भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 528

ये ही शब्द जब बहुव्रीहि में किसी के विशेषण बन जायें, तब नपुंसकलिङ्ग में तो उच्चारण इसी प्रकार होगा। परन्तु पुंल्लिङ्ग तथा स्त्रीलिङ्ग में 'वेधस्' के समान उच्चारण होगा— प्रसन्नमनाः पुरुषः, प्रसन्नमनाः स्त्री। प्रसन्नमनसः पुमांसः स्त्रियो वा। प्रसन्नमनसं पुमांसं स्त्रियं वा। [लघु०] सुपुम्। सुपुंसी। सुपुमांसि ॥ व्याख्या—शोभनाः पुमांसो यस्मिन् तत् सुपुम् (कुलम्)। जिस कुल या नगर आदि में सुन्दर या अच्छे पुरुष हों उस कुल या नगर आदि को 'सुपुंस्' कहते हैं। सुपुंस्+सुँ। यहां सुँ का लुक् होकर संयोगान्तस्य लोपः (२०) द्वारा सकार का भी लोप हो जाता है। अब निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः द्वारा अनुस्वार अपने पूर्व वाले रूप मकार में परिणत हो जाता है—सुपुम्। सुपुंस्+औ = सुपुंस्+शी = सुपुंस्+ई = सुपुंसी। सुपुंस्+जस्। यहां जस् के स्थान पर भावी 'शि' सर्वनामस्थान की विवक्षा में पुंसोऽसुङ् (३५४) द्वारा असुङ् आदेश हो कर—सुपुमस्+जस्। पुनः 'शि' आदेश, झलन्तलक्षण नुँम्, सान्तमहतः० (३४२) से दीर्घ तथा नश्चापदान्तस्य झलि (७८) से अनुस्वार होकर—सुपुमांसि। 'सुपुंस्' शब्द की नपुंसक में रूपमाला यथा— प्र० सुपुम् सुपुंसी सुपुमांसि | प० सुपुंसः सुपुम्भ्याम् सुपुम्भ्यः द्वि० ,, ,, ,, | ष० ,, सुपुंसोः सुपुंसाम् तृ० सुपुंसा सुपुम्भ्याम् सुपुम्भिः | स० सुपुंसि ,, सुपुंसु च० सुपुंसे ,, सुपुम्भ्यः | सं० हे सुपुम्! हे सुपुंसी! हे सुपुमांसि ! नोट—वस्वन्त नपुंसकों का उच्चारण—विद्वत्-द्, विदुषी, विद्वांसि। उपे- यिवत्, उपेयुषी, उपेयिवांसि। उपेयिवद्भ्याम्। उपेयिवत्सु। इस प्रकार होगा। अन्य सकारान्तों का नपुंसक में—ज्यायः, ज्यायसी, ज्यायांसि आदि। [लघु०] अदः। विभक्तिकार्यम्। उत्व-मत्वे। अमू। अमूनि। शेषं पुंवत् ॥ व्याख्या—अब 'अदस्' शब्द के नपुंसक में रूप सिद्ध किये जाते हैं— अदस्+सुँ। सुँलुक् होकर रुँत्व विसर्ग करने से—अदः¹। अदस्+औ=अदस्+ई (शी)। उत्व-मत्व के असिद्ध होने से प्रथम त्यदा- द्यत्व, पररूप, और गुण एकादेश होकर—'अदे'। अब अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) सूत्र से एकार को ऊकार तथा दकार को मकार होकर—अमू। अदस्+जस्=अदस्+शि। त्यदाद्यत्व, पररूप, नुँम् आगम तथा उपधादीर्घ (१७७) होकर—अदानि। अब अदसोऽसेर्दादु दो मः(३५६) सूत्र से उत्व-मत्व करने से—अमूनि। १. यहां अदस् शब्द के सान्त होने से अदसोऽसेर्दादु दो मः (३५६) द्वारा उत्व-मत्व नहीं होता। विभक्ति परे न होने के कारण त्यदादीनामः (१६३) सूत्र से अत्व भी नहीं हो सकता। ल० प्र० (३३)