लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [२४] वहिस्*॥ १ बाहर, बाहर से—स शूद्रवद् बहिष्कार्यः सर्वस्माद् द्विजकर्मण (मनु० २ १०३)। अन्तर्विषमया होता वहिश्चैव मनोहरा। गुञ्जाफलसमाकाराः स्वभावादेव योषित (पञ्च० ४८७)। २ वाह्य—न खलु बहिरुपाधीन प्रीतयः संश्रयन्ते (उत्तर- राम० ६ १२)। [२५] अवस् ॥ १ बाहर, नीचे आदि-अवो गच्छति (गणरत्न०) । इस के प्रयोग अवे- ष्टव्य हैं। नोट—पञ्चम्यन्तात् सप्तम्यन्तात् प्रथमान्ताद्वा अवरशब्दात् पूर्वाधरावरा- णामसिं पुरधवश्चैषाम् (५३३६) इति असिंप्रत्यये अवरशब्दस्य च 'अव' इत्यादेशे तद्धितश्चाऽसर्वविभक्ति (३६८) इत्यनेनैवाव्ययत्वे सिद्धे स्वरादौ पाठश्चिन्त्य इति केचित् । [२६] अधस्*॥ १ नीचे—अध पश्यसि किं वृद्धे तव किं पतितं भुवि। रे रे मूढ न जानासि गत तारुण्यमौक्तिकम् (चाणक्य०)। अधोऽधः = नीचे और नीचे—अधोऽधः पश्यतः कस्य महिमा नोपचीयते। उपर्युपरि पश्यन्तः सर्व एव दरिद्रति (हितोप० २.२)। [२७] समया*॥ १ समीप—ग्रामं समया रम्या पुष्पवाटिका। यि सिन्धवः समया सन्नुरद्रिम् (ऋ० १.७३.६); पर्वत के समीप नदियां बहती हैं। अमरकोष में इस का अर्थ 'मध्य' भी दिया गया है—समयाऽन्तिकमध्ययोरित्यमरः । इस अर्थ मे प्रयोग कम हैं। नोट—इस के योग मे द्वितीया का विधान है [देखें विभक्त्यर्थप्रकरणपरि- शिष्ट (११)]। [२८] निकषा*॥ १ समीप—विलङ्घ्य लङ्कां निकषा हनिष्यति (माघ० १.६८), क्या आप को याद है कि आप ने समुद्र पार कर के लङ्का के समीप रावण को मारा था ? अभिज्ञावचने लृट् (७६१) मे भूतकाल में लृट् का प्रयोग है। पूरा श्लोक सार्थ इस व्याख्या की लकारार्थप्रक्रिया में इसी सूत्र पर देखें। नोट—इस के योग मे भी पूर्ववत् द्वितीया विभक्ति का विधान है। [२६] स्वयम्*॥ १ आत्मना, अपने आप—इन्द्रोऽपि लघुता याति स्वयं प्रख्यापितैर्गुणैः (चाणक्य०) ।१ १. दो सहेलियां अपने-अपने पति का गुणबखान इस प्रकार करती हैं— चतुरः सखि मे भर्ता यल्लिखति च तत् परो न वाचयति । तस्मादप्यधिको मे स्वयमपि लिखितं स्वयं न वाचयति ॥ (समयोचित०)