भारतकोश
संग्रह पर लौटें

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

५२२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नोट—यह अव्यय हमें किसी ग्रन्थ में नहीं मिला। किसी कोषकार ने इस का उल्लेख नहीं किया। वैदिक साहित्य में भी इस का कहीं पता नहीं चला। उपर्युक्त उदाहरण गणरत्नमहोदधिकार श्रीवर्धमान (वैक्रम० ११६७) का है। अन्य सब व्याख्या- कारों ने इसे ही उद्धृत किया है। वाचस्पत्यकोषकार ने यह उदाहरण भागवत का माना है परन्तु हमें यह भागवत में नहीं मिला। [३६] अद्धा ॥ १ वस्तुतः, यथार्थतः—एष ह वा अनद्धा पुरुषो यो न देवानर्चति न पितॄन् न मनुष्यान् (शत० ब्रा० ८.३.१.२४), जो देवताओं, पितरों और मनुष्यों की पूजा नहीं करता वह वस्तुतः मनुष्य नहीं। को अद्धा वेद (ऋ० ३.५४.५); इस संसार को यथार्थतः कौन जान सकता है?। २ सचमुच, निस्सन्देह—अद्धा नकिरन्यस्त्वावान् (ऋ० १.४२.१३), हे प्रभो ! सचमुच तेरे जैसा कोई नहीं। यास्यत्यद्धाऽकुतोभयम् (भागवत० १.१२.२८), निस्सन्देह वह अमरपद को पायेगा। ३ साक्षात्—त्वयि मेऽनन्यविषया मतिर्मधुपतेऽसकृत् । रतिमुद्वहतादद्धा गङ्गेवौघमुदन्वति (भागवत० १. ८.४२), हे मधुपते ! जैसे गङ्गा का प्रवाह निरन्तर समुद्र की ओर बढ़ता रहता है वैसे ही साक्षात् आप में मेरी सर्वदा अनन्यप्रीति हो। [३७] सामि*॥ १ आधा—सामिकृतम्, सामिभुक्तम् । सामिभुक्तविषया समागमा. (रघु० १६.१६)। अभिवीक्ष्य सामिकृतमण्डन यती (माघ० १३.३१) । सामि (२.१.२२) इति समास। २ निन्दित, आक्षेपयोग्य—उदाहरणमृग्यम् । [३८] वत्*। ब्राह्मणवत् । क्षत्रियवत् ॥ नोट—‘वत्’ यह प्रत्यय है। वतिँप्रत्ययान्त अव्यय हो—यह इस के ग्रहण का प्रयोजन है। यहां तेन तुल्यं क्रिया चेद्वतिः (११४८), तत्र तस्येव (११४६), तदर्हम् (५.१.११६) इन तीन सूत्रों से विहित वतिँप्रत्यय का ही ग्रहण समझना चाहिये। ब्राह्मणवत्, क्षत्रियवत्—ये दो वतिँप्रत्ययान्त के उदाहरण दिये गये हैं। इसी प्रकार —नृपवत्, बालवत्, चौरवत् आदि अन्य वत्यन्त शब्द भी जान लेने चाहियें। यह वतिँप्रत्यय सादृश्य अर्थ में प्रयुक्त होता है। यथा—ब्राह्मणवत् = ब्राह्मण के समान, क्षत्रियवत् = क्षत्रिय के समान इत्यादि। वस्तुतः इस अव्यय का पाठ यहां उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि वतिँप्रत्ययान्तों की अव्ययसंज्ञा तो तद्धितश्चासर्वविभक्तिः (३६८) से ही सिद्ध है। [३६] सना ॥ १. सदा, हमेशा, नित्य—सना भुवन् द्युम्नानि मोत जारिषुः (ऋ० १.१३६. ८), धन नित्य रहें कभी नष्ट न हों। सना भव—सनातनो धर्मः, सायंचिरंप्राह्णे- प्रगेऽव्ययेभ्यष्ट्युट्युलो तुँट् च (४.३.२३) इति ट्युप्रत्ययस्तस्य च तुँडागम । एष धर्मः सनातनः (उत्तरराम० ५.२२) ।

