भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 490

हलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७५ सिद्धम् (३१) इति विभक्तिकार्यं प्राक्, पश्चाद् उत्व-मत्वे । अमुम् । अमू । अमून् । मुत्वे कृते घिसञ्ज्ञायां नाभावः ॥ अर्थः— अदस् शब्द के दकार से परे एकार को ईकार तथा दकार को मकार हो जाता है बहुत अर्थों की उक्ति में । व्याख्या—अदसः ।६।१। दात् ।५।१। (अदसोऽसेर्दादु० से) । एतः ।६।१। ईत् ।१।१। दः ।६।१। मः ।१।१। (अदसोऽसेः० से) । बहुवचने ।७।१। समासः—बहूनां वचनम्—उक्तिः=बहुवचनम्, तस्मिन्=बहुवचने । षष्ठीतत्पुरुषसमासः । अर्थः— (बहुवचने) बहुत्व की विवक्षा में (अदसः) अदस् शब्द के अवयव (दात्) दकार से परे (एतः) 'ए' के स्थान पर (ईत्) 'ई' आदेश हो जाता है तथा (दः) उस दकार के स्थान पर भी (मः) 'म्' आदेश हो जाता है । 'अदे' यहां प्रकृतसूत्र से एकार को ईकार तथा दकार को मकार होकर— 'अमी' प्रयोग सिद्ध होता है । अदस् + अम् । यहां त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—'अद + अम्' । अब यहां अमि पूर्वः (६.१.१०३) से पूर्वरूप तथा अदसोऽसेर्दादु दो मः (८.२.८०) से उत्व- मत्व युगपत् प्राप्त होते हैं । पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा उत्वमत्वविधायक सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम पूर्वरूप होकर 'अदम्' बन जाता है । तदनन्तर उत्व-मत्व हो 'अमुम्' प्रयोग सिद्ध होता है । पूर्वत्रासिद्धम् (३१) इति विभक्तिकार्यं प्राक्, पश्चादुत्वमत्वे । अर्थात् पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र से—अदसोऽसेः० (३५६) तथा एत ईद् बहुवचने (३५७) सूत्र के असिद्ध होने से प्रथम अमि पूर्वः (१३५) आदि सूत्रों द्वारा विभक्तिकार्य होगा तदनन्तर उन सूत्रों की प्रवृत्ति होगी । परन्तु अब इस पर यह विचार उपस्थित होता है कि क्या पूर्वत्रासिद्धम् (३१) से कार्य असिद्ध किया जाता है या शास्त्र असिद्ध ? यदि किये हुए कार्य को असिद्ध मानेंगे तो प्रथम कार्य का विद्यमान होना आवश्यक होगा; क्योंकि यदि कार्य ही विद्यमान न रहेगा तो पुनः वह असिद्ध कैसे हो १. यहां 'बहुवचन' शब्द से पारिभाषिक बहुवचन—जस्, शस् आदि का ग्रहण नहीं करना चाहिये । क्योंकि वैसा अर्थ करने से 'अदेभ्यः=अमीभ्यः, अदेभिः= अमीभिः' आदि प्रयोगों के सिद्ध हो जाने पर भी 'अदे=अमी' यहां प्रयोगसिद्धि न हो सकेगी । क्योंकि 'अदे' में एकार स्वयं बहुवचन है इस से परे अन्य कोई बहुवचन नहीं है । अतः यहां 'बहुवचने' पद को यौगिक स्वीकार कर 'बहुतों की उक्ति अर्थात् बहुत्व की विवक्षा में' ऐसा अर्थ करना उचित है । इस अर्थ से 'अदे' आदि सब स्थानों पर बहुत्व की विवक्षा वर्तमान रहने से कोई दोष प्राप्त नहीं होता । इस सूत्र पर भाष्यकार ने लिखा है—नेदं पारिभाषिकस्य बहुवचन- स्य ग्रहणम् । किन्तर्हि ? अन्वर्थग्रहणमेतत् । बहूनामर्थानां वचनम्=बहुवचनम् ।