भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 517, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 517

५०२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां 'टा' मे—गो अच् + आ (टा)। भसञ्ज्ञा होकर अच.(३३५) से अकार का लोप हो जाता है—गोचा। भ्याम्' मे—गो अच् + भ्याम्। यहा भसञ्ज्ञा न होने से अकारलोप नही होता। पदान्त म चोः कु (३०६) द्वारा कुत्व-ककार तथा झलां जशोऽन्ते (६७) से उसे गकार करने पर तीन प्रकार की सन्धि हो जाती है—१. गवाग्भ्याम्, २. गो- अग्भ्याम्, ३. गोऽग्भ्याम्। इसी प्रकार—भिस्, भ्यस् और सुप् मे तीन २ रूप बना लेने चाहिये। सुप् मे खरि च (७४) से चर्त्व विशेष है। गतिपक्ष मे 'गोअञ्च्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० गवाक्,-ग्⎫ ㅤㅤ ⎧ गवाञ्चि ⎹ प० गोच ㅤ गवाग्भ्याम् ㅤ गवाग्भ्य ㅤㅤगोअक्,-ग्⎬ गोची ⎨ गोअञ्चि ⎹ ㅤㅤㅤ ㅤ गोअग्भ्याम् ㅤ गोअग्भ्य ㅤㅤगोऽक्,-ग्⎭ ㅤㅤ ⎩ गोऽञ्चि ⎹ ㅤㅤㅤ ㅤ गोऽग्भ्याम् ㅤ गोऽग्भ्यः द्वि० गवाक्,-ग्⎫ ㅤㅤ ⎧ गवाञ्चि ⎹ ष० गोच ㅤㅤ गोचो ㅤㅤㅤगोचाम् ㅤㅤगोअक्,-ग्⎬ गोची ⎨ गोअञ्चि ⎹ स० गोचि⎫ ㅤㅤㅤㅤ ⎧ गवाक्षु† ㅤㅤगोऽक्,-ग्⎭ ㅤㅤ ⎩ गोऽञ्चि ⎹ ㅤㅤ ㅤ ⎬ ㅤ ㅤ " ㅤㅤ⎨ गोअक्षु ㅤㅤ ㅤㅤㅤ ㅤㅤ ㅤㅤㅤ ㅤ ⎹ ㅤㅤ ㅤ ⎭ ㅤㅤㅤㅤ ⎩ गोऽक्षु तृ० गोचा⎫ ㅤगवाग्भ्याम् ㅤ ⎧ गवाग्भि ⎹ स० हे गवाक्,-ग् ! ⎫ ㅤहे ㅤ ⎧ हे गवाञ्चि ㅤㅤ ㅤ ⎬ ㅤगोअग्भ्याम् ㅤ ⎨ गोअग्भिः ⎹ ㅤ हे गोअक्,-ग् ! ⎬ गोची ! ⎨ हे गोअञ्चि ㅤㅤ ㅤ ⎭ ㅤगोऽग्भ्याम् ㅤ ⎩ गोऽग्भि ⎹ ㅤ हे गोऽक्,-ग् ! ⎭ ㅤ ㅤ ⎩ हे गोऽञ्चि ! ㅤㅤ ㅤ ㅤㅤ ㅤ ㅤㅤ ㅤ ㅤ ⎹ † यहा खरि च (७४) से हुआ चर्त्व च० गोचे ⎫ ㅤगवाग्भ्याम् ⎧ गवाग्भ्य ⎹ झयो द्वितीया० (वा० १४) की दृष्टि मे ㅤㅤ ㅤ ⎬ ㅤगोअग्भ्याम् ⎨ गोअग्भ्यः ⎹ असिद्ध है अतः चय् न होने से गकार ㅤㅤ ㅤ ⎭ ㅤगोऽग्भ्याम् ⎩ गोऽग्भ्य ⎹ आदेश नही होता। ये सब रूप गत्यर्थक 'अञ्चु' धातु के हैं। यदि 'अञ्चु' धातु पूजार्थक होगी तो निम्नप्रकारेण प्रक्रिया होगी— गो अञ्च् (गाय की पूजा करने वाला)। 'गो' कर्मोपपद 'अञ्चु' धातु मे क्विन्, उस का सर्वापहारलोप, नाञ्चेः पूजायाम् (३४१) से नकार के लोप का निषेध हो जाता है। अब प्रातिपदिकसञ्ज्ञा होकर स्वादि प्रत्यय उत्पन्न होते हैं— 'सु' मे—गो अञ्च् + सुं। स्वमोर्नपुंसकात् (२४४) से सुं का लुक्, संयोगा- न्तस्य लोप (२०) सूत्र से संयोगान्त चकार का लोप; निमित्तापाये नैमित्तिकस्या- प्यपायः के न्यायानुसार ञकार को पुनः नकार तथा उसे क्विन्प्रत्ययस्य कुः (३०४) सूत्र से ङकार करने पर—'गो अङ्'। अब तीन प्रकार की सन्धि करने मे—'१. गवाङ्, २ गोअङ्, ३ गोऽङ्' ये तीन रूप सिद्ध होते हैं। 'औ' मे—गो अञ्च् + औ। नपुंसकाच्च (२६५) सूत्र से 'औ' को शी आदेश होकर तीन प्रकार की सन्धि करने से—'१. गवाञ्ची, २. गोअञ्ची, ३. गोऽञ्ची' ये

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 517, कुल 633 में से · BharatKosha