भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 529

५१४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् द्वितीया में भी इसी तरह प्रयोग बनते हैं। शेष प्रक्रिया पुंवत् होती है। नपुंसक में 'अदस्' शब्द की रूपमाला यथा— प्र० अद अमू अमूनि | प० अमुष्मात् अमूभ्याम् अमीभ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० अमुष्य अमुयोः अमीषाम् तृ० अमुना अमूभ्याम् अमीभिः | स० अमुष्मिन् ,, अमीषु च० अमुष्मै ,, अमीभ्यः | सम्बोधन नहीं होता। (यहाँ सकारान्त नपुंसक शब्दों का विवेचन समाप्त होता है।) अभ्यास (४८) (१) 'ऊर्जि' पर नश्छान्तां संयोग लिखने की क्या आवश्यकता थी ? (२) नपुंसक में भसञ्ज्ञा और सर्वनामस्थानसञ्ज्ञा कहाँ २ होती है ? (३) हलन्तनपुंसक में ऐसा कौन सा शब्द है जिसके सुँ और अम् के रूपों में भेद होता है ? (उत्तर—अन्वादेश में 'इदम्' शब्द) । (४) गविपक्ष के 'गवाक्षु' में चयो द्वितीया० क्या प्रवृत्त नहीं होता ? (५) धनुस् को सान्त मानें या षान्त ? विवेचन करें। (६) 'अद' प्रयोग में त्यदाद्यत्व तथा उत्व-मत्व क्यों नहीं होते ? (७) 'इदम्' के नपुंसक के अन्वादेश में 'एनत्' क्यों विधान किया गया है, क्या 'एन' आदेश से काम नहीं चल सकता था ? (८) नपुंसक में शवन्त शब्द चार प्रकार के होते हैं—स्पष्ट करें। (६) वारि, ददति, तुदति, पचति, दीव्यति, दीव्यन्ति, ये, इमे, ते, ये, एते— प्रयोग क्या अन्यशब्द वा धातु की वा अन्य विभक्ति की भ्रान्ति तो उत्पन्न नहीं कराते ? स्पष्ट करें। (१०) 'गो शब्द्' शब्द के १०६ रूपों की सङ्क्षिप्तरीत्या सिद्धि करें। (११) गवाक्शब्द के १०६ रूपों की सङ्ख्या पर आपत्ति उठाते हुए उन का समाधान करें। (१२) तत्, यत्, एनत्—में तदोः सः० द्वारा सकारादेश क्यों न हो ? (१३) 'वार्षु' में शर् परे होने पर रेफ को विसर्ग आदेश क्यों नहीं होता ? (१४) ऊर्जि, चत्वारि, सुपुमांसि, धनूंषि, पयोभिः, धनुष्षु, तपांसि, हे दण्डि, सुपन्थानि, अह्री, इमे, श्वनडुत्, अमूनि—इन प्रयोगों की सूत्रनिर्देश- पूर्वक सिद्धि करें। [लघु०] इति हलन्ता नपुंसकलिङ्गा [शब्दा ] ॥ अर्थ.—यहाँ हलन्त नपुंसकलिङ्ग शब्दों का प्रकरण समाप्त होता है। व्याख्या—षड्लिङ्गप्रकरण भी यहाँ समाप्त समझना चाहिये। -: ० :- इति भैमीव्याख्योपेतायां लघु-सिद्धान्त- कौमुद्यां हलन्त-नपुंसकलिङ्ग- प्रकरणं समाप्तम् ॥ [समाप्ता चात्र षड्लिङ्गी बोध्या ॥]