को इन कर दें तो न मु ने (३५८) सूत्र बनाने का कुछ प्रयोजन नहीं रहता। अतः इस का बनाना तभी सार्थक किया जा सकता है जब 'इन' आदेश न होकर 'मु' हो जाये। यही इस का आरम्भसामर्थ्य है।

अतो भिस ऐस् (१४२) प्राप्त होता है, परन्तु उस का नेदमदसोरको (२७६) से निषेध हो जाना है । अब बहुवचने झल्येत् (१४५) द्वारा एकारादेश कर एत ईद् बहुवचने (३५७) से एकार को ईकार तथा दकार को मकार करने से—'अमीभि' प्रयोग सिद्ध होता है । अदम् + ए(ङे) । त्यदाद्यत्व, पररूप, सर्वनाम्न स्मै (१५३) से ङे को स्मै, मुत्व तथा आदेशप्रत्यययो (१५०) स षत्व होकर—अमुष्मै । अदस् + भ्यस् । त्यदाद्यत्व, पररूप, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व तथा एत ईद् बहुवचने (३५७) से ईत्व मत्व होकर—अमीभ्य । अदम् + अस् (ङसिँ) । त्यदाद्यत्व, पररूप तथा ङसिङ्यो स्मात्स्मिनौ (१५४) से 'स्मात्' आदेश उत्व-मत्व तथा षत्व होकर —अमुष्मात् । अदस् + थस (ङस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाङसिङसामिनात्स्या (१४०) से स्य आदेश, उत्व मत्व तथा षत्व होकर—अमुष्य । अदस् + ओस । त्यदाद्यत्व पररूप, ओसि च (१४७) मे एत्व, एचोऽयवा- याव (२२) मे अय आदेश होकर —अदयो । अब उत्व-मत्व होकर—अमुयो । अदस् + आम् । त्यदाद्यत्व, पररूप, आमि सर्वनाम्न सुँट् (१५५) से सुँट् आगम, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व, एत ईद् बहुवचने (३५७) मे ईत्व-मत्व और षत्व करने से—'अमीषाम्' प्रयोग सिद्ध होना है । अदम् + इ (ङि) । त्यदाद्यत्व, पररूप, ङसिङ्यो स्मात्स्मिनो (१५४) मे ङि को स्मिन्, मु आदेश तथा षत्व करने पर—अमुष्मिन् । अदस + सु (सुप्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व, एत ईद् बहुवचने (३५७) से ईत्व-मत्व तथा आदेशप्रत्यययो (१५०) से षत्व करने पर—अमीषु । अदस् (वह) शब्द की पुंलिङ्ग मे रूपमाला यथा— प्र० असौ अमू अमी | प० अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्य द्वि० अमुम् ,, अमून् | ष० अमुष्य अमुयो अमीषाम् तृ० अमुना अमूभ्याम् अमीभि | स ० अमुष्मिन् ,, अमीषु च० अमुष्मै ,, अमीभ्य | सम्बोधन प्राय नही होता । (यहां सकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] इति हलन्ता पुंलिङ्गा [शब्दा ] ॥ अर्थ —यहा हलन्त पुंलिङ्ग शब्द समाप्त होते हैं । अभ्यास (४६) (१) (क) 'विद्वान्' मे वसुंस्त्रसुं० द्वारा दत्व क्यो नहीं होता ? (ख) 'विद्वांसौ' मे अनुस्वार को परसवर्ण क्यो नही होता ? (ग) 'अनेहम्' को असुंमन्त मानने मे क्या दोष है ?

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७६ (२) व्याख्या करें— (क) सम्बोधने तूशनसस्त्रिरूपं सान्तं तथा नान्तमथाप्यदन्तम् । (ख) आन्तरतम्याद् ह्रस्वस्य उः, दीर्घस्य ऊः । (ग) अकृतव्यूहाः पाणिनीयाः । (घ) अदस औ सुलोपश्च, अदसोऽसेर्दादु दो मः, वसोः सम्प्रसारणम् । (३) पुंसु, वेधोभ्याम्, अमी, विद्वद्ऋचाम्, अमुना, श्रेयांसौ, अमू, तस्थुषः, अमु- ष्मिन्, विद्वन्—इन रूपों की ससूत्र साधनप्रक्रिया लिखें । (४) एत ईद् बहुवचने सूत्र की व्याख्या करते हुए—बहुवचनपद पारिभाषिक नहीं यौगिक है—इसे स्पष्ट करें । (५) अनुस्वार का पाठ हल्प्रत्याहार में नहीं आता तो पुनः 'पुंस् + भ्याम्' में कैसे संयोगसञ्ज्ञा होकर संयोगान्तलोप हो जाता है ? (६) इन शब्दों का प्रथमैकवचन सिद्ध कर रूपमाला लिखें— वनीकस्, उशनस्, अनेहस्, पुंस्, वेधस्, श्रेयस्, अदस् । (७) पूर्वत्रासिद्धम् द्वारा कार्यासिद्ध और शास्त्रासिद्ध पक्षों में से किस पक्ष का प्रतिपादन होता है—सोदाहरण व्याख्या करें । (८) न मु ने की व्याख्या करते हुए 'कर्त्तव्ये कृते च' कथन को स्पष्ट करें । (९) पुंस् और विद्वस् शब्दों की प्रकृतिप्रत्ययनिर्देशपुरःसर निष्पत्ति लिखें । (१०) पुंसोऽसुँङ् सूत्र पर—'सर्वनामस्थान परे होने पर' ऐसा न कहकर 'सर्व- नामस्थाने विवक्षिते' ऐसा क्यों कहा गया है ? (११) असान्त अदस् शब्द के दकार से परे हल् वर्ण को क्या आदेश होता है ? सप्रमाण समझाएं । (१२) अ त्वसन्तस्य चाधातोः में 'अधातोः' ग्रहण का क्या प्रयोजन है ? (१३) निम्नस्थ शब्दों का सम्बुद्धि में रूप सिद्ध करें— पुंस्, उशनस्, वेधस्, विद्वस्, अनेहस् । ———: : ० : : ——— इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्यां हलन्त-पुंल्लिङ्ग- प्रकरणं समाप्तम् ॥

