भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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सकेगा ? अतः कार्यासिद्धपक्ष में प्रथम विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) सूत्र के बल से भावी असिद्ध कार्य कर चुकने पर पश्चात् पूर्वत्रासिद्धम् (३१) से वह पूर्व की दृष्टि में असिद्ध होगा अन्यथा नहीं। इस पक्ष में 'अद + अम्' यहां प्रथम विप्रतिषेधे परं कार्यम् (३१) द्वारा पूर्वरूप की अपेक्षा पर होने से उत्व-मत्व होकर—'अमु + अम्' बन जायगा। तदनन्तर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा मुकार्य को पूर्वरूप की दृष्टि में असिद्ध माना जायगा। अब इस मुकार्य के असिद्ध मान जाने पर भी पूर्वरूप नहीं हो सकेगा, क्योंकि- देवदत्तस्य हन्तरि हते देवदत्तस्य पुनरुन्मज्जनं न भवति अर्थात् देव- दत्त के हन्ता के मारे जाने पर भी देवदत्त की पुनरुत्पत्ति नहीं हो सकती। इस न्याया- नुसार 'द' के हन्ता 'मु' के असिद्ध होने पर भी पुनः 'द' नहीं आ सकेगा, क्योंकि उस का तो विनाश हो चुका है। इस प्रकार 'द' के न आने से अक् नहीं मिलेगा तब अमि पूर्वः (१३५) द्वारा पूर्वरूप न हो सकेगा। अतः यह पक्ष ठीक नहीं। अब यदि शास्त्रासिद्धपक्ष स्वीकार करते हैं तो इस पक्ष में दोनों सूत्रों के युगपत् प्राप्त होने पर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा परशास्त्र असिद्ध अर्थात् अभावात्मक हो जाता है। इस से पूर्वके सवासप्त अध्यायों के सूत्रों की दृष्टि में वह सूत्र नहीं रहता, उस के न रहने से विप्रतिषेध नहीं हो सकता, क्योंकि विप्रतिषेध वहां होता है जहां अन्यत्रान्यत्रलब्धावकाश सूत्र परस्पर की दृष्टि में भावात्मक होते हुए एक स्थान पर प्राप्त हों। यहां पूर्व की दृष्टि में पर सूत्र अभावात्मक होने से वर्तमान नहीं रहता अतः प्रथम पूर्वसूत्र प्रवृत्त होता है और तदनन्तर असिद्ध सूत्र। इस प्रकार इस पक्ष के स्वीकार करने में 'अद + अम्' यहां पर अदसोऽसे ० तथा अमि पूर्वं इन दोनों सूत्रों के युगपत् प्राप्त होने पर पूर्वत्रासिद्धम् (३१) द्वारा अमि पूर्वं (६।१।१०२) की दृष्टि में अदसोऽसे० (८।२।८०) सूत्र असिद्ध अर्थात् अभावात्मक हो जाता है। अतः प्रथम पूर्वरूप होकर 'अदम्' हो जाने पर पश्चात् उत्व-मत्व करने से 'अमुम्' प्रयोग सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार कोई दोष उत्पन्न नहीं होता। अतः पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र में शास्त्रासिद्धपक्ष ही स्वीकार करना चाहिये, कार्यासिद्ध नहीं। अत एव ग्रन्थकार ने भी पूर्वत्रासिद्धम् (३१) सूत्र की वृत्ति में इसी पक्ष का अनुमोदन किया है—'सपादसप्ताध्यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धा, त्रिपाद्यामपि पूर्वं प्रति परं शास्त्रम् असिद्धम्” । विप्रतिषेधे परं कार्यम् (११३) सूत्र पर भी यही स्वीकार किया है—"पूर्वत्रासिद्धमिति रोरीत्यस्यासिद्धत्वाद् रुत्वमेव”। भाष्यकार भी इसी पक्ष के पक्षपाती हैं—पूर्वत्रासिद्धे नास्ति विप्रतिषेधोऽभावादुत्तरस्य। इस विषय पर अन्य विस्तृत विचार व्याकरण के उच्चग्रन्थों में देखें। अदस् + अस् (शस्)। त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—अद + अस्। अब अदसोऽसे ० (३५६) के असिद्ध होने से, प्रथम विभक्तिवत्कार्य—पूर्वसवर्णदीर्घ और शस् के सकार को नकार करने से—'अदान्'। अब अदसोऽसे ० (३५६) से दकारोत्तर आकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर 'अमूंन्' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस् + आ (टा)। त्यदाद्यत्व और पररूप होकर—अद + आ। अब यहां