लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८२ भैमोध्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां
(३०१) सूत्रद्वारा 'उद्' पूर्वक 'स्निह्' (दिवा० प०) धातु से क्विबन्त निपातन किया जाता है। उष्णिह् + सुँ । सुँलोप, क्विबन्त होने से क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) द्वारा हकार को घकार, जश्त्व से घकार को गकार तथा वैकल्पिक चर्त्व से गकार को ककार होकर—'उष्णिक्, उष्णिग्' ये दो प्रयोग सिद्ध होते हैं। रूपमाला यथा— प्र० उष्णिक्, ग् उष्णिहौ उष्णिहः | प० उष्णिहः उष्णिग्भ्याम् उष्णिग्भ्यः द्वि० उष्णिहम् ,, ,, | प० ,, उष्णिहोः उष्णिहाम् तृ० उष्णिहा उष्णिग्भ्याम्* उष्णिग्भिः | स० उष्णिहि ,, उध्रिक्षु† च० उष्णिहे ,, उष्णिग्भ्यः | सं० हे उष्णिक्, ग्! उष्णिहौ! उष्णिहः! * क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४), झलां जशोऽन्ते (६७)। † कुत्व, जश्त्व, षत्व, खरि च (७४) से चर्त्व। (यहां हकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —•०•— [लघु०] द्योः । दिवौ । दिवः । द्युभ्याम् ॥ व्याख्या—'दिव्' (आकाश वा स्वर्ग) शब्द विशुद्ध अवस्था में नित्यस्त्रीलिङ्ग होता है। पुल्ँलिङ्ग आदि में इसका प्रयोग बहुव्रीहिसमासवश हुआ करता है। इस की सम्पूर्ण प्रक्रिया हलन्तपुल्लिङ्गान्तर्गत 'सुदिव्' शब्दवत् होती है। रूपमाला यथा – प्र० द्यौ† दिवौ दिवः | प० दिवः द्युभ्याम् द्युभ्यः द्वि० दिवम् ,, ,, | प० ,, दिवोः दिवाम् तृ० दिवा द्युभ्याम्‡ द्युभिः | स० दिवि ,, द्युषु च० दिवे ,, द्युभ्यः | सं० हे द्यौ ! हे दिवौ ! हे दिवः ! †दिव औत् (२६४) । ‡दिव उत् (२६५) । (यहां वकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:०:— [लघु०] गीः । गिरौ । गिरः । एवम्—पूः ॥ व्याख्या—गिर् = वाणी । गृ निगरणे (तुदा० प०) धातु से क्विप्, उस का सर्वापहार लोप, ऋत इद्धातो (६६०) से इत्व तथा उरण्रपरः (२६) से रपर करने पर 'गिर्' शब्द निष्पन्न होता है। गिर्+स् (सुँ) । सुँलोप होकर क्विबन्ता धातुत्वं न जहाति इस कथन से धातु होने से पदान्त मे र्वोरुपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ होकर 'गीर्' बना। अब रेफ को विसर्ग आदेश करने से—'गीः' प्रयोग सिद्ध होता है। गिर्+औ = गिरौ। यहां पदान्त न होने से उपधादीर्घ नहीं होता। गिर्+भ्याम्। यहां स्वादिष्वसर्वनामस्थाने (१६४) द्वारा पदत्व होने से र्वोरुपधाया दीर्घ इकः (३५१) से उपधादीर्घ हो जाता है—गीर्भ्याम् ।