लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-पुंल्लिङ्ग-प्रकरणम् ४७७ यद्यपि अदसोऽसेः० (३५६) के असिद्ध होने से, प्रथम विभक्तिकार्य अर्थात् टाङसिँ- ङसामिनात्स्याः (१४०) सूत्र से टा को इन आदेश प्राप्त होता है तथापि न मु ने (३५८) सूत्र के आरम्भसामर्थ्य से¹ वह नहीं होता; अतः अदसोऽसेः० (३५६) से दकारोत्तर अकार को उकार तथा दकार को मकार हो जाता है अमु+आ। अब यहां 'मु'- भाव के असिद्ध होने से शेषो घ्यसखि (१७०) द्वारा घिसञ्ज्ञा नहीं हो सकती, और बिना घिसञ्ज्ञा के आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) सूत्र से टा को ना नहीं हो सकता; पर हमें 'ना' करना अभीष्ट है। अतः 'मु' भाव को सिद्ध करने के लिये अग्रिमसूत्र प्रवृत्त होता है – [लघु०] निषेध-सूत्रम्— (३५८) न मु ने ॥८।२।३॥ 'ना'भावे कर्तव्ये कृते च 'मु'भावो नाऽसिद्धः। अमुना। अमूभ्याम् ३। अमीभिः। अमुष्मै। अमीभ्यः २। अमुष्मात्। अमुष्य। अमुयोः २। अमी- षाम्। अमुष्मिन्। अमीषु ॥ अर्थः—'ना' आदेश करना हो या कर चुके हों तो 'मु' आदेश असिद्ध नहीं होता । व्याख्या—न इत्यव्ययपदम्। मु। १।१। ने ।७।१। असिद्धम् ।१।१। (पूर्वत्रा- सिद्धम् से)। समासः—म् च उश्च = मु। समाहारद्वन्द्वः । 'ने' यह ना-शब्द के सप्तमी का एकवचन है—ना+ङि=ना+इ=ने। यहां परसप्तमी या विषयसप्तमी समझनी चाहिये । अर्थः—(ने) 'ना' के विषय में अथवा 'ना' परे होने पर (मु) 'मु' आदेश (असिद्धम्) असिद्ध (न) नहीं होता । 'अमु+आ' यहां ना के विषय में 'मु' आदेश असिद्ध न हुआ तो घिसञ्ज्ञा होकर आङो नाऽस्त्रियाम् (१७१) से टा को ना करने पर—'अमुना' प्रयोग सिद्ध हुआ। सूचना—ध्यान रहे कि 'अमुना' में 'ना' के परे होने पर 'मु' आदेश के असिद्ध होने से सुपि च (१४१) द्वारा दीर्घ प्राप्त होता है। वह भी न मु ने (३५८) से 'मु' आदेश के सिद्ध हो जाने पर नहीं होता। इसीलिये तो 'ने' में दो प्रकार की सप्तमी स्वीकार कर के 'ना करने में या ना परे होने पर' ऐसा अर्थ किया गया है। अदस्+भ्याम्। त्यदाद्यत्व और पररूप करने पर सुपि च (१४१) से दीर्घ हो जाता है—अदाभ्याम्। अब अदसोऽसेः० (३५६) से ऊत्व-मत्व करने से— 'अमूभ्याम्' प्रयोग सिद्ध होता है। अदस्+भिस्। त्यदाद्यत्व और पररूप कर 'अद+भिस्'। इस अवस्था में १. यदि यहाँ टा को इन कर दें तो न मु ने (३५८) सूत्र बनाने का कुछ प्रयोजन नहीं रहता। अतः इस का बनाना तभी सार्थक किया जा सकता है जब 'इन' आदेश न होकर 'मु' हो जाये। यही इस का आरम्भसामर्थ्य है।