अव्यय-प्रकरणम् ५२३ [४०] सनत् ॥ १. सदा, हमेशा, नित्य—सनत्कुमारः (नित्य ब्रह्मचारी ब्रह्मपुत्र) । [४१] सनात् ॥ १. सदा, हमेशा, नित्य—अशत्रुर्जनुषा सनादसि (ऋ० १.१०२.८), हे इन्द्र! तू जन्म से ही सदा शत्रुरहित है । यह अव्यय वेद में ही देखा जाता है । [४२] उपधा ॥ नोट—इस अव्यय का प्रयोग हमें कही नही मिला । श्रीसभापतिशर्मोपाध्याय सिद्धान्तकौमुदी की 'लक्ष्मी' व्याख्या में इस अव्यय पर टिप्पण करते हुए उपधा धर्मा- द्यैर्यत्परीक्षणम् इस अमरकोषोक्त वचन की विवृति करने लगते हैं । यह ठीक नहीं । क्योंकि अमरकोषोक्त 'उपधा' आवन्त स्त्रीलिङ्ग है अव्यय नहीं । [४३] तिरस्*॥ १. टेढ़ा या तिरछा—स तिर्यङ् यस्तिरोऽञ्चति—इत्यमरः । तिरोदृष्ट्या समीक्षते । २. छिपना—इति व्याहृत्य विबुधान् विश्वयोनिस्तिरोदधे (कुमार० २.६२) । ३. अनादर—गोभिर्गुरूणां परुषाक्षराभिस्तिरस्कृता यान्ति नरा महत्त्वम् । अलब्ध- शाणोत्कषणा नृपाणां न जातु मौलौ मणयो वसन्ति (भामिनी० १.७२) ।¹ नोट—छिपना आदि अर्थों में तिरस् का प्रयोग प्रायः धातु के साथ ही पाया जाता है । तिरोऽन्तर्धौ (१.४.७०) सूत्र द्वारा छिपना अर्थ में तिरस् की गतिसंज्ञा हो जाती है । गतिसंज्ञा होने से कुगतिप्रादयः (६४६) द्वारा समास हो जाता है । समास होने के कारण समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप् (८८४) से क्त्वा को ल्यप् हो जाता है । यथा—तिरोभूय, तिरोधाय इत्यादि । परन्तु कृञ् धातु के योग में 'छिपना' अर्थ होने पर भी विभाषा कृञि (१.४.७१) सूत्रद्वारा 'तिरस्' की विकल्प से गतिसंज्ञा होती है । गतिपक्ष में कुगतिप्रादयः (६४६) से समास हो कर क्त्वा को ल्यप् हो जाता है । यथा—तिरस्कृत्य । गतिसंज्ञा के अभाव में समास न होने से क्त्वा को ल्यप् नहीं होता । यथा—तिरः कृत्वा ।² [४४] अन्तरा*॥ १. अन्दर से—भवद्भिरन्तरा प्रोत्साह्य कोपितो वृषलः (मुद्रा० ३) ; आप १. वैदिक साहित्य में 'तिरस्' अव्यय का प्रयोग धातुयोग के बिना अकेले भी बहुत आता है यथा—तिर इव वै देवा मनुष्येभ्यः (शत० ब्रा० ३.१.१.८), देवता मनुष्यों से छिपे से रहते हैं । स्त्रियस्तिर इवैव पुंसो जिघत्सन्ति (शत० ब्रा० १.६. २.१२), स्त्रियां पुरुषों को मानो गुप्तरूप से खा जाती हैं । परन्तु लौकिक साहित्य में इस का प्रयोग प्रायः भू, धा, कृ धातुओं के योग में ही दृष्टिगोचर होता है । २. गतिपक्ष में तिरसोऽन्यतरस्याम् (८.३.४२) द्वारा विसर्ग को विकल्प से सकारा- देश हो जाता है । यथा—तिरस्कृत्य, तिरःकृत्य । परन्तु 'तिरःकृत्वा' में गतिसंज्ञा न होने से सकारादेश भी नही होता ।

५२४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् लोगो ने अन्दर से भड़का कर चन्द्रगुप्त को कुपित कर दिया है। २ मध्य मे, बीच मे—त्रिशङ्कुरिव अन्तरा तिष्ठ (शाकुन्तल० २), त्रिशङ्कु की तरह मध्य मे लटके रहो। मैनम् अन्तरा प्रतिबघ्नध्व (शाकुन्तल० ६); इसे बीच मे मत टोको। नाश्नीयाच्चैव तयोरन्तरा (मनु० २ ५६) सवेरे-शाम दो भोजनो के मध्य मे कुछ न खाए। ३. अन्दर ही अन्दर —अक्षेत्रे बीजमुत्सृष्टमन्तरैव विनश्यति (मनु० १० ७१), अयोग्य खेत मे डाला गया बीज अन्दर ही अन्दर नष्ट हो जाता है। ४ बिना, बगैर— न प्रयोजन- मन्तरा चाणक्य स्वप्नेऽपि चेष्टते (मुद्रा०), प्रयोजन के बिना चाणक्य स्वप्न मे भी चेष्टा नहीं करता। ५ मार्ग मे, रास्ते मे—अन्तरा चारणेभ्यस्त्वदीय जयोदाहरणं श्रुत्वा त्वामिहस्थमुपागता. (विक्रमो० १), मार्ग मे ही चारणो से तुम्हारी यशोगाथा सुनकर तुम्हारे पास यहा आये हैं। ६ सदृश—न द्रक्ष्याम. पुनर्जातु धार्मिकं रामम- न्तरा (रामायण० २ ५७ १३) राम सदृश धार्मिक पुरुष फिर हम कभी नही देखेगे। नोट—अन्तराऽन्तरेणयुक्ते (२३४) सूत्रद्वारा अन्तरा के योग मे द्वितीया विभक्ति का विधान है। [४५] अन्तरेण*॥ १ बिना, बगैर—न राजापराधमन्तरेण प्रजास्वकालमृत्युश्चरति (उत्तरराम० २)। न चान्तरेण नाव तरीतु शक्येय सरित्। क्रियान्तरान्तरायमन्तरेण आर्यं द्रष्टु- मिच्छामि (मुद्रा० २), यदि किसी काम मे विघ्न न हो तो आप के दर्शन करना चाहता हू। २ मध्य मे, बीच मे, के विषय मे—त्वां माञ्चान्तरेण कमण्डलु. (महाभाष्य), तेरे और मेरे बीच कमण्डलु है। अथ भवन्तमन्तरेण कीदृशोऽस्या दृष्टिराग ? (शाकुन्तल० २), आप के विषय मे इस का चक्षूराग कैसा था? नोट—इस के योग मे भी पूर्ववत् द्वितीया का विधान है।¹ [४६] ज्योक् ॥ १ दीर्घ काल तक, लम्बे समय तक—ज्योक् च सूर्यं दृशे (ऋ० १ २३ २१)। सधैमापुरेति ज्योग्जीवति महान् प्रजया पशुभिर्भवति महान् कीर्त्या (छान्दोग्योपनिषद् २.११.२)। नोट—यह अव्यय प्राय वैदिकसाहित्य मे प्रयुक्त देखा जाता है। [४७] कम् ॥ १. जल—कं (जले) जायत इति कञ्जम् (कमलम्)। कम् (जलम्) अल- करोतीति कमलम्। २ सुख—कम् =सुखम् अस्त्यस्येति कयु =सुखी। कशाभ्यां ष-भ-युस्-ति-तुन्त-यसः (५२१३८) इति मत्वर्थीयो युस्। सिति च (१.४.१६) इति पदत्वेनानुस्वारपरसवणौ। ३. सिर—क (शिरसि) जायन्त इति कञ्जा =केशा। १. अन्तराऽन्तरेणयुक्ते (२३४) सूत्र के भाष्य मे भाष्यकार ने अन्तरा और अन्तरेण को निपात माना है। परन्तु निपातसज्ञा करने के लिये तब इन का पाठ चादियो मे मानना होगा। अतः यहाँ स्वरादयो मे इन का पाठ प्रक्षिप्त समझना चाहिये

