लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ४६७ है। भाष्यकार ने भी यही स्वीकार किया है—एनदिति नपुंसक एकवचने वक्तव्यम्, कुण्डमानय, प्रक्षालयैनत् । इदम् + अम् । यहां स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से अम् का लुक् होकर प्रत्यय- लक्षण का निषेध होने पर भी एनद्विधानसामर्थ्य से अम् को मानकर प्रकृतवार्त्तिक से 'एनत्' आदेश हो जाता है । पुनः जश्त्व-चर्त्व करने पर—'एनत्, एनद्' ये दो रूप सिद्ध होते हैं । इदम् + औट् = इदम् + शी = एनत् + ई । त्यदाद्यत्व, पररूप, तथा गुण एका- देश होकर—एने । इदम् + शस् = इदम् + शि = एनत् + इ । त्यदाद्यत्व, पररूप, नपुंसकस्य झलचः (२३६) से नुँम् आगम तथा सर्वनामस्थाने चाऽसंबुद्धौ (१७७) से उपधादीर्घ होकर—एनानि । इदम् + टा = एनत् + आ । त्यदाद्यत्व, पररूप तथा टाङसिङसामिनात्स्याः (१४०) से टा को इन आदेश और गुण एकादेश करने पर—एनेन् । इदम् + ओस् = एनत् + ओस् = एन + ओस् । ओसि च (१४७) से अकार को एकार होकर अय् आदेश करने से—एनयोः । नोट—वस्तुतः अम् से भिन्न अन्य विभक्तियों में उपर्युक्त भाष्य के वचन से द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) द्वारा 'एन' आदेश ही होता है, एनत् नहीं । हम ने यह सब मतान्तर के आश्रय से ही लिखा है । नपुंसकलिङ्ग के अन्वादेश में 'इदम्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० इदम् इमे इमानि | प० अस्मात् आभ्याम् एभ्यः द्वि० एनत्-द् एने एनानि | ष० अस्य एनयोः एषाम् तृ० एनेन आभ्याम् एभिः | स० अस्मिन् " एषु च० अस्मै " एभ्यः | सम्बोधन में प्रयोग नहीं होता । (यहां मकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है ।) —: : ० : :— [लघु०] अहः । विभाषा ङिःश्योः (२४८)—अह्नी, अहनी । अहानि ॥ व्याख्या—अहन् (दिन) । घस्रो दिनाहनी वा तु क्लीवे दिवसवासरौ—इत्य- मरः । अहन् + सुँ । स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुँ का लुक्, रोऽसुपि (११०)¹ से नकार को रेफ आदेश और खरवसानयोः० (६३) से उसे विसर्ग करने पर 'अहः'² प्रयोग सिद्ध होता है । अहन् + औ । यहां यचि भम् (१६५) सूत्र द्वारा भसञ्ज्ञा होने के कारण १. यहाँ अहन् (३६३) से रुँत्व न होकर 'असुंपि' के सामर्थ्य से रत्व होगा । २. 'अहः + इदम्' की सन्धि 'अहरिदम्' । इसी प्रकार 'अहर्भाति' । देखें (११०) । ल० प्र० (३२)