अथ हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् अब क्रमप्राप्त हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण का आरम्भ किया जाता है। इस प्रकरण में भी सब शब्द प्रत्याहारक्रम से कहे गये हैं। अब प्रथम हयवरट् (प्रत्याहारसूत्र ५) के क्रमानुसार हकारान्त शब्द कहे जाते हैं— [लघु०] विधि सूत्रम् — (३५६) नहो धः ।८।२।३४॥ नहो हस्य धः स्याज्झलि पदान्ते च ॥ अर्थ—नह् के हकार को धकार हो जाता है झल् परे होने पर या पदान्त में। व्याख्या—झलि ।७।१। (झलो झलि से) । पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से) । नहः ।६।१। धः ।१।१। धकारादकार उच्चारणार्थः। अर्थ—(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (नहः) नह् धातु के स्थान पर (धः) ध् आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि द्वारा यह आदेश नह् धातु के अन्त्य अल् हकार के स्थान पर होगा। यह 'हो ढः' (२५१) सूत्र का अपवाद है। इस सूत्र का उपयोग 'उपानह्' शब्द में किया जाता है अतः प्रथम 'उपानह्' शब्द की निष्पत्ति की जाती है। [लघु०] विधि सूत्रम्—(३६०) नहि-वृति-वृषि-व्यधि-रुचि-सहि-तनिषु क्वौ ।६।३।११५॥ नह्याद्यन्तेषु पूर्वपदस्य दीर्घः। उपानत्, उपानद् । उपानहौ । उपानत्सु ॥ अर्थ—नह्, वृत्, वृष्, व्यध्, रुच्, सह्, और तन्—ये क्विबन्त धातु परे हों तो पूर्वपद को दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—नहि वृति वृषि व्यधि रुचि-सहि-तनिषु ।७।३। क्वौ ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। यह सूत्र उत्तरपदाधिकार में पढ़ा गया है अतः 'पूर्वस्य' का 'पदस्य' विशेषण उपलब्ध हो जाता है। यद्यपि 'क्वौ' ग्रहण से क्विप् और क्विन् दोनों का ग्रहण हो सकता है तथापि नह् आदि धातुओं से क्विन् का विधान न होने से अवशिष्ट क्विप् का ही ग्रहण होता है। अर्थ—(क्वौ) क्विबन्ते परे होने पर (नहि-वृति वृषि व्यधि-रुचि-सहितनिषु) जो नह्, वृत्, वृष्, व्यध्, रुच्, सह्, और तन् धातु, इन के परे होने पर (पूर्वस्य) पूर्व (पदस्य) पद के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) तथा अचश्च (१.२.२८) परिभाषाओं द्वारा यह दीर्घ पूर्वपद के अन्त्य अच् के स्थान पर होता है। क्विप् परे होने पर जो नह्, वृत् आदि धातु, उन के परे होने पर—इसका अभिप्राय—क्विबन्त नह्, वृत् आदि धातु परे होने पर—ऐसा समझना चाहिये। अत एव वृत्ति में यही लिखा है।

