भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 533

५१८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [११] युगपत्* ॥ १ एक साथ, एक ही समय मे— सहस्रमक्ष्णा युगपत् पपात (कुमार० ३ १)। युगपज्ज्ञानानुपपत्तिर्मनसो लिङ्गम् (न्यायदर्शन १.१.१६) । [१२] आरात्* ॥ आराद् दूरसमीपयोरित्यमरः । १ दूर—आराद् दुष्टात् सदा वसेत् । दुष्ट से सदा दूर रहे । २ समीप, निकट—तमर्च्यम् आराद् अभिवर्त्तमानम् (रघु० २ १०) । ग्रामादारादारामः—गांव के पास बगीचा है । नोट—'आरात्' के योग में अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते (२. ३ २६) सूत्र से पञ्चमी विभक्ति का विधान है । [१३] पृथक्* ॥ १ अलग, भिन्न—शङ्खान् दध्मुः पृथक् पृथक् (गीता० १ १८) । साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः (गीता० ५ ४) । २ विना, बगैर—राम पृथग् नहि सुखम् । नोट—'विना' अर्थ वाले पृथक् के योग में पृथग्विनानानाभिस्तृतीयान्य- तरस्याम् (२.३.३२) सूत्र से द्वितीया, तृतीया तथा पञ्चमी विभक्ति का विधान है । [१४] ह्यस्* ॥ १. बीत चुका पिछला दिन (Yesterday)—ह्योऽस्माकं परीक्षामभूत् । ह्यो भवम्—ह्यस्त्यं ह्यस्तनं वा । ऐषमोऽह्यःश्वसोऽन्यतरस्याम् (४ २ १०४) सूत्र से पाक्षिक त्यप् हो जाता है । तदभाव में सायं-चिर-प्राह्णे-प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्ठुलौ तुट् च (४.३ २३) से ट्युप्रत्यय हो कर उसे तुँट् का आगम हो जाता है । ह्यस्त्यम्=अतीत कल से सम्बन्ध रखने वाला कार्य आदि । [१५] श्वस्*॥ १. Tomorrow आने वाला कल—श्वःकार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्णे चापरा- ह्निकम् । नहि प्रतीक्षते मृत्युः कृतमस्य न वा कृतम् (महाभारत० १२.३२१.७३) । वरमद्य कपोत श्वोमयूरत्—नौ नकद न तेरह उधार । [१६] दिवा*॥ १. दिन—दिवा च रात्रिश्च दिवारात्रम्, दिन और रात । निद्रया ह्रियते नक्तं दिवा च व्यर्थकर्मभिः (भागवत० १ १६.६) । २ दिन मे—पीनोऽयं देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते (लोकोक्ति) । [१७] रात्रौ ॥ १. रात मे—रात्रौ वृत्तं तु द्रक्ष्यति । रात्रौचरः । ये दोनों उदाहरण गणरत्न- महोदधि के हैं । 'रात्रौ' को अव्यय मानना हमारे विचार मे युक्त प्रतीत नहीं होता । 'रात्रि' शब्द से ही काम चल सकता है । यदि इसे अव्यय मानना ही अभीष्ट है तो 'रात्रौ' को विभक्तिप्रतिरूपक अव्यय माना जा सकता है ।

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