लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथ हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् अब क्रमप्राप्त हलन्तस्त्रीलिङ्गप्रकरण का आरम्भ किया जाता है। इस प्रकरण में भी सब शब्द प्रत्याहारक्रम से कहे गये हैं। अब प्रथम हयवरट् (प्रत्याहारसूत्र ५) के क्रमानुसार हकारान्त शब्द कहे जाते हैं— [लघु०] विधि सूत्रम् — (३५६) नहो धः ।८।२।३४॥ नहो हस्य धः स्याज्झलि पदान्ते च ॥ अर्थ—नह् के हकार को धकार हो जाता है झल् परे होने पर या पदान्त में। व्याख्या—झलि ।७।१। (झलो झलि से) । पदस्य ।६।१। (यह अधिकृत है) । अन्ते ।७।१। (स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से) । नहः ।६।१। धः ।१।१। धकारादकार उच्चारणार्थः। अर्थ—(झलि) झल् परे होने पर या (पदस्य) पद के (अन्ते) अन्त में (नहः) नह् धातु के स्थान पर (धः) ध् आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि द्वारा यह आदेश नह् धातु के अन्त्य अल् हकार के स्थान पर होगा। यह 'हो ढः' (२५१) सूत्र का अपवाद है। इस सूत्र का उपयोग 'उपानह्' शब्द में किया जाता है अतः प्रथम 'उपानह्' शब्द की निष्पत्ति की जाती है। [लघु०] विधि सूत्रम्—(३६०) नहि-वृति-वृषि-व्यधि-रुचि-सहि-तनिषु क्वौ ।६।३।११५॥ नह्याद्यन्तेषु पूर्वपदस्य दीर्घः। उपानत्, उपानद् । उपानहौ । उपानत्सु ॥ अर्थ—नह्, वृत्, वृष्, व्यध्, रुच्, सह्, और तन्—ये क्विबन्त धातु परे हों तो पूर्वपद को दीर्घ हो जाता है। व्याख्या—नहि वृति वृषि व्यधि रुचि-सहि-तनिषु ।७।३। क्वौ ।७।१। पूर्वस्य ।६।१। दीर्घः ।१।१। (ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः से)। यह सूत्र उत्तरपदाधिकार में पढ़ा गया है अतः 'पूर्वस्य' का 'पदस्य' विशेषण उपलब्ध हो जाता है। यद्यपि 'क्वौ' ग्रहण से क्विप् और क्विन् दोनों का ग्रहण हो सकता है तथापि नह् आदि धातुओं से क्विन् का विधान न होने से अवशिष्ट क्विप् का ही ग्रहण होता है। अर्थ—(क्वौ) क्विबन्ते परे होने पर (नहि-वृति वृषि व्यधि-रुचि-सहितनिषु) जो नह्, वृत्, वृष्, व्यध्, रुच्, सह्, और तन् धातु, इन के परे होने पर (पूर्वस्य) पूर्व (पदस्य) पद के स्थान पर (दीर्घः) दीर्घ हो जाता है। अलोऽन्त्यस्य (२१) तथा अचश्च (१.२.२८) परिभाषाओं द्वारा यह दीर्घ पूर्वपद के अन्त्य अच् के स्थान पर होता है। क्विप् परे होने पर जो नह्, वृत् आदि धातु, उन के परे होने पर—इसका अभिप्राय—क्विबन्त नह्, वृत् आदि धातु परे होने पर—ऐसा समझना चाहिये। अत एव वृत्ति में यही लिखा है।