लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७३ दुर्वासस् (एक ऋषि), १५. विमनस् (दुःखी पुरुष), १६. विडौजस् (इन्द्र) प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं।¹ अदस् (वह-दूरवर्त्ती पदार्थ जिसका अङ्गुली से निर्देश नहीं किया जा सकता)। न दस्यते = उत्क्षिप्यतेऽङ्गुलिर्यत्र-इस विग्रह में नञ्पूर्वक दस् धातु से क्विप् प्रत्यय करने पर 'अदस्' शब्द निष्पन्न होता है। त्यदादियों के अन्तर्गत होने के कारण इस की सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) द्वारा सर्वनामसंज्ञा होती है। यह शब्द त्रिलिङ्गी है। यहां पुंलिङ्ग में इस की सुबन्त-प्रक्रिया का निरूपण करते है— [लघु०] विधि-सूत्रम्- (३५५) अदस औ सुँलोपश्च ॥७।२।१०७॥ अदस औत् स्यात् सौ परे सुँलोपश्च। तदोः० (३१०) इति सः। असौ। त्यदाद्यत्वम्। पररूपत्वम्। वृद्धिः॥ अर्थः-सुँ परे होने पर अदस् शब्द के अन्त्य सकार को औकार तथा सुं का लोप हो जाता है। व्याख्या-सौ ।७।१। (तदोः सः सावनन्त्ययोः से)। अदसः ।६।१। औ ।१।१। (यहां विभक्ति का लुक् हुआ है)। सुंलोपः ।१।१। च इत्यव्ययपदम्। समासः--सोर्लोपः = सुलोपः, षष्ठीतत्पुरुषः। अर्थः- (सौ) सुँ परे होने पर (अदसः) अदस् शब्द के स्थान पर (औ) 'औ' आदेश होता है (च) तथा (सुंलोपः) सुँ का भी लोप हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि द्वारा यह औकार आदेश अन्त्य अल् सकार के स्थान पर होगा। 'अदस औ' इस अंश में यह सूत्र त्यदादीनामः (१६३) सूत्र का अपवाद है। अदस् + सुँ। यहां त्यदादीनामः (१६३) के प्राप्त होने पर अदस औ सुँलो- पश्च (३५५) सूत्र से सकार को औकार तथा सुं का लोप होकर - अद+औ। वृद्धि- रेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने से- 'अदौ'। अब प्रत्ययलक्षण द्वारा लुप्त हुए सुँ- प्रत्यय को मान कर तदोः सः सावनन्त्ययोः (३१०) सूत्र से दकार को सकार करने पर- 'असौ' प्रयोग सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि 'अदौ' इस अवस्था में अदसोऽसेर्दादु दो मः (८.२.८०) सूत्र भी प्राप्त होता है परन्तु तदोः सः० (७.२.१०६) सूत्र की दृष्टि में असिद्ध होने से वह प्रवृत्त नहीं होता। अदस् + औ। यहां त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से सकार को अकार तथा अतो १. यहां यह ज्ञातव्य है कि असन्त शब्द में 'अस्' यदि धातु का अवयव होगा तो अत्वसन्तस्य चाधातोः (३४३) सूत्र में 'अधातोः' कथन के कारण उस असन्त की उपधा को दीर्घ न होगा। यथा-सुपूर्वक वस् आच्छादने (अदा० आ०) धातु से क्विन् प्रत्यय करने पर 'सुवस्' (अच्छी तरह ढांपने वाला) शब्द निष्पन्न होता है। यह शब्द असन्त तो है पर इस के अन्त में 'अस्' यह 'वस्' धातु का अवयव है अतः 'सुवस्+स्' में उपधादीर्घ न होगा, सुंलोप हो कर सकार को रुँत्व-विसर्ग करने से- सुवः, सुवसौ, सुवसः - आदि रूप बनेगे। इसी प्रकार पिण्ड- ग्रस्, पिण्डग्लस् (पिण्ड खाने वाला) आदि शब्दों के रूप समझने चाहियें।