लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहलन्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५०१ प्र० यत्-द् ये यानि | प० यस्मात्-द् याभ्याम् येभ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० यस्य ययोः येषाम् तृ० येन याभ्याम् यैः | स० यस्मिन् ,, येषु च० यस्मै ,, येभ्यः सम्बोधन नहीं होता। इसी प्रकार नपुंसकलिङ्ग में 'एतद्' (यह) शब्द की रूपमाला यथा— प्र० एतत्-द् एते एतानि | प० एतस्मात्-द् एताभ्याम् एतेभ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० एतस्य एतयोः एतेषाम् तृ० एतेन एताभ्याम् एतैः | स० एतस्मिन् ,, एतेषु च० एतस्मै ,, एतेभ्यः सम्बोधन नहीं होता। (यहां दकारान्त नपुंसक-शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) —:: o ::— [लघु०] गवाक्। गोची। गवाञ्चि। पुनस्तद्वत्। गोचा। गवाग्भ्याम्॥ व्याख्या—गो अञ्च् (गो के पीछे चलने वाला कुल आदि)। गामञ्चतीति—गवाक्। 'गो' कर्म उपपद होने पर गत्यर्थक अञ्चुं (भ्वा० प०) धातु से ऋत्विग्दधृक्० (३०१) सूत्र से क्विन्-प्रत्यय, उस का सर्वापहारलोप, अनिदि- ताम्० (३३४) से उपधा के नकार का लोप होकर—गो अच्। अब इस से स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं— 'सुं' में—गो अच् + सु्। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक्, क्विन्-प्रत्य- यस्य कुः (८.२.६२) के असिद्ध होने से चोः कुः (८.२.३०) द्वारा चकार को ककार होकर जश्त्व-चर्त्व प्रक्रिया करने से—'गो अक्, गो अग्'। अब 'गो' शब्द के ओकार तथा 'अक्' शब्द के अकार के मध्य तीन प्रकार की सन्धि [अवङ् स्फोटायनस्य (४७) से वैकल्पिक अवङ् हो कर सवर्णदीर्घ, अवङ्-अभाव में सर्वत्र विभाषा गोः (४४) से वैकल्पिक प्रकृतिभाव, प्रकृतिभाव के अभाव में एङः पदान्तादति (४३) से पूर्वरूप] होने से छः रूप सिद्ध होते हैं। यथा— (अवङ्पक्ष में) १. गवाक्, २. गवाग् । (प्रकृति- भावपक्ष में) ३. गोअक्, ४. गोअग्। (पूर्वरूपपक्ष में) ५. गोऽक्, ६. गोऽग्। 'औ' में—गो अच् + औ। यहां नपुंसकाच्च (२३५) से 'औ' को शी, अनुबन्ध- लोप, यचि भम् (१६५) से भसञ्ज्ञा तथा अचः (३३५) सूत्र से अकार का लोप होकर—'गोची' यह एक ही रूप सिद्ध होता है। इस प्रकार गति अर्थ में भसञ्ज्ञा के सब स्थलों में यही बात समझनी चाहिये। 'जस्' में—गो अच् + जस्। जश्शसोः शिः (२३७) से जस् को शि आदेश, उस की सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा होकर उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः (२८६) सूत्र से नुँम् आगम, नश्चापदान्तस्य झलि (७८) से नकार को अनुस्वार, अनुस्वारस्य ययि पर- सवर्णः (७६) से परसवर्ण ञकार तथा उपर्युक्त तीनों प्रकार की सन्धि करने से— गवाञ्चि, गोअञ्चि, गोऽञ्चि ये तीन रूप सिद्ध होते हैं। द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमावत् प्रक्रिया होती है।