लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८३
गिर्+सुप्। यहां पदान्त में उपधादीर्घ होकर इण्—रेफ से परे प्रत्यय के अवयव सकार को षकार (१५०) हो जाता है—गीर्षु। ध्यान रहे कि यहां रोः सुपि (२६८) के नियमानुसार रेफ को विसर्ग आदेश नहीं होता। समग्र रूपमाला यथा— प्र० गीः गिरौ गिरः | प० गिरः गीर्भ्याम् गीर्भ्यः द्वि० गिरम् ,, ,, | ष० ,, गिरोः गिराम् तृ० गिरा गीर्भ्याम् गीर्भिः | स० गिरि ,, गीर्षु च० गिरे ,, गीर्भ्यः | सं० हे गीः ! हे गिरौ ! हे गिरः! इसी प्रकार—पुर्=(नगर)। पृ पालनपूरणयोः (जुहो० प०) धातु से क्विँप्, उसका सर्वापहारलोप, उदोष्ठ्यपूर्वस्य (६११) से उत्व तथा उरण्रपरः (२६) से रपर करने पर 'पुर्' शब्द निष्पन्न होता है। इस की भी सम्पूर्ण प्रक्रिया 'गिर्' शब्द की तरह होती है। रूपमाला यथा— प्र० पूः¹ पुरौ पुरः | प० पुरः पूर्भ्याम् पूर्भ्यः द्वि० पुरम् ,, ,, | ष० ,, पुरोः पुराम् तृ० पुरा पूर्भ्याम् पूर्भिः | स० पुरि ,, पूर्षु च० पुरे ,, पूर्भ्यः | सं० हे पूः ! हे पुरौ ! हे पुरः ! इसी प्रकार—धुर् (गाड़ी का अग्रिम भाग) प्रभृति शब्दों के रूप बनते हैं। [लघु०] चतस्रः। चतसृणाम्॥ व्याख्या—चतुर्=(चार)। स्त्रीलिङ्ग में विभक्ति परे होने पर चतुर् शब्द को त्रिचतुरोः स्त्रियां तिसृचतसृ (२२४) सूत्र से 'चतसृ' आदेश हो जाता है।² चतसृ+अस् (जस्)। ऋतो ङि० (२०४) से गुण प्राप्त होने पर उस के अपवाद अचि र ऋतः (२२५) से रेफ आदेश करने पर—'चतस्रः' प्रयोग सिद्ध होता है। चतसृ+अस् (शस्)। यहां सर्वनामस्थान परे न होने से पूर्वोक्त गुण प्राप्त नहीं होता। प्रथमयोः० (१२६) से पूर्वसवर्णदीर्घ प्राप्त होने पर उस के अपवाद अचि र ऋतः (२२५) द्वारा रेफ आदेश हो जाता है—चतस्रः। चतसृ+आम्। अचि र ऋतः (२२५) का बाध कर नुमचिर० (वा० १६) की सहायता से पूर्वविप्रतिषेध से ह्रस्वनद्यापो नुट् (१४८) द्वारा नुट् का आगम हो जाता है—चतसृ+नाम्। अब नामि (१४६) से प्राप्त दीर्घ का न तिसृ-चतसृ (२२६) से निषेध हो जाता है, पुनः ऋवर्णान्नस्य णत्वं वाच्यम् (वा० २१) से णत्व होकर 'चतसृणाम्' प्रयोग सिद्ध होता है। चतसृ (स्त्रीलिङ्ग में चतुर्) शब्द की रूपमाला यथा— १. इसका भ्रामक रूप इस उक्ति में प्रसिद्ध है—का पूर्वः (का, पूः=नगरी, वः= युष्माकम् । तुम्हारी कौन-सी नगरी है ?)। २. यहां यह नहीं भूलना चाहिये कि चतसृशब्द से ऋन्नेभ्यो ङीप् (२३२) से प्राप्त ङीप् का न षट्स्वस्रादिभ्यः (२३३) से निषेध हो जाता है।