लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन | विभक्ति एकवचन द्विवचन बहुवचन प्र० * * चतस्रः | प० * * चतसृभ्यः द्वि० * * " | ष० * * चतसृणाम् तृ० * * चतसृभिः | स० * * चतसृषु च० * * चतसृभ्यः | —— ० —— (यहां रेफान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) [लघु०] का। के। काः। सर्वावत्॥ व्याख्या किम्(कौन)। 'किम्' शब्द के पुँल्लिङ्ग में रूप कह चुके हैं। अब स्त्रीलिङ्ग में रूप सिद्ध किये जाते हैं। विभक्ति परे होने पर सर्वत्र किमः कः (२७१) द्वारा 'किम्' को 'क' सर्वादेश हो जाता है। पुनः स्त्रीत्व की विवक्षा में अजाद्यतष्टाप् (१२४५) से टाप् (आ) प्रत्यय होकर सवर्णदीर्घ करने से 'का' शब्द निष्पन्न होता है सर्वादीनि सर्वनामानि (१५१) से इस की सर्वनामसंज्ञा होने से सम्पूर्ण प्रक्रिया 'सर्वा'शब्दवत् होती है। 'का' (स्त्रीलिङ्ग में किम् शब्द) की रूपमाला यथा — प्र० का के काः | प० कस्याः काभ्याम् काभ्यः द्वि० काम् " " | ष० ,,† कयोः* कासाम्‡ तृ० कया* काभ्याम् काभिः | स० कस्याम्† ,,* कासु च० कस्यै† " काभ्यः | सम्बोधन प्राय नहीं होता। *आङि चापः (२१८)। † सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च (२२०)। ‡ आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५)। [लघु०] विधि सूत्रम्—(३६१) यः सौ ॥७।२।११०॥ इदमो दस्य यः। इयम्। त्यदाद्यत्वम्। पररूपत्वम्। टाप्। दश्च (२७५) इति मः। इमे। इमाः। इमाम्। अनया। हलि लोपः (२७७) आभ्याम्। आभिः। अस्यै। अस्याः। अनयोः। आसाम्। अस्याम्। आसु॥ अर्थ—सुँ परे होने पर इदम् के दकार को यकार आदेश हो जाता है। व्याख्या—इदमः ६।१। (इदमो मः से)। दः ६।१। (दश्च से)। यः १।१। सौ ७।१। अर्थ—(इदमः) इदम् शब्द के (दः) द् के स्थान पर (यः) य् आदेश हो जाता है (सौ) सुँ परे होने पर। यह सूत्र केवल स्त्रीलिङ्ग में ही प्रवृत्त होता है। क्योंकि पुँल्लिङ्ग में सुँ परे होने पर इदोऽय् पुंसि (२७३) सूत्र से इदम् को अय् आदेश हो जाने से दकार नहीं मिल सकता। नपुंसक में भी सुँ का लुक् हो जाने से प्रत्ययलक्षण न होने से इस अव- काश नहीं मिलता। 'इदम्' शब्द के पुँल्लिङ्ग में रूप सिद्ध किये जा चुके हैं, अब स्त्रीलिङ्ग में रूप सिद्ध करते हैं—