लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहल्न्त-नपुंसकलिङ्ग-प्रकरणम् ५०३ तीन रूप सिद्ध होते हैं। ध्यान रहे कि लुप्तनकार अञ्चु न होने से अचः (३३५) से अकार का लोप न होगा। इसी प्रकार भत्व में सर्वत्र जानना चाहिये। 'जस्' में—गो अञ्च्+जस्। जस् को शि आदेश होकर नकारलोप न होने के कारण सर्वनामस्थान परे होने पर भी उगिदचां सर्वनामस्थानेऽधातोः (२८६) से नुँम् आगम नहीं होता। नपुंसकस्य झलचः (२३६) से भी नुँम् न होगा, क्योंकि वहां पर 'अचः परस्यैव झलो नुम्विधानम्' यह व्यवस्था की गई है। अब तीन प्रकार की सन्धि करने से—१. गवाञ्चि, २. गोअञ्चि, ३. गोऽञ्चि—ये तीन रूप सिद्ध होते हैं। द्वितीया विभक्ति में भी प्रथमावत् प्रक्रिया होती है। 'टा' में—गो अञ्च्+आ (टा)। नकार का लोप न होने के कारण अचः (३३५) सूत्र प्रवृत्त नहीं होता। केवल तीन प्रकार की सन्धि करने से—१. गवाञ्चा, २. गोअञ्चा, ३. गोऽञ्चा—ये तीन रूप सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार—ङे, ङसिँ, ङस्, ओस्, आम् और ङि में प्रक्रिया होती है। 'भ्याम्' में—गो अञ्च्+भ्याम्। संयोगान्तस्य लोपः (२०) सूत्र से चकार- लोप, निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के न्यायानुसार ञकार को नकार तथा क्विं- न्प्रत्ययस्य कुः (३०४) से उसे ङकार होकर तीन प्रकार की सन्धि करने से—१. गवाङ्भ्याम्, २. गोअङ्भ्याम्, ३. गोऽङ्भ्याम्—ये तीन रूप सिद्ध होते हैं। इसी प्रकार—भिस् और भ्यस् में भी प्रक्रिया होती है। 'सुप्' में - गो अञ्च्+सुप्। संयोगान्तलोप, ञकार को नकार तथा क्विन्प्रत्य- यस्य कुः(३०४)से नकार को ङकार होकर—गोअङ्+सु। आदेश-प्रत्यययोः (१५०) से षत्व, इणोः कुँक् टुँक् शरि (८६) सूत्र से वैकल्पिक कुँक् आगम करने पर तीनों प्रकार की सन्धि हो जाती है— अवङ्पक्ष में —— { गवाङ्क्षु, गवाङ्षु। } प्रकृतिभावपक्ष में— { गोअङ्क्षु गोअङ्षु। } पूर्वरूपपक्ष में—— { गोऽङ्क्षु, गोऽङ्षु। } पूजापक्ष में 'गोअञ्च्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० गवाङ् ⎬ गवाञ्ची ⎧ गवाञ्चि | तृ० गवाञ्चा ⎬ गवाङ्भ्याम् ⎧ गवाङ्गिः गोअङ् ⎨ गोअञ्ची ⎨ गोअञ्चि | गोअञ्चा ⎨ गोअङ्भ्याम् ⎨ गोअङ्गिः गोऽङ् ⎭ गोऽञ्ची ⎩ गोऽञ्चि | गोऽञ्चा ⎭ गोऽङ्भ्याम् ⎩ गोऽङ्गिः द्वि० गवाङ् ⎬ गवाञ्ची ⎧ गवाञ्चि | च० गवाञ्चे ⎬ गवाङ्भ्याम् ⎧ गवाङ्ग्यः गोअङ् ⎨ गोअञ्ची ⎨ गोअञ्चि | गोअञ्चे ⎨ गोअङ्भ्याम् ⎨ गोअङ्ग्यः गोऽङ् ⎭ गोऽञ्ची ⎩ गोऽञ्चि | गोऽञ्चे ⎭ गोऽङ्भ्याम् ⎩ गोऽङ्ग्यः १. यहाँ पक्ष में चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् (वा० १४) से षकार को वर्गद्वितीय—खकार हो जाता है। इस से सुप् में तीन रूप और बढ़ कर नौ रूप हो जाते हैं।