भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 489

गुणे (२७४) से पररूप कर—'अद्+औ'। अब वृद्धिरेचि (३३) से वृद्धि एकादेश करने पर—'अदौ'। इस अवस्था में अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि सूत्रम्—(३५६) अदसोऽसेर्दादु दो मः ॥८।२।८०॥ अदसोऽमान्तस्य दात् परस्य उदूतो स्तो दस्य मश्च। आन्तरतम्याद् ह्रस्वस्य-उ, दीर्घस्य-ऊ। अमू। जस शी (१५२)। गुण ॥ अर्थ --जिस के अन्त में सकार न हो ऐसे अदस् शब्द के दकार से पर वर्ण को उकार और ऊकार हो जाता है तथा दकार को मकार भी होता है। व्याख्या—अदस ।६।१। असे ।६।१। दात् ।५।१। उ ।१।१। द ।६।१। मः ।१।१। (मकारादकार उच्चारणार्थं) । समास—नास्ति सि = सकार (सकाराद् इकार उच्चारणार्थ ) यस्मिन् स =असि, तस्य =असे । नञ्बहुव्रीहिसमास. । यह 'अदस' का विशेषण है। अदस् शब्द के अन्त में सकार होता है अत यहां असकारान्त अदस् शब्द का ग्रहण अभिप्रेत है। उश्च ऊश्च=उ, समाहारद्वन्द्व । अर्थ -(असे.) असान्त अर्थात् जिस के अन्त में सकार विद्यमान नही ऐस (अदस ) अदस् शब्द के (दात्) दकार स पर वर्ण के स्थान पर (उ) उकार या ऊकार आदेश हो जाता है तथा (द ) दकार के स्थान पर (म ) म् आदेश भी हो जाता है। असान्त अदस् शब्द के दकार से परे वाला वर्ण प्राय ह्रस्व या दीर्घ हुआ करता है¹। स्थानेऽन्तरतमः (१७) द्वारा ह्रस्व वर्ण के स्थान पर ह्रस्व उकार तथा दीर्घ वर्ण के स्थान पर दीर्घ ऊकार होगा²। 'अदौ' यहां असान्त अदस् शब्द के दकार से परे दीर्घ ओकार विद्यमान है। अत प्रकृतसूत्र से ओकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर—'अमू' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस् + अस् (जस्) । यहा त्यदादीनाम (१६३) से सकार को अकार, अतो गुणे (२७४) से पररूप, जसः शी (१५२) से जस् को शी तथा आदगुण (२७) सूत्र से गुण होकर—'अदे'। अब अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) से प्राप्त होने पर उस का अपवाद अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३५७) एत ईद् बहुवचने ॥८।२।८१॥ अदसो दात्परस्य एत ईद्, दस्य च मो बहुह्वर्थोक्तौ। अमी। पूर्वत्रा- १. कही-कही 'हल्' भी पाया जाता है, जैस—अदद्र्यङ्, अमुमुयङ्। यहा दकार से परे 'र्' है। २. आन्तर्य अर्थात् सादृश्य चार प्रकार का होता है—यह हम पीछे स्थानेऽन्तरतमः (१७) सूत्र पर लिख चुके हैं। यहाँ प्रमाणकृत (मात्राकृत) आन्तर्य द्वारा ह्रस्व के स्थान पर ह्रस्व तथा दीर्घ के स्थान पर दीर्घ आदेश होता है। दकार से परे यदि हल् हो तो उसे भी ह्रस्व उकार आदेश होता है।