लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअतो भिस ऐस् (१४२) प्राप्त होता है, परन्तु उस का नेदमदसोरको (२७६) से निषेध हो जाना है । अब बहुवचने झल्येत् (१४५) द्वारा एकारादेश कर एत ईद् बहुवचने (३५७) से एकार को ईकार तथा दकार को मकार करने से—'अमीभि' प्रयोग सिद्ध होता है । अदम् + ए(ङे) । त्यदाद्यत्व, पररूप, सर्वनाम्न स्मै (१५३) से ङे को स्मै, मुत्व तथा आदेशप्रत्यययो (१५०) स षत्व होकर—अमुष्मै । अदस् + भ्यस् । त्यदाद्यत्व, पररूप, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व तथा एत ईद् बहुवचने (३५७) से ईत्व मत्व होकर—अमीभ्य । अदम् + अस् (ङसिँ) । त्यदाद्यत्व, पररूप तथा ङसिङ्यो स्मात्स्मिनौ (१५४) से 'स्मात्' आदेश उत्व-मत्व तथा षत्व होकर —अमुष्मात् । अदस् + थस (ङस्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, टाङसिङसामिनात्स्या (१४०) से स्य आदेश, उत्व मत्व तथा षत्व होकर—अमुष्य । अदस् + ओस । त्यदाद्यत्व पररूप, ओसि च (१४७) मे एत्व, एचोऽयवा- याव (२२) मे अय आदेश होकर —अदयो । अब उत्व-मत्व होकर—अमुयो । अदस् + आम् । त्यदाद्यत्व, पररूप, आमि सर्वनाम्न सुँट् (१५५) से सुँट् आगम, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व, एत ईद् बहुवचने (३५७) मे ईत्व-मत्व और षत्व करने से—'अमीषाम्' प्रयोग सिद्ध होना है । अदम् + इ (ङि) । त्यदाद्यत्व, पररूप, ङसिङ्यो स्मात्स्मिनो (१५४) मे ङि को स्मिन्, मु आदेश तथा षत्व करने पर—अमुष्मिन् । अदस + सु (सुप्) । त्यदाद्यत्व, पररूप, बहुवचने झल्येत् (१४५) से एत्व, एत ईद् बहुवचने (३५७) से ईत्व-मत्व तथा आदेशप्रत्यययो (१५०) से षत्व करने पर—अमीषु । अदस् (वह) शब्द की पुंलिङ्ग मे रूपमाला यथा— प्र० असौ अमू अमी | प० अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्य द्वि० अमुम् ,, अमून् | ष० अमुष्य अमुयो अमीषाम् तृ० अमुना अमूभ्याम् अमीभि | स ० अमुष्मिन् ,, अमीषु च० अमुष्मै ,, अमीभ्य | सम्बोधन प्राय नही होता । (यहां सकारान्त पुंलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] इति हलन्ता पुंलिङ्गा [शब्दा ] ॥ अर्थ —यहा हलन्त पुंलिङ्ग शब्द समाप्त होते हैं । अभ्यास (४६) (१) (क) 'विद्वान्' मे वसुंस्त्रसुं० द्वारा दत्व क्यो नहीं होता ? (ख) 'विद्वांसौ' मे अनुस्वार को परसवर्ण क्यो नही होता ? (ग) 'अनेहम्' को असुंमन्त मानने मे क्या दोष है ?