अव्यय-प्रकरणम् ५२५ कं (शिरः) धारयतीति कन्धरा = ग्रीवा । ४. निन्दनीय—कं (कुत्सितः) दर्पोऽस्येति कन्दर्पः=कामः । [४८] शम्* ॥ १. सुख, शान्ति, कल्याण—शं (कल्याणं) करोतीति शङ्करः । शङ्करः शं करोतु नः । शं (सुखम्) अस्त्यस्येति शंयुः = सुखी । पूर्ववद् युस् । नोट—कम्-शम्शब्दयोर्विभक्तिप्रतिरूपकाव्ययत्वे सिद्धे स्वरादौ पाठश्चिन्त्य इति केचिदाहुः । [४९] सहसा* ॥ १. बिना, विचारे, एकदम, अचानक—सहसा विदधीत न क्रियामविवेकः पर- मापदां पदम् (किरात० २.३०) । सहसोत्पतिताः सर्वे स्वासनेभ्यः ससंभ्रमम् (रामा- यण० २.१६.४) । [५०] विना* ॥ १. बिना, बगैर—दुर्भगाभरणप्रायो ज्ञानं भारः क्रियां विना (हितोप० १.१८) । नोट—इस अव्यय के योग में पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्याम् (२.३. ३२) सूत्र से द्वितीया, तृतीया तथा पञ्चमी विभक्ति का विधान है । [५१] नाना* ॥ १. बिना, बगैर—नाना नारीं निष्फला लोकयात्रा (गणरत्न०), विना स्त्री के लोकयात्रा निष्फल है । २. अनेक प्रकार के—नानाफलैः फलति कल्पलतेव भूमिः (नीति० ३७) । नानाशस्त्रप्रहरणाः सर्वे युद्धविशारदाः (गीता० १.६) । ३. पृथक् रूप में—मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति (कठो० ४.१०) । विश्वं न नाना शम्भुना (वोपदेव), यह जगत् शम्भु से पृथक् नहीं । नोट—इस अव्यय के योग में भी पूर्वोक्तसूत्र से द्वितीया, तृतीया तथा पञ्चमी विभक्ति का विधान है । वक्तव्य—विना और नाना का पाठ भी 'वत्' की तरह यहां स्वरादियों में व्यर्थ सा प्रतीत होता है । तद्धितश्चासर्वविभक्तिः (३६८) से ही इन की अव्यय- संज्ञा सिद्ध हो सकती है । [५२] स्वस्ति* ॥ १. मङ्गल, कल्याण, सुख—स्वस्त्यस्तु ते (रघु० ५.१७) । स्वस्ति भवते (शाकुन्तल० २) । नोट—इस अव्यय के योग में नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च (८६८) सूत्र से चतुर्थी विभक्ति का विधान है । [५३] स्वधा ॥ १. पितरों के निमित्त अन्न आदि देते समय उच्चार्यमाण विशिष्ट शब्द— पितृभ्यः स्वधा ।

५२६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

नोट—इस अव्यय के योग में भी पूर्ववत् चतुर्थी का विधान है। [५४] अलम्* ॥ १ भूषित करना सजाना—वाण्येका समलंकरोति पुरुषं या संस्कृता धार्यते (नीति० १५) । अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते (मनु० ३।२८)१। २ पर्याप्त होना काफी होना समर्थ होना—तस्यालमेशा क्षुधितस्य तृप्त्यै (रघु० २।३६)। अहर्त्स्येन शमयितुमलं वारिधारासहस्रं (मेघ० २।५३) । अलम्मल्लो मल्लाय (काशिका)२ । ३ निषेध करना मना करना रोकना अलं महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् (रघु० २।३४) । अलं हसितेन३। अलं बहु विकत्थ्य बहुत डींग न मारिये। अलम् अन्यथा गृहीत्वा अन्यथा ग्रहण न कीजिये । यहां के स्पष्टीकरण के लिये (८७८) सूत्र पर हमारी व्याख्या देखें । [५५-५७] वषट् । श्रौषट् । वौषट् ॥ १ देवताओ के निमित्त हविर्दान में—वषडस्तु तुभ्यम् (यजु० ११।३६) । अस्तु श्रौषट् पुरो अग्निम् (ऋ० १।१३६।१) । सोमस्याग्ने वीहि वौषट् (ऐतरेय ब्रा० ४।४।४६) । नोट—इन में से वषट् के योग में नमःस्वस्ति० (८६८) द्वारा चतुर्थी विभक्ति होती है । [५८] अन्यत ॥ १ अन्य पुनः इसके अतिरिक्त—देवदत्त आयातोऽन्यच्च यज्ञदत्तः (गण रत्न०) । प्रयोग अवेषणीय हैं । विभक्ति प्रतिरूपक अव्यय मान कर काम चल सकता है । [५६] अस्ति ॥ १ विद्यमान मौजूद—अतिधैर्य्यश्चैव राजा भार्या तथैव च । अस्ति नास्ति न जानन्ति देहि देहि पुनः पुनः (चाणक्य०) । अस्तिक्षीरा (अस्ति—विद्य मानं क्षीरमस्या ) गौ । अस्ति (विद्यमानं परलोक ) इति मतिरस्येत्यास्तिकः । अस्ति-नास्ति दिष्टं मति (४।४।६०) इति ठक् टस्येक (१०२४) इति ठस्येका देशः । अस्तित्वम् । नोट—इसे तिङन्तप्रतिरूपक अव्यय भी माना गया है । विशेष चादिगण में अस्ति क्षीरा शब्द पर देखें । १ यहां भूषणेऽलम् (१।४।६३) सूत्र से अलम् की गतिसंज्ञा होकर कुगति प्रादयः (६४६)द्वारा समास होकर समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्(८८४) से क्त्वा को ल्यप् हो जाता है । २ इस अर्थ में नमःस्वस्तिस्वाहा० (८६८) सूत्रस्थ अलमिति पर्याप्त्यर्थग्रहणम् (वा० ५२) वार्त्तिक से अलम् के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है । ३ ऐसे स्थलों में अलम् के साथ तृतीया विभक्ति का प्रयोग होता है। इस के स्पष्टी करण के लिये इस व्याख्या के विभक्त्यर्थ परिशिष्ट में (२०) संख्या देखें ।

