लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
पृष्ठ 511, कुल 633 में से
संदर्भ में पढ़ें४६६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां [लघु०] किम् । के । कानि ॥ व्याख्या—किम्+सुं। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक् होकर—किम्। अत्र विभक्ति परे न होने से किमः कः (२७१) से 'क' आदेश नहीं हो सकता, प्रत्यय- लक्षण भी न लुमताङ्गस्य (१६१) के निषेध के कारण नहीं हो पाता। किम्+औ। यहां विभक्ति परे होने के कारण किमः कः (२७१) से क आदेश होकर औ को शी और गुण करने से—के। किम्+जस्। क आदेश होकर ज्ञानशब्दवत्—कानि। रूपमाला यथा— प्र० किम् के कानि प० कस्मात्* काभ्याम् केभ्यः द्वि० ,, ,, ,, प० कस्य कयोः केषाम्‡ तृ० केन काभ्याम् कैः स० कस्मिन्* ,, केषु च० कस्मै† ,, केभ्यः सम्बोधन नहीं होता। ¶ सर्वनाम्नः स्मै (१५३)। * ङसिङ्योः स्मात्स्मिनौ (१५४)। † आमि सर्वनाम्नः सुट् (१५५), बहुवचने० (१४५), आदेशप्रत्यययोः (१५०)। [लघु०] इदम् । इमे । इमानि ॥ व्याख्या—नपुंसकलिङ्ग में 'इदम्' शब्द की प्रक्रिया यथा— इदम् + सुं। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक् होकर—इदम्। विभक्ति का लुक् होने से इदमो मः (२७२) तथा त्यदाद्यत्व आदि नहीं होते। इदम् + औ। त्यदाद्यत्व, पररूप, शी आदेश, गुण और दश्च (२७५) द्वारा दकार को मकार होकर—इमे। इदम् + जस्। त्यदाद्यत्व, पररूप, शि आदेश, उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा, अवर्णान्त होने से नुम् आगम, उपधादीर्घ और दकार को मकार करने पर—इमानि। द्वितीया में भी इसी तरह रूप बनते हैं। शेष पुंवत् जानें। रूपमाला यथा— प्र० इदम् इमे इमानि प० अस्मात् आभ्याम् एभ्यः द्वि० ,, ,, ,, प० अस्य अनयोः एषाम् तृ० अनेन आभ्याम् एभिः स० अस्मिन् ,, एषु च० अस्मै ,, एभ्यः सम्बोधन नहीं होता। [लघु०] वा०—(२६) अन्वादेशे नपुंसके एनद्वक्तव्यः ॥ एनत्, एनद् । एने । एनानि । एनेन । एनयोः २ ॥ अर्थ—द्वितीया, टा और ओस् विभक्ति परे होने पर नपुंसकलिङ्ग में अन्वा- देश में इदम् और एतद् शब्द के स्थान पर 'एनत्' आदेश हो जाता है। व्याख्या—यह वार्तिक द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) सूत्र पर भाष्य में पढ़ा गया है, अतः यह तद्विषयक ही है। यह 'एनत्' आदेश अम् के लिये ही किया गया है, क्योंकि अन्य विभक्तियों (औट्, शस्, टा, ओस्) में तो द्वितीयाटौस्स्वेनः (२८०) से भी कार्य निकल सकता