लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविभाषा ङिश्यो (२४८) से अन् के अकार का विकल्प से लोप हो जाता है— अह्नी, अहनी। अहन् + जस् = अहन् + शि। यहां सर्वनामस्थाने० (१७७) से उपधादीर्घ हो कर—अहानि। भसञ्ज्ञा न होने से अन् के अकार का लोप न होगा। अहन् + आ (टा)। भसञ्ज्ञा होकर अल्लोपोऽन (२४७) से अन् के अकार का नित्य लोप हो जाता है—अह्ना। अहन् + भ्याम्। यहां अग्रिम सूत्र प्रवृत्त होता है— [लघु०] विधि-सूत्रम्—(३६३) अहन् ।८।२।६८॥ अहन् इत्यस्य रुँ पदान्ते। अहोभ्याम्॥ अर्थ—पदान्त में 'अहन्' के नकार के स्थान पर रुँ आदेश हो जाता है। व्याख्या—अहन् ।६।१। (यहां षष्ठी का लुक् हुआ है)। रुँ ।१।१। (ससजुषो रुँ से)। पदस्य ।६।१। (अधिकृत है)। अन्ते ।७।१। (स्को० से) अथ—(पदस्य) पद के (अन्त) अन्त में (अहन्) अहन् शब्द के स्थान पर (रुँ) रुँ आदेश हो जाता है। अलोऽन्त्यविधि से यह आदेश अन्त्य अल्—नकार के स्थान पर होता है। अहन् + भ्याम्। यहां प्रकृतसूत्र से नकार को रुँ आदेश होकर हशि च (१०७) से उत्व तथा आद् गुण (२७) से गुण करने पर—अहोभ्याम्। इसी प्रकार— अहोभि, अहोभ्यः। अहन् + ङि (डि)। भसञ्ज्ञा होकर विभाषा ङिश्यो (२४८) से विकल्प कर के अन् के अकार का लोप हो जाता है—अह्नि, अहनि। अहन् + सुप्। रुँत्व विसर्ग होकर—अहःसु। वा शरि (१०४) से विकल्प कर के विसर्ग तथा पक्ष में विसर्जनीयस्य सः (६६) से विसर्ग के स्थान पर सकार आदेश होकर—अहःसु अहस्सु। रूपमाला यथा— प्रथमा अहः अह्नी, अहनी अहानि द्वितीया ,, ,, ,, तृतीया अह्ना अहोभ्याम् अहोभि चतुर्थी अह्ने ,, अहोभ्य पञ्चमी अह्नः ,, ,, षष्ठी ,, अह्नोः अह्नाम् सप्तमी अह्नि, अहनि ,, अहःसु, अहस्सु सम्बोधन हे अहः ! हे अह्नी, अहनी ! हे अहानि ! [लघु०] दण्डि॥ व्याख्या—दण्डोऽस्यास्तीति—दण्डी (कुलम्)। अत इनिठनौ (११८४)। दण्डिन् + सुं। यहां स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सु का लुक् होकर—न लोप० (१८०) से नकार का भी लोप हो जाता है—दण्डि।