अव्यय-प्रकरणम् ५२७ [६०] उपांशु ॥ उपांशु विजनेऽव्ययम् इति विश्वः । १. एकान्त—परिचेतुमुपांशु धारणां कुश- पूतं प्रवयास्तु विष्टरम् (रघु० ८.१८); रघु ने वृद्धावस्था को प्राप्त हो कर एकान्त में धारणा का अभ्यास करने के लिये कुशापवित्र आसन को ग्रहण किया । नोट—जिह्वोष्ठौ चालयेत् किञ्चिद् देवतागतमानसः । निजश्रवण-योग्यः स्यादुपांशुः स जपः स्मृतः । इस प्रकार का जप भी 'उपांशु' कहाता है परन्तु वह प्रायः उकारान्त पुंलिङ्ग होता है अव्यय नहीं । [६१] क्षमा ॥ १. क्षमा, माफ़ी—क्षमा करोतु भवान् (व्या० सि० सु०) । नोट—इस अव्यय के संस्कृतसाहित्य में प्रयोग अन्वेषणीय हैं । यदि इसे अव्यय मानना ही हो तो विभक्तिप्रतिरूपक माना जा सकता है, अथवा स्वरभेदार्थ यहां पाठ किया गया है । [६२] विहायसा ॥ १. आकाश—विहायसा पश्य विहङ्गराजम् (हेमचन्द्र) । विहायसा रम्यमितो विभाति (व्या० सि० सु०) । इस अव्यय के प्रयोग अन्वेषणीय हैं। संस्कृत में आकाश- वाचक तथा पक्षिवाचक सकारान्त विहायस् शब्द बहुत प्रसिद्ध है—विहायः शकुनौ पुंसि, गगने पुन्नपुंसकम्—इति मेदिनी । [६३] दोषा ॥ १. रात्रि— दोषापि नूनंमहिमांशुमसौ किलेति (माघ० ४.४६), रात्रि के समय भी वह (चन्द्र) सूर्य है ऐसा समझ कर । दोषामन्यम् अहः (महाभाष्य), घने बादलों या धुन्ध के कारण अपने आप को रात्रि समझने वाला दिन । यहां 'दोषा' के अव्यय होने से खित्यननव्ययस्य (८०६) से ह्रस्व नहीं होता । नोट—'दोषा' यह रात्रिवाचक आकारान्त स्त्रीलिङ्ग भी प्रयोग में देखा जाता है। यथा—ततः कथाभिः समतीत्य दोषाम् (भट्टि० २२.२४) । [६४] मृषा* ॥ असत्य, झूठ, मिथ्या । अयं दरिद्रो भवितेति वेधसो लिपिं ललाटेऽर्थिजनस्य जाग्रतीम् । मृषा न चक्रेऽल्पितकल्पपादपः प्रणीय दारिद्र्यदरिद्रतां नलः । (नैषध० १.१५) । मृषा मिथ्या च वितथे—इत्यमरः । [६५] मिथ्या* ॥ १.झूठ असत्य—मिथ्यैव व्यसनं वदन्ति मृगयामोदृग्विनोदः कुतः (शाकुन्तल० २.५) । २. व्यर्थ, बेकार—ज्योतिषं जलदे मिथ्या, मिथ्या श्वासिनि वैद्यकम् । योगो बह्वशने मिथ्या, मिथ्याज्ञानं च मद्यपे (समयोचित०) । [६६] मुधा ॥ १. व्यर्थ में—रात्रिः सैव पुनः स एव दिवसो मत्वा मुधा जन्तवः (वैराग्य० ४४)।