'उप' पूर्वक णहँ बन्धने (दिवा० उभय०) धातु से सम्पदादिभ्यः क्विँप् (वा० ५१) वार्त्तिक द्वारा कर्म में क्विँप् प्रत्यय, उस का सर्वापहारलोप, प्रत्ययलक्षणद्वारा पुनः उसे मान कर नहि-वृति-वृषि० (३६०) सूत्र से पूर्वपद के अन्त्य अच् को दीर्घ तथा अन्त में प्रादिसमास करने से 'उपानह्' शब्द निष्पन्न होता है । उप = समीपे नह्यते = बध्यत इत्युपानत्। जूते को उपानह् कहते हैं। अय पादुका पादूरुपानत् स्त्री— इत्यमरः। उपानह् का बहुधा द्विवचन में प्रयोग होता है। दक्षिण पाद के जूते को 'पूर्वा उपानत्' तथा वाएं पाद के जूते को 'अपरा उपानत्' कहते हैं (व्या० च०)। विशेषण लगा कर ही इस का स्त्रीत्व प्रकट किया जा सकता है। यथा—इयम् उपानत्, इमे उपानहौ आदि। उपानह् शब्द के कुछ प्रयोग यथा—उपानद्-गूढ-पादस्य ननु चर्मावृतेव भूः (हितोप० १.१४४)। श्वा यदि क्रियते राजा स किं नाश्नात्युपानहम् (हितोप० ३.५८)। उपानह् + स् (सुँ) । अपृक्त सकार का लोप होकर नहो धः (३५६) द्वारा पदान्त हकार को धकार¹, जश्त्व से दकार और चर्व से वैकल्पिक तकार करने पर— 'उपानत्, उपानद्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं। उपानह् + भ्याम् । यहां पदान्त में नहो धः (३५६) से हकार को धकार पुनः जश्त्व से दकार करने पर 'उपानद्भ्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है। उपानह् + सु (सुप्)। नहो धः (३५६) से धकार, जश्त्व से दकार तथा खरि च (७४) से तकार होकर 'उपानत्सु' सिद्ध होता है। रूपमाला यथा— प्र० उपानत्-द् उपानहौ उपानहः | प० उपानहः उपानद्भ्याम् उपानद्भ्यः द्वि० उपानहम् ,, ,, | ष० ,, उपानहोः उपानहाम् तृ० उपानहा उपानद्भ्याम् उपानद्भिः | स० उपानहि ,, उपानत्सु च० उपानहे ,, उपानद्भ्यः | सं० हे उपानत्-द्! हे उपानहौ! उपानहः! धक्तव्य—ग्रन्थकार का नहि-वृति० (३६०) सूत्र यहां लिखना उचित प्रतीत नहीं होता, इसे नहो धः (३५६) से पूर्व लिखना चाहिये था। नहि-वृति० (३६०) सूत्र के अन्य उदाहरण यथा—१. वृत्—नीवृत् (पुं० स्त्री०) =जनपदे, देश । २. वृष्—प्रावृष् (स्त्री०) = वर्षा ऋतु । ३. व्यध्— हृदयावित् (त्रि०) =हृदय को वींधने वाला । ४. रुच्—नीरुच् (त्रि०) =निरन्तर चमकने वाला। ५. सह्—ऋतीषह् (त्रि०) =दुःखों या शत्रुओं को सहने वाला। ६. तन्—परीतत् (त्रि०) =चारों ओर फैलने वाला । [लघु०] क्विबन्तत्वात् कुत्वेन घः । उष्णिक्, उष्णिग् । उष्णहिौ । उष्णिग्भ्याम् ॥ व्याख्या—उष्णिह् (छन्दोविशेष)। 'उष्णिह्' शब्द ऋत्विगद्दधृक्स्रग्दिगुष्णिग्० १. धकार करने का प्रयोजन 'नहः' आदि में झषस्तथोर्धोऽधः (५४६) की प्रवृत्ति कराना है अन्यथा 'नहो दः' सूत्र ही बनाते । ल० प्र० (३१)

४८२ भैमोध्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां

(३०१) सूत्रद्वारा 'उद्' पूर्वक 'स्निह्' (दिवा० प०) धातु से क्विबन्त निपातन किया जाता है। उष्णिह् + सुँ । सुँलोप, क्विबन्त होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) द्वारा हकार को घकार, जश्त्व से घकार को गकार तथा वैकल्पिक चर्त्व से गकार को ककार होकर—'उष्णिक्, उष्णिग्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० उष्णिक्, ग् उष्णिहौ उष्णिहः | प० उष्णिहः उष्णिग्भ्याम् उष्णिग्भ्यः द्वि० उष्णिहम् ,, ,, | प० ,, उष्णिहोः उष्णिहाम् तृ० उष्णिहा उष्णिग्भ्याम्* उष्णिग्भिः | स० उष्णिहि ,, उध्रिक्षु† च० उष्णिहे ,, उष्णिग्भ्यः | सं० हे उष्णिक्, ग्! उष्णिहौ! उष्णिहः! * क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४), झलां जशोऽन्ते (६७)। † कुत्व, जश्त्व, षत्व, खरि च (७४) से चर्त्व। (यहां हकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —•०•— [लघु०] द्योः । दिवौ । दिवः । द्युभ्याम् ॥ व्याख्या—'दिव्' (आकाश वा स्वर्ग) शब्द विशुद्ध अवस्था में नित्यस्त्रीलिङ्ग होता है। पुल्ँलिङ्ग आदि में इसका प्रयोग बहुव्रीहिसमासवश हुआ करता है। इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया हलन्तपुल्लिङ्गान्तर्गत 'सुदिव्' शब्दवत् होती है। रूपमाला यथा – प्र० द्यौ† दिवौ दिवः | प० दिवः द्युभ्याम् द्युभ्यः द्वि० दिवम् ,, ,, | प० ,, दिवोः दिवाम् तृ० दिवा द्युभ्याम्‡ द्युभिः | स० दिवि ,, द्युषु च० दिवे ,, द्युभ्यः | सं० हे द्यौ ! हे दिवौ ! हे दिवः ! †दिव औत् (२६४) । ‡दिव उत् (२६५) । (यहां वकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:०:— [लघु०] गीः । गिरौ । गिरः । एवम्—पूः ॥ व्याख्या—गिर् = वाणी । गृ निगरणे (तुदा० प०) धातु से क्विप्, उस का सर्वापहार लोप, ऋत इद्धातो (६६०) से इत्व तथा उरण्रपरः (२६) से रपर करने पर 'गिर्' शब्द निष्पन्न होता है। गिर्+स् (सुँ) । सुँलोप होकर क्विबन्ता धातुत्वं न जहाति इस कथन से धातु होने से पदान्त मे र्वोरुपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ होकर 'गीर्' बना। अब रेफ को विसर्ग आदेश करने से—'गीः' प्रयोग सिद्ध होता है। गिर्+औ = गिरौ। यहां पदान्त न होने से उपधादीर्घ नहीं होता। गिर्+भ्याम्। यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) द्वारा पदत्व होने से र्वोरुपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ हो जाता है—गीर्भ्याम् ।

हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८३

गिर्+सुप्। यहां पदान्त में उपधादीर्घ होकर इण्—रेफ से परे प्रत्यय के अवयव सकार को षकार (१५०) हो जाता है—गीर्षु। ध्यान रहे कि यहां रोः सुपि (२६८) के नियमानुसार रेफ को विसर्ग आदेश नहीं होता। समग्र रूपमाला यथा— प्र० गीः गिरौ गिरः | प० गिरः गीर्भ्याम् गीर्भ्यः द्वि० गिरम् ,, ,, | ष० ,, गिरोः गिराम् तृ० गिरा गीर्भ्याम् गीर्भिः | स० गिरि ,, गीर्षु च० गिरे ,, गीर्भ्यः | सं० हे गीः ! हे गिरौ ! हे गिरः! इसी प्रकार—पुर्=(नगर)। पृ पालनपूरणयोः (जुहो० प०) धातु से क्विँप्, उसका सर्वापहारलोप, उदोष्ठ्यपूर्वस्य (६११) से उत्व तथा उरण्रपरः (२६) से रपर करने पर 'पुर्' शब्द निष्पन्न होता है। इस की भी सम्पूर्ण प्रक्रिया 'गिर्' शब्द की तरह होती है। रूपमाला यथा— प्र० पूः¹ पुरौ पुरः | प० पुरः पूर्भ्याम् पूर्भ्यः द्वि० पुरम् ,, ,, | ष० ,, पुरोः पुराम् तृ० पुरा पूर्भ्याम् पूर्भिः | स० पुरि ,, पूर्षु च० पुरे ,, पूर्भ्यः | सं० हे पूः ! हे पुरौ ! हे पुरः ! इसी प्रकार—धुर् (गाड़ी का अग्रिम भाग) प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं। [लघु०] चतस्रः। चतसृणाम्॥ व्याख्या—चतुर्=(चार)। स्त्रीलिङ्ग में विभक्ति परे होने पर चतुर् शब्द को त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ (२२४) सूत्र से 'चतसृ' आदेश हो जाता है।² चतसृ+अस् (जस्)। ऋतो ङि० (२०४) से गुण प्राप्त होने पर उस के अपवाद अचि र ऋतः (२२५) से रेफ आदेश करने पर—'चतस्रः' प्रयोग सिद्ध होता है। चतसृ+अस् (शस्)। यहां सर्वनामस्थान परे न होने से पूर्वोक्त गुण प्राप्त नहीं होता। प्रथमयोः० (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर उस के अपवाद अचि र ऋतः (२२५) द्वारा रेफ आदेश हो जाता है—चतस्रः। चतसृ+आम्। अचि र ऋतः (२२५) का बाध कर नुमचिर० (वा० १६) की सहायता से पूर्वविप्रतिषेध से ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) द्वारा नुट् का आगम हो जाता है—चतसृ+नाम्। अब नामि (१४६) से प्राप्त दीर्घ का न तिसृ-चतसृ (२२६) से निषेध हो जाता है, पुनः ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) से णत्व होकर 'चतसृणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। चतसृ (स्त्रीलिङ्ग में चतुर्) शब्द की रूपमाला यथा— १. इसका भ्रामक रूप इस उक्ति में प्रसिद्ध है—का पूर्वः (का, पूः=नगरी, वः= युष्माकम् । तुम्हारी कौन-सी नगरी है ?)। २. यहां यह नहीं भूलना चाहिये कि चतसृशब्द से ऋन्नेभ्यो ङीप् (२३२) से प्राप्त ङीप् का न षट्स्वस्रादिभ्यः (२३३) से निषेध हो जाता है।

४८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० * * चतस्रः | प० * * चतसृभ्यः द्वि० * * " | ष० * * चतसृणाम् तृ० * * चतसृभिः | स० * * चतसृषु च० * * चतसृभ्यः | —— ० —— (यहां रेफान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] का। के। काः। सर्वावत्॥ व्याख्या किम्(कौन)। 'किम्' शब्द के पुँल्लिङ्ग में रूप कह चुके हैं। अब स्त्रीलिङ्ग में रूप सिद्ध किये जाते हैं। विभक्ति परे होने पर सर्वत्र किमः कः (२७१) द्वारा 'किम्' को 'क' सर्वादेश हो जाता है। पुनः स्त्रीत्व की विवक्षा में अजाद्यतष्टाप् (१२४५) से टाप् (आ) प्रत्यय होकर सवर्णदीर्घ करने से 'का' शब्द निष्पन्न होता है सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) से इस की सर्वनामसंज्ञा होने से सम्पूर्ण प्रक्रिया 'सर्वा'शब्दवत् होती है। 'का' (स्त्रीलिङ्ग में किम् शब्द) की रूपमाला यथा — प्र० का के काः | प० कस्याः काभ्याम् काभ्यः द्वि० काम् " " | ष० ,,† कयोः* कासाम्‡ तृ० कया* काभ्याम् काभिः | स० कस्याम्† ,,* कासु च० कस्यै† " काभ्यः | सम्बोधन प्राय नहीं होता। *आङि चापः (२१८)। † सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०)। ‡ आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५)। [लघु०] विधि सूत्रम्—(३६१) यः सौ ॥७।२।११०॥ इदमो दस्य यः। इयम्। त्यदाद्यत्वम्। पररूपत्वम्। टाप्। दश्च (२७५) इति मः। इमे। इमाः। इमाम्। अनया। हलि लोपः (२७७) आभ्याम्। आभिः। अस्यै। अस्याः। अनयोः। आसाम्। अस्याम्। आसु॥ अर्थ—सुँ परे होने पर इदम् के दकार को यकार आदेश हो जाता है। व्याख्या—इदमः ६।१। (इदमो मः से)। दः ६।१। (दश्च से)। यः १।१। सौ ७।१। अर्थ—(इदमः) इदम् शब्द के (दः) द् के स्थान पर (यः) य् आदेश हो जाता है (सौ) सुँ परे होने पर। यह सूत्र केवल स्त्रीलिङ्ग में ही प्रवृत्त होता है। क्योंकि पुँल्लिङ्ग में सुँ परे होने पर इदोऽय् पुंसि (२७३) सूत्र से इदम् को अय् आदेश हो जाने से दकार नहीं मिल सकता। नपुंसक में भी सुँ का लुक् हो जाने से प्रत्ययलक्षण न होने से इस अव- काश नहीं मिलता। 'इदम्' शब्द के पुँल्लिङ्ग में रूप सिद्ध किये जा चुके हैं, अब स्त्रीलिङ्ग में रूप सिद्ध करते हैं—

हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८५ इदम् + स् (सुँ) । यहां प्रकृतसूत्र से दकार को यकार हो कर हल्ङ्याब्भ्यः० .(१७६) से सुँ का लोप हो जाता है—इयम्। ध्यान रहे कि यहां इदमो मः (२७२) के निषेध के कारण त्यदाद्यत्व नहीं होता। इदम् + औ। त्यदाद्यत्व, पररूप, अजाद्यतष्टाप् (१२४५) से टाप्, अनुबन्ध- लोप कर सवर्णदीर्घ करने से—इदा+औ। अब दश्च (२७५) सूत्र से दकार को मकार, औङ आपः (२१६) से औकार को शी, अनुबन्धलोप तथा गुण करने पर— इमे । इदम् + अस् (जस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ तथा दश्च (२७५) से दकार को मकार होकर—इमा + अस् । अब दीर्घाज्जसि च (१६२) से पूर्वसवर्ण- दीर्घ का निषेध होकर अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा सकार को रुँत्व विसर्ग करने से—इमाः। इदम् + अम् । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ, दश्च (२७५) सूत्र से दकार को मकार तथा अमि पूर्वः (१३५) से पूर्वरूप होकर—इमाम्। इदम् + अस् (शस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ तथा दकार को मकार होकर पूर्वसवर्णदीर्घ करने से—इमास् = इमाः। नोट—जस् में सवर्णदीर्घ और शस् में पूर्वसवर्णदीर्घ यह ज्ञातव्य है। इदम् + आ (टा) = इद + आ = इदा + आ । अब यहां अनाप्यकः (२७६) सूत्र से इद् भाग को अन् आदेश, आङि चापः (२१८) से प्रकृति के आकार को एकार तथा एचोऽयवायावः (२२) से अय् आदेश करने पर—अनया । इदम् + भ्याम् = इद + भ्याम् = इदा + भ्याम् । हलि लोपः (२७७) से इद् भाग का लोप होकर—आभ्याम् । इसी प्रकार—आभिः। इदम् + ए (ङे) = इद + ए = इदा + ए । अब सर्वनामसञ्ज्ञा होकर प्रथम नित्य होने से सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) सूत्र से स्याट् आगम और आप् को ह्रस्व हो जाता है—इद + स्या ए। अब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि और हलि लोपः (२७७) से इद् भाग का लोप करने से—अस्यै। इदम् + अस् (ङसिँ वा ङस्) = इद + अस् = इदा + अस्। यहां भी पूर्ववत् सर्वनामसञ्ज्ञा, स्याट् आगम तथा आप् को ह्रस्व होकर—इद + स्या अस् । अब अकः सवर्णे दीर्घः (४२) से सवर्णदीर्घ तथा हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप होकर— अस्यास् = अस्याः । इदम् + ओस् = इद + ओस् = इदा + ओस् । अनाप्यकः (२७६) से इद् को अन् आदेश, आङि चापः (२१८) से आप् की एकार तथा एकार को अय् आदेश करने पर—अनयोः। इदम् + आम् = इद + आम् = इदा + आम् । सर्वनामसञ्ज्ञा होकर आमि सर्वनाम्नः सुँट् (१५५) से सुँट् का आगम तथा हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप हो जाता है—आसाम् ।

