लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५२१ [३०] वृथा*॥ १. व्यर्थ, बेकार, निरर्थक-वृथा वृष्टिः समुद्रेषु वृथा तृप्तस्य भोजनम् । वृथा दानं समर्थस्य वृथा दीपो दिवाऽपि च (सुभाषित०) । [३१] नक्तम्*॥ रात्रि (में)—न नक्तं दधि भुञ्जीत (चरक सूत्र० ७.५८), रात में दही सेवन न करे। २. रात-नक्तं च दिवा च नक्तंदिवम् । अचतुर० (५.४.७७) सूत्र से निपातन होता है। नोट-संस्कृतसाहित्य मे 'नक्त' इस प्रकार का अजन्त नपुंसक शब्द भी रात्रि- वाचक विद्यमान है। इस से नक्तञ्चर, नक्तभोजिन्, नक्तान्ध, नक्तमाल प्रभृति शब्द बनते हैं। पर यहां मकारान्त अव्यय मानना भी परम आवश्यक है । अन्यथा-नक्त- ञ्चरः, नक्तञ्चारी, नक्तन्तनम्, नक्तन्दिनम्, नक्तन्दिवम् प्रभृति शब्द न बन सकेंगे। [३२]नञ्*॥ १. नहीं, प्रतिषेध-एकः स्वादु न भुञ्जीत, स्वार्थमेको न चिन्तयेत् । एको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्तेषु जागृयात् (सुभाषितसुधा०) । प्रतिषेध दो प्रकार का होता है-पर्युदास और प्रसज्य । इस का विवेचन पीछे (१८) सूत्र पर कर चुके है । नोट- 'नञ्' के अन्त्य ञकार का लोप हो जाता है अतः प्रयोग मे 'न' ही आता है। यह अनुबन्ध इसलिये लगाया गया है कि नलोपो नञः (६४७) सूत्र में इसी नकार का ग्रहण हो अग्रिमपठित 'न' का न हो। अतः 'नैकधा' (नैषध० २.२) आदियों में उस सूत्र की प्रवृत्ति नही होती । इस नञ् के अनेक अर्थ होते हैं। यहां सरल साधारण प्रसिद्ध अर्थ लिख दिया है। 'ईषत्' अर्थ में भी यह कुछ २ प्रसिद्ध है-अनुदरा (अल्पोदरी) कन्या । नञ् के अर्थों का विशेष विस्तार वैयाकरणभूषणसार आदि उच्च ग्रन्थों में देखें । [३३] न*॥ १. नही, प्रतिषेध-योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति (गीता० ५.६)। न चिरेण = नचिरेण । सुप्सुपेति समासः । चित्रं चित्रं किमथ चरितं नैकभावाश्रयाणाम् । सेवाधर्मः परमगहनो योगिनामप्यगम्यः (हितोप० २.१६०) । इसी प्रकार-नैकधा, नान्तरीयम्, गमिकर्मीकृतनैकनीवृता (नैषध० २.४०) आदियों में समझना चाहिये । [३४] हेतौ ॥ १. निमित्त (में)-हेतौ हृष्यति (गणरत्न०) । नोट-यह अव्यय हमें किसी ग्रन्थ में नहीं मिला । गणरत्नमहोदधि का यह उदाहरण भी सप्तम्यन्त हेतुशब्द से सिद्ध हो सकता है। अतः इस के प्रयोग अन्वे- ष्टव्य हैं। [३५] इद्धा ॥ १. प्रकट, जाहिर-समिद्धमिद्धेश महो ददासि (गणरत्न०) ।