५२८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् सीतया रामचन्द्रस्य गले कमलमालिका । मुधा मुधा भ्रमन्त्यत्र प्रत्यक्षेपि प्रियापदे (सुभाषित०) । ‘प्रत्यक्षेपि’ इति कर्मणि लुङ्प्रयोग । [६७] पुरा* ॥ १ प्राचीन समय मे, व्यतीतकाल मे—पुरा कवीनां गणनाप्रसङ्गे कनिष्ठि- काधिष्ठितकालिदास । अद्यापि तत्तुत्यकवेरभावाद् अनामिका सार्थवती बभूव (सुभा- पित०) । पुरा सरसि मानसे विकचतारसालिखलत्-परागसुरभीकृते पयसि यस्य यात वयः । स पल्वलजलेऽधुना मिलदनेकभेकाकुले, मरालकुलनायक, कथय रे कथं धर्त्तताम् (भामिनी० १ २) । २ प्रबन्ध (क्रियासातत्य) मे—उपाध्यायेन स्म पुराधीयते (गणरत्न०) उपाध्याय ने निरन्तर पाठ किया । ३ निकट भविष्य मे—आलोके ते निपतति पुरा सा बलिव्याकुला वा (मेघ०२ २२), बलिकर्म मे लगी हुई शीघ्र ही वह तेरी दृष्टि मे आएगी। पुरा सप्तद्वीपा जयति वसुधामप्रतिरथः (शाकुन्तल० ७ ३३), आगे निकट भविष्य मे यह (सर्वदमन) अप्रतिम योद्धा बन कर सप्तद्वीपा सम्पूर्ण पृथ्वी को विजय करेगा। इस अर्थ मे 'पुरा' के योग मे यावत्पुरानिपातयोर्लट् (३ ३ ४) मे भविष्यत्काल मे भी लट् का प्रयोग होता है । [६८] मिथो ॥ १ एकान्त । २ परम्पर—मन्त्रयन्ते मिथो (शब्दकौस्तुभ) । नोट—इस अव्यय के प्रयोग अन्वेषणीय हैं । कुछ लोग 'मिथो+अत्र, मिथो +इति, इत्यादियो मे ओत् (५६) सूत्रद्वारा प्रगृह्यसञ्ज्ञा कर प्रकृतिभाव करते है । परन्तु इस प्रकार मानने से इस का पाठ चादियों मे करना होगा अन्यथा चादयोऽसत्त्वे (५३) से निपातसञ्ज्ञा न हो सकेगी । [६६] मिथस्* ॥ मिथोऽन्योन्यं रहस्यपि--इत्यमर । १ परस्पर—तन्मिथः सवर्णसञ् स्यात् (लघुसिद्धान्तकौमुदी १० सूत्र पर) । कामान् माता पिता चैनं यदुत्पादयतो मिथ (मनु० २ १४७) । २ एकान्त—रत्नाकर वीक्ष्य मिथः स जाया रामाभिधानो हरिरित्युवाच (रघु० १३ १), मिथ = रहसि । भर्तुः प्रसादं प्रतिनन्द्य मूर्ध्ना यवस्तुं मिथ प्राक्रमतैवमेनम् (कुमार० ३ २) । [७०] प्रायस् * ॥ १ बहुधा, अक्सर, बहुत बार—प्रायो भृत्यास्त्यजन्ति प्रस्खलितविभव स्वामिन सेवमाना (मुद्रा० ४ २२) । प्रायो गच्छति यत्र भाग्यरहितस्तत्रैव यान्त्यापद. (नीति० ८४) । २ सम्भवन —तन्न प्राज्ञ प्रसादादिह प्रायः प्राप्स्यामि जीवितम् (महाभारत०) नोट—इसी अर्थ मे घञन्त पुल्लिङ्ग 'प्राय' शब्द का भी बहुत प्रयोग देखा जाता है । यथा—मृतप्रायो गर्दभ , शालिप्राया भूमिः, कष्टप्राय शरीरम् । पूर्ण अर्थ मे भी इस घञन्त का प्रयोग देखा जाता है--अमृतप्राय वचनम् । प्रायोपवेशनम्=अन्ना- दित्यागपूर्वक मृत्यु के लिये बैठ जाना, मरणव्रत रखना ।

अव्यय-प्रकरणम् ५२६ [७१] मुहुस्* ।। १. पुनः पुनः, वार वार—ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने दत्तदृष्टिः (शाकुन्तल० १.७) । मुहुर्लक्ष्योद्भूदा मुहुरधिगमाभावगहना । मुहुः संपूर्णाङ्गी मुहु- रतिकृशा कार्यवशतः । मुहुर्भ्रश्यद्वीजा मुहरपि बहुप्रापितफलेत्यहो चित्राकारा नियतिरिव नीतिर्नयविदः (मुद्रा० ५.३) । मुहुर्मुहुः=वार वार—मुहुर्मुहुर्वारि पिवेदभूरि (सुभाषित) । [७२-७३] प्रवाहुकम् । प्रवाहिका ।। १. समानकाल, उसी समय । २. ऊर्ध्व । प्रवाहुकं गृह्णीयात् (गणरत्न०) । नोट—कई गणपाठों में 'प्रवाहुकम्' के स्थान पर 'प्रवाहिका' पाठ पाया जाता है । इन अव्ययों के प्रयोग अन्वेषणीय हैं । किसी कोष में इन का उल्लेख नहीं । ग्रहणीरोगवाची 'प्रवाहिका' शब्द टावन्त होता है । स्वामी दयानन्दसरस्वती ने 'प्रवाहुकम्' पाठ मान कर उस का 'प्रावल्य' अर्थ किया है । इस अर्थ में 'प्रवाहुक्' शब्द तो काठकसंहिता में देखा जाता है—देवा वा असुरान् यज्ञमभिजित्य ते प्रवाहुग्- ग्रहान् गृह्णाना आयन् (काठकसंहिता २६.६) । सम्भव है कि इस शब्द का किसी लुप्तशाखा में उल्लेख हो । [७४] आर्यहलम् ।। १. बलपूर्वक, जबरदस्ती—आर्यहलं गृह्णाति (गणरत्न०) । नोट—इस अव्यय के प्रयोग अन्वेषणीय हैं । [७५] अभीक्ष्णम्* ।। १. निरन्तर, वार वार, पुनः पुनः—क्षते प्रहारा निपतन्त्यभीक्ष्णम् (पञ्च० २.१६२) । [७६] साकम्* ।। १. के साथ—आस्स्व साकं मया सौधे माधिष्ठा निर्जनं वनम् (भट्टि० ८.७६) । साकं ग्रावगणैर्लुठन्ति मणयो बालार्कबिम्बोपमाः (भामिनी० १.४०) । नोट—साकम्, सार्धम्, समम्, सह आदि सहार्थक अव्ययों के योग में अप्रधान में सहयुक्तेऽप्रधाने (२.३.१६) द्वारा तृतीया विभक्ति का विधान है। [७७] सार्धम्* ।। १. के साथ—नाश्नीयाद् भार्यया सार्धं नैनामीक्षेत चाश्नतीम् (मनु० ४.४३)। वनं मया सार्धमसि प्रपन्नः (रघु० १४.६३) । [७८] नमस्* ।। १. नमस्कार—नमस्तत्कर्मभ्यो विधिरपि न येभ्यः प्रभवति (नीति० ६१) । येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः । तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः (पाणिनीयशिक्षा ५८) । नोट—इस अव्यय के योग में नमःस्वस्तिस्वाहा० (८६८) सूत्र द्वारा चतुर्थी विभक्ति का विधान है । इस अव्यय के 'अन्न, वज्र' आदि अन्य अनेक अर्थ भी वेद में प्रसिद्ध हैं । ल० प्र० (३४)