४८६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां इदम् + ङि (डि) = इद + ङि = इदा + ङि । यहां डेराम्नद्याम्नीभ्यः (१६८) से ङि को आम्, सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०) से स्याट् आगम और आप् को ह्रस्व, हलि लोपः (२७७) से इद् का लोप तथा सवर्णदीर्घ करने पर— अस्याम् । इदम् + सुप् = इद + सु = इदा + सु = आसु [ हलि लोपः (२७७) ] । 'इदम्' (यह) शब्द की स्त्रीलिङ्ग में रूपमाला यथा — प्र० इयम् इमे इमा | प० अस्या आभ्याम् आभ्यः द्वि० इमाम् " " | ष० " अनयोः आसाम् तृ० अनया आभ्याम् आभिः | स० अस्याम् " आसु च० अस्यै " आभ्यः सम्बोधन प्रायः नहीं होता । नोट—अन्वादेश में द्वितीया, टा और ओस् विभक्तियों के परे होने पर द्वितीया- टौस्स्वेनः (२८०) से इदम् को एन आदेश हो जाता है । तब टाप् प्रत्यय होकर विभक्ति कार्य करने से—एनाम्, एने, एनाः, एनया, एनयोः—रूप बन जाते हैं। (यहां मकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) [लघु०] त्यदाद्यत्वम् । टाप्—स्या, त्ये, त्याः । एव तद्, एतद् ॥ व्याख्या—त्यद् (वह) । 'त्यद्' शब्द के पुंल्लिङ्ग में रूप दर्शाए जा चुके हैं। अब स्त्रीलिङ्ग में रूप दर्शाए जाते हैं— त्यद् + स् (सुँ) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ, तदोः सः सावनन्त्ययोः (३१०) से तकार को सकार तथा हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से अपृक्त सकार का लोप होकर—स्या । त्यद् + औ = त्य + औ = त्या + औ । औङ आपः (२१६) से शी आदेश तथा अनुबन्धलोप कर गुण करने से—त्ये । आगे सर्वत्र त्यदाद्यत्व पररूप और टाप् होकर 'त्या' रूप बन जाता है । तब इस की प्रक्रिया 'सर्वा'शब्दवत् होती है । रूपमाला यथा— प्र० स्या त्ये त्याः | प० त्यस्याः त्याभ्याम् त्याभ्यः द्वि० त्याम् " " | ष० " त्ययोः त्यासाम् तृ० त्यया त्याभ्याम् त्याभिः | स० त्यस्याम् " त्यासु च० त्यस्यै " त्याभ्यः सम्बोधन प्रायः नहीं होता । तद् (वह) । 'तद्' शब्द की भी प्रक्रिया 'त्यद्' शब्द के समान होती है। तद् + सुँ । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप्, सवर्णदीर्घ होकर—'ता + स्' । अब तदोः सः सावनन्त्ययोः (३१०) से तकार को सकार तथा हल्ङ्याब्भ्य० (१७६) से सुँ का लोप होकर— सा । 'तद्' शब्द की स्त्रीलिङ्ग में रूपमाला यथा— प्र० सा ते ताः | प० तस्याः ताभ्याम् ताभ्यः द्वि० ताम् " " | ष० " तयोः तासाम् तृ० तया ताभ्याम् ताभिः | स० तस्याम् " तासु च० तस्यै " ताभ्यः | सम्बोधन प्रायः नहीं होता ।

हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८७ एतद् (यह)। 'एतद्' शब्द की भी स्त्रीलिङ्ग में समग्र प्रक्रिया 'त्यद्, तद्' शब्दों की तरह होती है। रूपमाला यथा— प्र० एषा एते एताः | प० एतस्याः एताभ्याम् एताभ्यः द्वि० एताम् " " | प० " एतयोः एतासाम् तृ० एतया एताभ्याम् एताभिः | स० एतस्याम् " एतासु च० एतस्यै " एताभ्यः | सम्बोधन प्रायः नहीं होता। (यहां दकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:०:— [लघु०] वाक्, वाग्। वाचौ। वाग्भ्याम्। वाक्षु॥ व्याख्या—वाच् (वाणी)। वच परिभाषणे (अदा० प०) धातु से विवँद्वचि० (वा० ४८) द्वारा क्विन्‌, दीर्घ और सम्प्रसारण का अभाव करने पर 'वाच्' शब्द निष्पन्न होता है। पदान्त में इसे चोः कुः (३०६) द्वारा सर्वत्र कव drop/र्गादेश हो जाता है। 'वाच्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० वाक्,-ग्* वाचौ वाचः | प० वाचः वाग्भ्याम् वाग्भ्यः द्वि० वाचम् " " | प० " वाचोः वाचाम् तृ० वाचा वाग्भ्याम्‡ वाग्भिः | स० वाचि " वाक्षु† च० वाचे " वाग्भ्यः | सं० हे वाक्,-ग्! हे वाचौ! हे वाचः! *सुंलोप, चोः कुः (३०६) से चकार को ककार, तथा जश्त्व-चर्त्व (६७, १४६)। ‡चोः कुः (३०६) से कुत्व हो कर झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व हो जाता है। †चोः कुः, झलां जशोऽन्ते, आदेशप्रत्यययोः (१५०), खरि च (७४)। इसी प्रकार—शुच् (शोक), त्वच् (त्वगिन्द्रिय) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। [लघु०] अप्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः। अप्तृन्तृच्० (२०६) इति दीर्घः। आपः। अपः॥ व्याख्या—अप् (जल)। 'अप्' शब्द संस्कृतसाहित्य में नित्यबहुवचनान्त¹ तथा १. त्रि, चतुर्, पञ्चन् आदि शब्दों का बहुवचन में प्रयोग तो समझ में आ सकता है; परन्तु जब अप्, दार आदि शब्दों का बहुवचन में प्रयोग सामने आता है तो वैसा कोई कारण प्रतीत नहीं होता। आधुनिक कई वैज्ञानिक दो गैसों के संयोग को ही जलतत्त्व नाम देते हैं, शायद सूक्ष्म अनुसन्धान से किन्हीं अन्य गैसों का भी मिश्रण प्रतीत हो और उन सब के संयोगात्मक तत्त्व 'अप्' को प्राचीन आर्यों ने नित्यबहुवचनान्त माना हो अथवा जल के अनेक सूक्ष्म बिन्दुओं के कारण यह बहुवचनान्त माना गया हो। किञ्च जल, वारि आदि को बहुवचन न मानकर 'अप्' को ही बहुवचनान्त मानने का कारण शायद आपॢँ व्याप्तौ धातु भी हो जिस से अप् शब्द की निष्पत्ति होती है। 'दार' शब्द शायद इसलिये बहुवचनान्त

