लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्ययं-प्रकरणम् ५१६ [१८] सायम्*॥ १. सायङ्काल, शाम का समय—प्रयता प्रातरन्वेतु सायं प्रत्युद्व्रजेदपि (रघु० १.६०)। सायं प्रातर्मनुष्याणामशनं वेदनिर्मितम्। नान्तरा भोजनं दृष्टमुपवासी तथा भवेत् (महाभारत० १२.१६३.१०)। नोट—इसी अर्थ में घञन्त 'साय' शब्द का भी प्रयोग देखा जाता है। वह घञन्त होने से पुंलिङ्ग माना जाता है। संख्या-वि-सायपूर्वस्या-ह्नस्यान्यतरस्यां ङौ (६.३.१०६) सूत्र में इसी का ग्रहण होता है—सायाह्नि, सायाहनि, सायाह्ने । इस विषय में सायं॑चिरंप्राह्णे प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्त्युलो तुट् च (४.३.२३) सूत्र की काशिका- वृत्ति भी द्रष्टव्य है। [१९] चिरम्*॥ १. देर तक—मुहूर्त्तं ज्वलितं श्रेयो न च धूमायितं चिरम् (महाभारत ५.१३३. १५); देर तक धूंआ देने की अपेक्षा थोड़ी देर तक प्रज्वलित होना श्रेष्ठ है। चिरं जीवतु मे भर्ता। नोट—दीर्घकालवर्त्ती पदार्थ में त्रिलिङ्गी चिर शब्द बहुधा प्रयुक्त होता है। इसी से ही चिरजीविन्, चिरायुष्, चिरक्रिय, चिरकारिन् आदि शब्द निष्पन्न होते हैं। 'चिरं जीवतु मे भर्ता' आदि 'चिरम्' अव्यय के उदाहरण भी चिरशब्द से क्रियाविशे- षणत्वेन निष्पन्न हो सकते हैं। इस अव्यय का फल 'चिरञ्जीवी, चिरञ्जीवकः' प्रभृति कतिपय शब्दों में ही देखा जाता है। 'चिरन्तनः' भी चिरशब्द से निष्पन्न हो सकता है। देखें—सायंचिरंप्राह्णे० (४.३.२३) सूत्र पर काशिकावृत्ति । [२०] मनाक्*॥ १. जरा, थोड़ा-सा—कुतूहलाक्रान्तमना मनागभूत् (नैषध० १.११६)। रे पान्थ विह्वलमना न मनागपि स्याः (भामिनी० १.३६) । [२१] ईषत्*॥ १. थोड़ा, स्वल्प, कुछ—ईषदोपचुम्बितानि भ्रमरैः (शाकुन्तल० १ ४)। ईषच्च कुरुते सेवां तमेवेच्छन्ति योषितः (पञ्च० १.१५२) । २. आसानी से, विना कठिनाई से—ईषत्करः कटो भवता; (८७६) सूत्र पर इस व्याख्या में इस उदाहरण का विवेचन देखें । [२२] जोपम्*॥ तूष्णीमर्थे सुखे जोपम् इत्यमरः। १. चुप, शान्त—जोपमाप न विशिष्य वभाषे (नैषध० ५.७८)। किमिति जोपमास्यते ? (शाकुन्तल० ५)। २. सुखपूर्वक—जोपमास्ते जितेन्द्रियः; जितेन्द्रिय पुरुष सुख से रहता है। [२३] तूष्णीम्*॥ मौने तु तूष्णीम् इत्यमरः। चुप्प—न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह (गीता० २.६) ।