५३० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [७९] हिरुक् ॥ पृथग्विनानन्तरेणर्तेहिरुङ्नाना च वर्जने—इत्यमरः । १ विना, बगैर—हिरुक् कर्म न मोक्षः स्यात् (व्या० च०), बिना कर्म के मोक्ष दुर्लभ है। २ समीप—पर्यन्त- स्य हिरुङ् नदी (व्या० च०), पर्वत के समीप नदी है। ३ तिरोहित—य ईं ददर्श हिरुगिन्नु तस्मान् (ऋ० १।१६४।३२) । नोट—यह अव्यय प्रायः वैदिकसाहित्य मे उपलब्ध होता है। [८०] धिक्* ॥ १ धिक्कार— धिक् तां च तं च मदनं च इमाञ्च मांञ्च (नीति० २) । रामं सीतां लक्ष्मणं जीविकार्थं विक्रीणीते यो नरस्तञ्च धिग् धिक् । अस्मिन् पद्ये योऽपशब्दं न वेत्ति व्यर्थप्रज्ञं पण्डितं तञ्च धिग्धिक् (सुभाषित०) ।१ नोट—इस अव्यय के योग में उभसर्वतसोः कार्या० (वा०) द्वारा द्वितीया का विधान है। [८१] अथ* ॥ १ आरम्भ अर्थ मे—अथ शब्दानुशासनम् (अष्टाध्याय्या आदौ)। अथ योगा- नुशासनम् (योगदर्शन १।१)। २ अनन्तर अर्थ मे—अथ प्रजानामधिपः प्रभाते जाया- प्रतिग्राहितगन्धमाल्याम् । वनाय पीतप्रतिबद्धवत्सां यशोधनो धेनुमृषेर्मुमोच (रघु० २।१), अथ = निशानयनानन्तरमित्यर्थः । अथातो ब्रह्मजिज्ञासा (वेदान्तसूत्र १।१।१), अथ = साधनचतुष्टयानन्तरमित्यर्थः । ३ विकल्प अर्थ म— शब्दो नित्योऽथानित्यः (गणरत्न०), शब्द नित्य है या अनित्य ? । ४ प्रश्न या प्रश्नावतरण मे (यह बताइये —इस अर्थ मे)—अथ सा तत्रभवती किमाख्यस्य राजर्षेः पत्नी (शाकुन्तल० ७), अच्छा तो यह बताइये कि वह आदरणीया किस राजर्षि की पत्नी है ? । न चेन्मुनि- कुमारोऽयम् अथ कोऽस्य व्यपदेशः ? (शाकुन्तल० ७), यदि यह मुनिकुमार नहीं तो इस का कुल क्या है ? । अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः (गीता० ३।३६), तो यह पुरुष किस से प्रयुक्त हुआ पापाचरण करता है ? । ५ समुच्चय मे—गणितमथ कलां वैशिकीम् (मृच्छ० २।३), गणित तथा वेश्यागृहसम्बन्धी कला को। मातृष्वसा मातुलानी श्वश्रूरथ पितृष्वसा । सम्पूज्या गुरुपत्नीवत् समास्ता गुरुभार्यया (मनु० २।१३१) । ६ यदि, अगर (पक्षान्तर) अर्थ मे—अथ चेत् त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि (गीता० २।३३), यदि तुम इस धार्मिक संग्राम को नहीं करोगे । अथ मर- णमवश्यमेव जन्तोः किमिति मुधा मलिनं यशः क्रियेत (हितोप० ३।१४१), यदि मृत्यु अवश्य होनी ही है तो व्यर्थ में अपना यश क्या कलङ्कित किया जाये ? । ७ मङ्गल— इस अर्थ का विवेचन चादिगणप्रोक्त 'अथ' निपात पर देखें । [८२] अम् ॥ १ शीघ्र, २ अल्प । इस के प्रयोग अन्वेषणीय हैं । १. यत्र इवे प्रतिकृतौ (१२३४) इति विहितस्य कन् जीविकार्थे चापण्ये (५।३।६६) इति लुपोऽभावाद् 'रामकम्, सीतिकाम्, लक्ष्मणकम्' इत्येव प्रयोगाः साधवः ।