स्त्रीलिङ्ग में प्रयुक्त होता है। आपः स्त्री भूम्नि वार्वारि—इत्यमरः । लिङ्गानुशासन के स्त्रीप्रकरण में भी अप्-सुमनस्-समा-सिकता-वर्षाणां बहुत्वं च (सूत्र २६) । आप्नुवन्ति शरीरमिति आपः । 'आप्नॢँ व्याप्तौ (स्वा० प०) धातु से 'आप्नोतेर्ह्रस्वश्च (उणा० २।१६) सूत्र द्वारा क्विप् प्रत्यय तथा धातु के आकार को ह्रस्व करने पर जलवाचक 'अप्' शब्द निष्पन्न होता है । अप् + अस् (जस्) । 'जस्' प्रत्यय सर्वनामस्थानसञ्ज्ञक होता है अतः उसके : परे होने पर अप्तृन्० (२०६) सूत्र द्वारा 'अप्' की उपधा को दीर्घ होकर—आपस् : = 'आपः' प्रयोग बनता है । अप् + अस् (शस्) । शस् सर्वनामस्थान नहीं अतः इस के परे उपधादीर्घ नहीं होता । स्वर-व्यञ्जन का संयोग हो रुत्व-विसर्ग करने से—अपः । अप् + भिस् । यहां अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३६२) अपो भि ।७।४।४८॥ अपस्तकारो भादौ प्रत्यये । अद्भिः । अद्भ्यः २ । अपाम् । अप्सु ॥ अर्थः—भकारादि प्रत्यय परे हो तो 'अप्' को तकार आदेश हो । व्याख्या—अपः ।६।१। तः ।१।१। (अच उपसर्गात्तः से । तकारादकार उच्चार- णार्थः) । भि ।७।१। (अङ्गस्य का अधिकार होने से 'प्रत्यये' उपलब्ध हो जाता है । 'प्रत्यये' विशेष्य और 'भि' विशेषण है । विशेषण के अल् होने से तदादिविधि होकर —'भादौ प्रत्यये' बन जाता है) । अर्थ —(भादौ प्रत्यये) भकारादि प्रत्यय परे होने पर (अपः) 'अप्' शब्द के स्थान पर (तः) त् आदेश हो जाता है । अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल् पकार के स्थान पर होगा । सुपो में भकारादि प्रत्यय भ्याम् और भिस् के अतिरिक्त कोई नहीं है । 'अप् + भिस्' यहां पकार को तकार होकर जश्त्व करने से—अद्भिः । इसी प्रकार—अद्भ्यः । अद्भिर्गात्राणि शुध्यन्ति मनः सत्येन शुध्यति—(मनु० ५ ।१०६) । अप् + आम् = अपाम् । अप् + सुप् = अप्सु । यहां भकारादि प्रत्यय परे न होने से तकार आदेश न होगा । अप् (जल) शब्द की समग्र रूपमाला यथा —


माना गया हो कि पूर्वकाल में एक पुरुष की अनेक स्त्रियां होती थीं । किञ्च दृ विदारणे धातु भी शायद इस में कारण हो जिस के अन्यत्र भार्या आदि में न होने के कारण वे नित्य-बहुवचनान्त न बन सके हों । सिकता और वर्षा शब्द तो सिकताकणों और जलकणों के समूह के कारण ही बहुवचनान्त माने गये प्रतीत होते हैं; जहां एक कण की विवक्षा होती है वहां एकवचन का भी प्रयोग देखा जाता है । यथा महाभाष्य में – एका च सिकता तैलदानेऽसमर्था । संस्कृत में लिङ्ग और वचनों का विषय पर्याप्त अनुसन्धेय है ।

हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८१ विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० ॰ ॰ आपः प० ॰ ॰ अद्द्भ्यः द्वि० ॰ ॰ अपः ष० ॰ ॰ अपाम् तृ० ॰ ॰ अद्भिः स० ॰ ॰ अप्सु च० ॰ ॰ अद्द्भ्यः सं० ॰ ॰ हे आपः! (यहां पकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:०:— [लघु०] दिक्, दिग्। दिशः। दिग्भ्याम्॥ व्याख्या—दिक् (दिशा)। यह शब्द ऋत्विग्वद्धृक्० (३०१) सूत्र से क्विन्नन्त निपातन किया गया है। दिश्+सुं। सुंलोप, व्रश्चभ्रस्ज० (३०७) से षत्व, झलां जशोऽन्ते (६७) से डत्व, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से गकार तथा वाऽवसाने (१४६) से वैकल्पिक चर्त्व=ककार करने से—‘दिक्, दिग्’ ये दो रूप सिद्ध होते हैं। दिश्+भ्याम्। पदान्त में षत्व, डत्व और कुत्व होकर—दिग्भ्याम्। ‘दिक्’ शब्द की रूपमाला यथा— प्र० दिक्-ग् दिशौ दिशः प० दिशः दिग्भ्याम् दिग्भ्यः द्वि० दिशम् ,, ,, ष० ,, दिशोः दिशाम् तृ० दिशा दिग्भ्याम् दिग्भिः स० दिशि ,, दिक्षु च० दिशे ,, दिग्भ्यः सं० हे दिक्-ग्! दिशौ! दिशः! इसी शब्द का आपं चैव हलन्तानाम् से आप् करने पर ‘दिशा’ शब्द बन जाता है, तब ‘रमा’ की तरह रूप चलते हैं। इसे अव्ययप्रकरण के अन्त में देखें। [लघु०] त्यदादिषु० (३४७) इति दृशेः क्विग्विधानादन्यत्रापि कुत्वम्। दृक्, दृग्। दृशौ। दृग्भ्याम्॥ व्याख्या—दृश् (आंख, दृष्टि)। दृश्यन्तेऽर्था अनयेति विग्रहे सम्पदादित्वाद् दृशेः क्विप्ँ। ‘दृश्’ शब्द क्विबन्त है क्विन्नन्त नहीं। दृश्+सुँ। यहां अपृक्त सकार का लोप होकर पदान्त में व्रश्चभ्रस्ज० (३०७) सूत्र से शकार को षकार, झलां जशोऽन्ते (६७) से षकार को डकार, क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से डकार को कुत्व-गकार तथा वाऽवसाने (१४६) सूत्र से वैकल्पिक चर्त्व-ककार करने से—‘दृक्, दृग्’ ये दो रूप बनते हैं। वक्तव्य—यद्यपि यहां क्विन् प्रत्यय न होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) द्वारा कुत्व न होना चाहिये था; तथापि ‘क्विन्प्रत्ययो यस्मात्’ ऐसा विग्रह कर बहु- व्रीहिसमास स्वीकार करने से कुत्व हो जाता है कोई दोष प्रसक्त नहीं होता। तात्पर्य यह है कि जिस धातु से कहीं भी क्विन्प्रत्यय देखा गया हो चाहे अब उस से वह किया गया हो या न हो उसे कुत्व हो जायेगा। ‘दृश्’ धातु से यहां तो क्विन् नहीं

४६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां हुआ किन्तु 'तादृश्' शब्द में त्यदादिषु० (३८७) सूत्र द्वारा देखा जाता है अत यहाँ क्विन् के अभाव में भी कुत्व हो जायेगा। दृश् + भ्याम् । षत्व, डत्व और कुत्व होकर — दृग्भ्याम् । दृग्भिः । दृग्भ्यः । 'दृश्¹' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० दृक्-ग् दृशौ दृशः | प० दृशः दृग्भ्याम् दृग्भ्यः द्वि० दृशम् ,, ,, | ष० ,, दृशोः दृशाम् तृ० दृशा दृग्भ्याम् दृग्भिः | स० दृशि ,, दृक्षु च० दृशे ,, दृग्भ्यः | सं० हे दृक्-ग् ! हे दृशौ ! हे दृशः ! इसी प्रकार —तादृश, एतादृश, यादृश् आदि के स्त्रीलिङ्ग में रूप समझने चाहियें² । (यहाँ शकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —•— [लघु०] त्विट्, त्विड्। त्विड्भ्याम्॥ व्याख्या—त्विष् (कान्ति)। त्विषेँ दीप्तौ (भ्वा० उभ०) धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'त्विष्' शब्द निष्पन्न होता है। 'त्विष्' शब्द की सम्पूर्ण प्रक्रिया पुँल्लिङ्ग के 'रत्नमुष्' शब्द के समान होती है। रूपमाला यथा— प्र० त्विट्-ड्* त्विषौ त्विषः | प० त्विषः त्विड्भ्याम् त्विड्भ्यः द्वि० त्विषम् ,, ,, | ष० ,, त्विषोः त्विषाम् तृ० त्विषा त्विड्भ्याम्† त्विड्भिः | स० त्विषि ,, त्विट्त्सु-ट्सु‡ च० त्विषे ,, त्विड्भ्यः | सं० हे त्विट्-ड् ! हे त्विषौ ! हे त्विषः ! *झलां जशोऽन्ते (६७), वाऽवसाने (१४६) । †झलां जशोऽन्ते (६७) । ‡जश्त्व करने पर धुँट् प्रक्रिया । इसी प्रकार—प्रावृष्, (वर्षा ऋतु), रुष् (क्रोध) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। [लघु०] ससजुषो रुँ (१०५) इति रुँत्वम् । सजूः । सजुषौ । सजूभ्याम् । आशीः । आशिषौ । आशीर्भ्याम् ॥ व्याख्या—सजुष् (मित्र) । सह जुषते=सेवते इति सजूः । जुषीँ प्रीतिसेवनयोः (तुदा० आ०) इति धातोः क्विप् । सहस्य सः संज्ञायाम् (६/३/७७) इति सूत्रेण, ससजुषो रुँ (१०५) इति निपातनाद्वा सहस्य स भावः । 'सजुष्+सुँ' । सुँलोप होकर ससजुषो रुँ (१०५) सूत्र में विशेष उल्लेख के कारण सजुष् के षकार को रुँ आदेश, वोरोपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ तथा रेफ को विसर्ग करने से 'सजूः' प्रयोग सिद्ध होता है। १ 'तादृश्' शब्द के रूपों में 'ता' हटा दिया जाये तो 'दृश्' शब्द के रूप हो जाते हैं। २ तादृशी, एतादृशी, यादृशी आदि रूप क्वबन्त 'तादृश्' आदि शब्दों से टिड्ढाणञ्० (१२४७) द्वारा ङीप् कर भसंज्ञक अकार का लोप करने से बनते हैं। इन के उच्चारण नदीवत् होते हैं !