भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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हलन्त-स्त्रीलिङ्ग-प्रकरणम् ४८७ एतद् (यह)। 'एतद्' शब्द की भी स्त्रीलिङ्ग में समग्र प्रक्रिया 'त्यद्, तद्' शब्दों की तरह होती है। रूपमाला यथा— प्र० एषा एते एताः | प० एतस्याः एताभ्याम् एताभ्यः द्वि० एताम् " " | प० " एतयोः एतासाम् तृ० एतया एताभ्याम् एताभिः | स० एतस्याम् " एतासु च० एतस्यै " एताभ्यः | सम्बोधन प्रायः नहीं होता। (यहां दकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:०:— [लघु०] वाक्, वाग्। वाचौ। वाग्भ्याम्। वाक्षु॥ व्याख्या—वाच् (वाणी)। वच परिभाषणे (अदा० प०) धातु से विवँद्वचि० (वा० ४८) द्वारा क्विन्‌, दीर्घ और सम्प्रसारण का अभाव करने पर 'वाच्' शब्द निष्पन्न होता है। पदान्त में इसे चोः कुः (३०६) द्वारा सर्वत्र कव drop/र्गादेश हो जाता है। 'वाच्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० वाक्,-ग्* वाचौ वाचः | प० वाचः वाग्भ्याम् वाग्भ्यः द्वि० वाचम् " " | प० " वाचोः वाचाम् तृ० वाचा वाग्भ्याम्‡ वाग्भिः | स० वाचि " वाक्षु† च० वाचे " वाग्भ्यः | सं० हे वाक्,-ग्! हे वाचौ! हे वाचः! *सुंलोप, चोः कुः (३०६) से चकार को ककार, तथा जश्त्व-चर्त्व (६७, १४६)। ‡चोः कुः (३०६) से कुत्व हो कर झलां जशोऽन्ते (६७) से जश्त्व हो जाता है। †चोः कुः, झलां जशोऽन्ते, आदेशप्रत्यययोः (१५०), खरि च (७४)। इसी प्रकार—शुच् (शोक), त्वच् (त्वगिन्द्रिय) प्रभृति शब्दों के रूप होते हैं। [लघु०] अप्शब्दो नित्यं बहुवचनान्तः। अप्तृन्तृच्० (२०६) इति दीर्घः। आपः। अपः॥ व्याख्या—अप् (जल)। 'अप्' शब्द संस्कृतसाहित्य में नित्यबहुवचनान्त¹ तथा १. त्रि, चतुर्, पञ्चन् आदि शब्दों का बहुवचन में प्रयोग तो समझ में आ सकता है; परन्तु जब अप्, दार आदि शब्दों का बहुवचन में प्रयोग सामने आता है तो वैसा कोई कारण प्रतीत नहीं होता। आधुनिक कई वैज्ञानिक दो गैसों के संयोग को ही जलतत्त्व नाम देते हैं, शायद सूक्ष्म अनुसन्धान से किन्हीं अन्य गैसों का भी मिश्रण प्रतीत हो और उन सब के संयोगात्मक तत्त्व 'अप्' को प्राचीन आर्यों ने नित्यबहुवचनान्त माना हो अथवा जल के अनेक सूक्ष्म बिन्दुओं के कारण यह बहुवचनान्त माना गया हो। किञ्च जल, वारि आदि को बहुवचन न मानकर 'अप्' को ही बहुवचनान्त मानने का कारण शायद आपॢँ व्याप्तौ धातु भी हो जिस से अप् शब्द की निष्पत्ति होती है। 'दार' शब्द शायद इसलिये बहुवचनान्त