भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 519

५०४ · भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्यां ५० गवाङ्च \ } गवाङ्भ्याम् \ } गवाङ्भ्य \ | ष० गवाङ्च \ } गवाङ्चो \ } गवाञ्चाम्
\ \ \ गोअञ्च \ } गोअड्भ्याम् \ } गोअड्भ्यः \ | \ \ \ गोअञ्च \ } गोअञ्चो \ } गोअञ्चाम्
\ \ \ गोऽञ्च \ } गोऽड्भ्याम् \ } गोऽड्भ्य \ | \ \ \ गोऽञ्च \ } गोऽञ्चो \ } गोऽञ्चाम्
\ \ \ \ \ स० गवाङ्चि \ } गवाङ्चो \ } { गवाङ्ख्पु, गवाङ्क्षु, गवाङ्पु \ \ \ \ \ \ \ \ गोअञ्चि \ } गोअञ्चो \ } { गोअड्ख्पु, गोअड्क्षु, गोअड्पु \ \ \ \ \ \ \ \ गोऽञ्चि \ } गोऽञ्चो . \ } { गोऽट्पु, गोऽड्क्षु, गोऽट्पु स० सम्बोधन मे प्रथमावत् रूप बनते हैं । तो इस प्रकार गतिपक्ष मे ४६ रूप तथा पूजापक्ष मे ६६ रूप अर्थात् कुल मिलाकर ४६ + ६६ = ११५ रूप बनते हैं। जस् और शस् मे पूजा और गति दोनो पक्षो मे एक समान रूप बनते हैं, अतः एक सौ पन्द्रह रूपो मे छ रूप घटा देने पर — ११५ - ६ = १०६ रूप अवशिष्ट रहते हैं¹ । यद्यपि पूजापक्ष मे सुप् मे चयो द्वितीयाः० वार्त्तिक से वर्गद्वितीय आदेश होने से तीन रूप और बढ कर एक सौ बारह रूप होते हैं, तथापि यहा सूत्रकार के मतानुसार एक सौ नौ (१०६) रूपो का परिगणन सम- झना चाहिये । इस शब्द पर एक रोचक प्रश्नोत्तर बहुत प्रसिद्ध है । तथाहि— प्रश्न — $$ जायन्ते नव सौ, तथाऽमि च नव, भ्याम्भिर्भ्यसा सङ्गमे

षट्सङ्ख्यानि, नवेव सुप्यथ जसि त्रीण्येव तद्वच्छसि ।

चत्वार्यन्यवचस्सु कस्य विबुधा ! शब्दस्य रूपाणि तज्-

ज्ञानन्तु प्रतिभास्ति चेन्निगदितुं षाण्मासिकोऽत्रावधिः ॥ $$ $\begin{aligned} &शार्दूलविक्री- &डितम् \end{aligned}$ भावार्थ.— हे बुधजनो ! यदि आप मे बुद्धि है तो हम आपको छ मास का अवसर प्रदान करते हैं आप उस शब्द को जानने का प्रयत्न करे जिस के सुं अम् और सुप् मे नौ नौ, भ्याम्, भ्यस् और भिस् मे छ छ, जस् और शस् मे तीन-तीन तथा अन्यवचनो मे चार-चार रूप बनते हैं । उत्तर — गवाञ्चशब्दस्य रूपाणि क्लीबेऽर्चागतिमभेदतः । \ \ \ \ \ \ \ असन्ध्यवड्पूर्वरूपैर्नवाधिकशतं (१०६) मतम् ॥१॥ भावार्थ.—नपुंसकलिङ्ग मे गति और पूजा के भेद से तथा प्रकृतिभाव, अवङ् और पूर्वरूप के कारण गोपूर्वक क्विबन्त अञ्चु के एक सौ नौ रूप होते हैं। तथाहि— \ \ \ \ \ \ \ स्वम्सुप्सु नव षड् भावौ षट्के स्युस्त्रीणि जदशसोः । \ \ \ \ \ \ \ चत्वारि शेषे दशके रूपाणीति विभावय ॥२॥ ¹ यद्यपि तीन भ्याम् प्रत्ययो, दो भ्यस् प्रत्ययो एव पञ्चमी षष्ठी तथा इतर विभ- क्तियों मे भी रूपो के एक जैसा होने से एक सौ नौ (१०६) रूप युक्त नही कहे जा सकते, तथापि यहा—उसी एक विभक्ति मे यदि रूपो की समानता पाई जाये तो उसे एक रूप मानना चाहिये, इतरेतर विभक्तियों मे नही—यह अभिप्राय इष्ट होने मे कोई दोष नही आता । किञ्च यहा सम्बोधन के रूपो के परिगणन का प्रश्न नही उठाना चाहिये, क्योकि सम्बोधन विभक्ति तो विशेष प्रकार की प्रथमा ही होती है [सम्बोधने च (८८६)] ।