लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां अदस् + औ। त्यदाद्यत्व, पररूप, टाप् और सवर्णदीर्घ होकर—अदा+औ। औङ आप् (२१६) से औ को शी हो गुण एकादेश करने से—'अदे'। अब अदसोऽसे- र्दादु दो म (३५६) से एकार को ऊकार तथा दकार को मकार करने पर—अमू। अदस् + अस् (जस्) = अदा + अस्। दीर्घाज्जसि च (१६२) सूत्र से पूर्व- सवर्णदीर्घ का निषेध होकर सवर्णदीर्घ हो जाता है—अदा। अब ऊत्व मत्व करने से —'अमू' सिद्ध होता है। ध्यान रहे कि यहा अदन्त सर्वनाम न होने से जस् को शी आदेश तथा एकार न होने के कारण एत ईद्० (१२७) सूत्र प्रवृत्त नही होता। अदस् + अम् = अदा + अम्। पूर्वरूप कर ऊत्व मत्व करने से—अमूम्। अदस् + अस् (शस्) = अदा + अस्। पूर्वसवर्णदीर्घ होकर ऊत्व मत्व हो जाते हैं—अमू। अदस् + आ (टा) = अदा + आ। आङि चाप (२१८) से एकार होकर अय् आदेश करने से—अदया। अब उत्व मत्व करने से—अमुया। अदस् + भ्याम् = अदा + भ्याम्। ऊत्व मत्व करने से—अमूभ्याम्। अदस् + ए (ङे) = अदा + ए। सर्वनामसञ्ज्ञा हो कर सर्वनाम्न स्याड्ढ्रस्व- श्च (२२०) से स्याट् आगम और आप् को ह्रस्व हो —अद + स्या ए। पुन वृद्धि कर के उत्व, मत्व और षत्व करने से—अमुष्यै। अदस् + अस् (ङसिं वा ङस्) = अदा + अस् = अदस्या। अब उत्व, मत्व और षत्व करने पर—अमुष्या। अदस् + ओस् = अदा + ओस्। आङि चाप (२१८) से एकार तथा एचोऽय- वायाव (२२) से अय् आदेश हो—अदयो। उत्व मत्व करने पर—अमुयो। अदस् + आम् = अदा + आम्। सर्वनाम होने से आमि सर्वनाम्न सुट् (१५५) द्वारा सुँट् आगम कर ऊत्व मत्व और षत्व हो जाता है—अमूषाम्। अदस् + इ (ङि) = अदा + इ। डेराम्नद्याम्नीभ्य (१६८) से ङि को आम् हो स्याट् आगम और आप् को ह्रस्व करने से—अदस्याम्। अब उत्व मत्व और षत्व करने पर—अमुष्याम्। अदस् + सुप् = अदा + सु। ऊत्व मत्व और षत्व होकर—अमूषु। 'अदस्' शब्द की स्त्रीलिङ्ग मे रूपमाला यथा— प्र० असौ अमू अमू | प० अमुष्या अमूभ्याम् अमूभ्य द्वि० अमूम् " " | ष० " अमुयो अमूषाम् तृ० अमुया अमूभ्याम् अमूभि | स० अमुष्याम् , अमूषु च० अमुष्यै " अमूभ्य | सम्बोधन प्राय नही होता। नोट—स्त्रीलिङ्ग मे अदस् शब्द की सिद्धि करते समय मुं को छोड़ अन्य सब विभक्तियो मे सर्वप्रथम 'अदा' रूप बना लेना चाहिये। तब 'सर्वा' शब्द के समान प्रक्रिया कर के अदसोऽसेर्दादु दो म (३५६) सूत्र प्रवृत्त करना चाहिये। ऐसा करने से प्रक्रिया मे अशुद्धि नहीं हो सकेगी।