लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४७२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां शब्द निष्पन्न होता है। इसकी प्रक्रिया भी 'उशनस्' शब्दवत् होती है केवल सम्बुद्धि मे इस का एक रूप बनता है। रूपमाला यथा— प्र० अनेहा† अनेहसौ अनेहस | प० अनेहस अनेहोभ्याम् अनेहोभ्य द्वि० अनेहसम् ,, , | ष० ,, अनेहसो अनेहसाम् तृ० अनेहसा अनेहोभ्याम्‡ अनेहोभि | स० अनेहसि ,, अनेह सु-स्सु* च० अनेहस ,, अनेहोभ्य | स० हे अनेह । @ अनेहसौ। अनेहस । †ऋदुशनस्० (२०५) से अनङ्, अनुबन्धलोप, पररूप, नान्त की उपधा को दीर्घ, सुँलोप तथा नलोप होकर— 'अनेहा' सिद्ध होता है। ‡ससजुषो रुँ (१०५), हशि च (१०७), आव्गुण (२७) । *रुँत्व विसर्ग होकर वा शरि (१०४) प्रवृत्त हो जाता है । @सुँलोप, रुँत्व तथा अवसान मे रेफ को विसर्ग हो जाते हैं । 'अनेहस्' की तरह प्रक्रिया तथा रूपमाला वाला केवल एक ही शब्द है— पुरुदमस् । इस का वेद मे ही प्रयोग देखा जाता है । इस का अर्थ 'इन्द्र' आदि है। 'बहुत कर्मों वाला' इस अर्थ मे यह विशेषणवाची होने से त्रिलिङ्गी है। इसे वैदिक समझ कर ही कौमुदीकार ने सम्भवत इस का उल्लेख नही किया । [लघु०] वेधा । वेधसौ ।'हे वेध '। वेधोभ्याम् ॥ व्याख्या—वेधस् = (ब्रह्मा) । स्रष्टा प्रजापतिर्वेधा इत्यमरः । विपूर्वकं डुधाञ् धारणपोषणयो (जुहो० उभ०) धातु से विधाञो वेध च (उणा० ६६४) इस औणा- दिकसूत्र द्वारा 'असिँ' प्रत्यय तथा सोपसर्ग 'धा' को 'वेध्' आदेश होकर 'वेधस्' शब्द निष्पन्न होता है । वेधस् + सुँ । असन्तस्य चाधातो (३४३) मे दीर्घ, हल्ङ्याब्भ्यो ०(१७६) से सुँलोप तथा प्रकृति के सकार को रुँत्व विसर्ग करने से—वेधा । अन्य विभक्तियो मे 'अनेहस्' की तरह प्रक्रिया जानें । रूपमाला यथा— प्र० वेधा वेधसौ वेधस | प० वेधस वेधोभ्याम् वेधोग्य द्वि० वेधसम् ,, ,, | ष० ,, वेधसो वेधसाम् तृ० वेधसा वेधोभ्याम्† वेधोभि | स० वेधसि ,, वेध सु,-स्सु च० वेधसे ,, वेधोग्य | स० हे वेध । * वेधसौ । वेधस । †रुँत्व, उत्व तथा गुण हो जाता है । *सुँलोप, रुँत्व तथा विसर्ग होते हैं । इसीप्रकार—१. वनौकस् (बन्दर), २ दिवौकस् (देवता), ३ हिरण्यरेतस् (सूर्य वा अग्नि), ४ चन्द्रमस् (चन्द्रमा), ५. सुमनस् (देवता), ६ प्रचेतस् (वरुण), ७ सुमेधस् (अच्छी बुद्धि वाला), ८ नृचक्षस् (मनुष्यों पर दृष्टि रखने वाला । अथर्व०), ९ जातवेदस् (अग्नि), १० अङ्गिरस् (एक ऋषि) ११. विश्ववेदस् (सब कुछ जानने वाला), १२ पुरोधस् (पुरोहित), १३ वयाधस् (तरुण, जवान) १४.