अव्यय-प्रकरणम् ५३१ नोट—वर्त्तमान उपलब्ध लौकिक वा वैदिकसाहित्य में हमें यह अव्यय कहीं नहीं मिला। दीक्षित आदि इसे प्रत्यय मानते हैं। उन का कथन है कि अमुं च च्छ- न्दसि (५.४.१२) सूत्र से विहित अम्प्रत्ययान्त की अव्ययसंज्ञा होती है। उदाहरण यथा—प्र तं नय प्रतरं वस्यसः (यजु० १२.२६) । परन्तु चाहे यहां 'अम्' से प्रत्यय भी समझ लें तो भी तद्धितश्चाऽसर्वविभक्तिः (३६८) से ही इस के अव्ययसंज्ञक हो जाने से यहां ग्रहण व्यर्थ सा प्रतीत होता है। [८३] आम् ॥ १. स्वीकृति या स्मृति द्वारा 'जी हां' के अर्थ में—आम् ! ज्ञातम् (शाकुन्तल० ३) । नोट—कई वैयाकरण यहां भी पूर्ववत् किमेत्तिङव्ययघादास्वद्रव्यप्रकर्षे (५.४.११) आदि सूत्रों से विहित आम्प्रत्ययान्तों की अव्ययसंज्ञा मानते हैं। [८४] प्रताम् ॥ १. ग्लानि—इस के उदाहरण अन्वेष्टव्य हैं। नोट—'प्रताम्' शब्द प्रपूर्वक तम् (तमूँ काङ्क्षायाम्) धातु से क्विप् प्रत्यय कर उपधादीर्घ (७२७) करने से निष्पन्न होता है। यहां सुब्लुक् हो जाने पर मो नो धातोः (२७०) से इस के मकार को नकार नहीं होता क्योंकि यदि ऐसा करना होता तो आचार्य इस गण में प्रशान् (प्रतान्) शब्दों को नकारान्त निर्दिष्ट न करते । [८५] प्रशान् ॥ १. तुल्य, सदृश, समान—प्रशान् देवदत्तो यज्ञदत्तेन (गणरत्न०) । नोट—इस के प्रयोग अन्वेषणीय हैं। कई वैयाकरण 'प्रशान्' के स्थान पर 'प्रशाम्' पाठ मानते हैं। कुछ अन्य लोग यहां 'प्रतान्' शब्द को भी पढ़ते हैं। [८६] मा* ॥ १. निषेध (मत) अर्थ में—मा जानीत विदर्भजामविदुषीम् (नैषध० १५.८६)। मा ब्रूहि दीनं वचः(नीति० ५१)। माऽसमीक्ष्य परं स्थानं पूर्वमायतनं त्यजेत् (हितोप० १.१०२) । मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि(गीता० २.४७)। २. 'ऐसा न हो' इस अर्थ में— मा कश्चिन्ममाप्यनर्थो भवेत् (पञ्च० ५), ऐसा न हो कि मुझ पर भी कोई अनर्थ आ पड़े। लघु एनां परित्रायस्व मा कस्यापि तपस्विनो हस्ते पतिष्यति (शाकुन्तल० २), शीघ्र ही इसे बचाइये ऐसा न हो कि यह किसी तपस्वी के हाथ में पड़ जाये । ३. धिक्कार—मा जीवन् यः परावज्ञादुःखदग्धोऽपि जीवति (माघ० २.४५), धिक्कार है उस के जीवन पर जो शत्रुओं से तिरस्कृत हुआ भी जीता है। नोट—कुछ वैयाकरण इस अव्यय को नहीं मानते केवल अग्रिम 'माङ्' को ही स्वीकार करते हैं। इस विषय का स्पष्टीकरण इस व्याख्या के द्वितीय-भागस्थ माङि लुङ् (४३५) सूत्र पर देखें। [८७] माङ्* ॥ १. मत—पापे रतिं मा कृथाः (भागवत० २.७७), पाप में प्रेम मत कर।

५३२ भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् 'स्म' के साथ इस के प्रयोग बहुत प्रसिद्ध हैं—क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते (गीता० २।३) । माङि लुङ् (४३५) तथा स्मोत्तरे लङ् च (४३६) सूत्रों द्वारा केवल माङ् के योग मे लुङ् तथा स्म के साथ लँङ् लुङ् का विधान है। न माङ्योगे (४४१) स अट् आट् के आगम नही होते ।¹ आकृतिगणोऽयम् ॥ यह स्वरादिगण आकृतिगण है अर्थात् स्वरादिशब्द केवल इतने ही नही जितने परिगणिन किये गये हैं, अपितु इन के अतिरिक्त अन्य जिन शब्दो मे अव्ययकार्य पाया जाये उन को भी इस गण मे सम्मिलित कर लेना चाहिये । आकृतिगण का स्पष्टीकरण पीछे (३६) सूत्र पर कर चुके हैं। स्वरादिगण मे गिनने योग्य कुछ अन्य शब्द यथा— (१) समम्* = के साथ । दुर्जनेन समं सख्यं प्रीतिञ्चापि न कारयेत् । उष्णो दहति चाङ्गारः शीतः कृष्णायते करम् (हितोप० १।८०) । इस के योग मे तृतीया विभक्ति होती है—सहयुक्तेऽप्रधाने (२।३।१९) । (२) सत्रा* = साथ । सत्रा पुत्रकलत्रमित्रनिवहे (रामचरितम्० २।६४) । पूर्ववत् तृतीया । (३) झटिति* = शीघ्र । झटिति पराशयवेदिनो हि विज्ञाः (नैषध० ) । (४) तरसा* = शीघ्र । तरसा तां समुत्पाट्य चिक्षेप बलवद्वली (रामायण० ५।४४।११) । तृतीयान्त 'तरस्' से काम चल सकता है, इसे अव्यय मानना अनावश्यक है। (५) द्राक्* = शीघ्र । द्राग्विद्रुतं कातरैः (गणरत्न०), कायर शीघ्र भाग गये । (६) अञ्जसा = शीघ्र । स गच्छत्यञ्जसा विप्रो ब्रह्मणः सद्म शाश्वतम् (मनु० २।२४) । (७) मङ्क्षु = शीघ्र । मङ्क्षूदपाति परितः पटलैरलौनाम् (माघ० ५।३७), भौरों के समूह चारों तरफ झटपट उड़ गये । (८) सपदि* = शीघ्र, तत्क्षण । सपदि कुमुदिनीभिमीलितम् (माघ० ११.२४) । (६) भूयस्* = पुनः, फिर । भूयः स भूतेश्वरपार्श्ववर्ती किञ्चिद्विहस्यार्थपतिं बभाषे (रघु० २।४६) । अत्यधिक, बार बार । भूयोऽपि सिक्तं पयसा घृतेन न निम्ब- वृक्षो मधुरत्वमेति (सुभाषित०) । (१०) कामम्* = भले ही । कामं धीरस्वभावेयं स्त्रीस्वभावस्तु कातरः (स्वप्न० ४।८) । मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं नैव गच्छति (हितोप० १।१३३) । निश्चय ही । कामं व्यसनवृक्षस्य मूलं दुर्जनसंगतिः (कथासरित्०) । कामम् = निश्चय ही । (११) संवत्* (सर्वेंवत्) = वर्ष, विशेषतः विक्रमसंवत् । 'संवत्सर' का संक्षेप है । १. मा निषाद ! प्रतिष्ठां त्वम् अगमः शाश्वतीः समाः । यत्क्रौञ्चमिथुनादेकम् अवधीः काम-मोहितम् ॥ (रामायण० १।२।१५) यहां 'अगम' मे अट् आगम आर्ष समझना चाहिये । अथवा यहां माङ् का प्रयोग न हो कर पूर्वोक्त 'मा' का प्रयोग ही समझा जा सकता है ।

