भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

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पृष्ठ 537

५२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नोट—यह अव्यय हमें किसी ग्रन्थ में नहीं मिला। किसी कोषकार ने इस का उल्लेख नहीं किया। वैदिक साहित्य में भी इस का कहीं पता नहीं चला। उपर्युक्त उदाहरण गणरत्नमहोदधिकार श्रीवर्धमान (वैक्रम० ११६७) का है। अन्य सब व्याख्या- कारों ने इसे ही उद्धृत किया है। वाचस्पत्यकोषकार ने यह उदाहरण भागवत का माना है परन्तु हमें यह भागवत में नहीं मिला। [३६] अद्धा ॥ १ वस्तुतः, यथार्थतः—एष ह वा अनद्धा पुरुषो यो न देवानर्चति न पितॄन् न मनुष्यान् (शत० ब्रा० ८.३.१.२४), जो देवताओं, पितरों और मनुष्यों की पूजा नहीं करता वह वस्तुतः मनुष्य नहीं। को अद्धा वेद (ऋ० ३.५४.५); इस संसार को यथार्थतः कौन जान सकता है?। २ सचमुच, निस्सन्देह—अद्धा नकिरन्यस्त्वावान् (ऋ० १.४२.१३), हे प्रभो ! सचमुच तेरे जैसा कोई नहीं। यास्यत्यद्धाऽकुतोभयम् (भागवत० १.१२.२८), निस्सन्देह वह अमरपद को पायेगा। ३ साक्षात्—त्वयि मेऽनन्यविषया मतिर्मधुपतेऽसकृत् । रतिमुद्वहतादद्धा गङ्गेवौघमुदन्वति (भागवत० १. ८.४२), हे मधुपते ! जैसे गङ्गा का प्रवाह निरन्तर समुद्र की ओर बढ़ता रहता है वैसे ही साक्षात् आप में मेरी सर्वदा अनन्यप्रीति हो। [३७] सामि*॥ १ आधा—सामिकृतम्, सामिभुक्तम् । सामिभुक्तविषया समागमा. (रघु० १६.१६)। अभिवीक्ष्य सामिकृतमण्डन यती (माघ० १३.३१) । सामि (२.१.२२) इति समास। २ निन्दित, आक्षेपयोग्य—उदाहरणमृग्यम् । [३८] वत्*। ब्राह्मणवत् । क्षत्रियवत् ॥ नोट—‘वत्’ यह प्रत्यय है। वतिँप्रत्ययान्त अव्यय हो—यह इस के ग्रहण का प्रयोजन है। यहां तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः (११४८), तत्र तस्येव (११४६), तदर्हम् (५.१.११६) इन तीन सूत्रों से विहित वतिँप्रत्यय का ही ग्रहण समझना चाहिये। ब्राह्मणवत्, क्षत्रियवत्—ये दो वतिँप्रत्ययान्त के उदाहरण दिये गये हैं। इसी प्रकार —नृपवत्, बालवत्, चौरवत् आदि अन्य वत्यन्त शब्द भी जान लेने चाहियें। यह वतिँप्रत्यय सादृश्य अर्थ में प्रयुक्त होता है। यथा—ब्राह्मणवत् = ब्राह्मण के समान, क्षत्रियवत् = क्षत्रिय के समान इत्यादि। वस्तुतः इस अव्यय का पाठ यहां उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि वतिँप्रत्ययान्तों की अव्ययसंज्ञा तो तद्धितश्चासर्वविभक्तिः (३६८) से ही सिद्ध है। [३६] सना ॥ १. सदा, हमेशा, नित्य—सना भुवन् द्युम्नानि मोत जारिषुः (ऋ० १.१३६. ८), धन नित्य रहें कभी नष्ट न हों। सना भव—सनातनो धर्मः, सायंचिरंप्राह्णे- प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलो तुँट् च (४.३.२३) इति ट्युप्रत्ययस्तस्य च तुँडागम । एष धर्मः सनातनः (उत्तरराम० ५.२२) ।