अव्यय-प्रकरणम् ५३३

(१२) वदि* = कृष्णपक्ष । 'बहुलदिवस' का संक्षेप है । 'वदि' भी लिखते हैं । (१३) शुदि* = शुक्लपक्ष । 'शुक्ल-दिवस' का संक्षेप है । 'सुदि' भी होता है । (१४) साक्षात्* = प्रत्यक्ष, सामने उपस्थित । मृगानुसारिणं साक्षात् पश्यामीव पिनाकिनम् (शाकुन्तल० १.६) । साक्षात्कृतधर्माण ऋषयो बभूवुः (निरुक्त १) । (१५) साचि = टेढ़ा । साचि लोचनयुगं नमयन्ती (किरात० ६.४४) । (१६) अजस्रम्* = निरन्तर । पश्चात्पुच्छं वहति विपुलं तच्च धूनोत्यजस्रम् (उत्तरराम० ४.२६) । (१७) अनिशम्* = निरन्तर । तपति तनुगात्रि मदनस्त्वामनिशं मां पुनर्दहत्येव (शाकुन्तल० ३.१४) । (१८) वरम्* = अच्छा, अपेक्षाकृत अच्छा । वरमद्य कपोतः श्वोमयूरात् (लोकोक्ति) । याच्ञा मोघा वरमधिगुणे नाऽधमे लब्धकामा (मेघ० ६) । वरं भिक्षा- शित्वं न च परधनाऽऽस्वादनसुखम् (हितोप० १.१३७) । (१९) स्थाने* = उचित, ठीक, योग्य । स्थाने भवानेकनराधिपः सन्नकिञ्चनत्वं मखजं व्यनक्ति (रघु० ५.१६) । (२०) कृतम्* = 'अलम्' के अर्थ में, बस, निषेध, रोकना । अथवा कृतं सन्देहेन (शाकुन्तल० १), अथवा अब सन्देह नहीं करना चाहिये । प्रत्युवाच तमृषिर्निशम्यतां सारतोऽयमथवा गिरा कृतम् (रघु० ११.४१) । इस के योग में तृतीया का प्रयोग होता है । (२१) प्रादुस्* = प्रकट, उत्पन्न । ज्यानिनादमथ गृह्णती तयोः प्रादुरास बहुल- क्षपाच्छविः (रघु० ११.१५), राम-लक्ष्मण के धनुष की टंकार को सुनती हुई कृष्णपक्ष की रात्रि के समान वर्ण वाली ताड़का प्रकट हुई । इस का प्रयोग प्रायः भू, कृ, अस् धातुओं के साथ ही मिलता है । (२२) आविस्* = प्रकट । तमस्तपति घर्मांशौ कथमाविर्भविष्यति (शाकुन्तल० ५.१४), सूर्य के चमकते हुए अन्धेरा कैसे प्रकट होगा? तेषामाविरभूद् ब्रह्मा परिम्लान- मुखश्रियाम् (कुमार० २.२) । (२३) प्रकामम्* = यथेच्छ, बहुत । प्रकाममभ्यस्यतु नाम विद्यां सौजन्यमभ्यास- वशादलभ्यम् (सुभाषित) । जातो ममायं विशदः प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा (शाकुन्तल० ४.२२) । अनव्यय 'प्रकाम' शब्द भी बहुधा प्रयुक्त होता है—न प्रकाम- भुजः श्राद्धे स्वधासंग्रहतत्पराः (रघु० १.६६) । (२४) उषा = रात्रि का अन्त, भोर वेला, प्रातः काल । उषा रात्रेरवसाने— इत्यमरः । उषा स्याद्रजनीशेषे 'उषः' इत्यपि दृश्यते—इति रभसः । इस के प्रयोग अन्वेष्टव्य हैं । सुप्रसिद्ध 'उषस्' शब्द सकारान्त स्त्रीलिङ्ग है—उषाः, उषसौ, उषसः । (२५) ओम्* = स्वीकार करना । द्वितीयश्चेद् ओमिति ब्रूमः (साहित्यदर्पण० १) । ओमित्युक्तवतोऽथ शार्ङ्गिणः (माघ० १.७५) । ओमित्युच्यताममात्यः (मालती० ६), मन्त्री को कह दो कि हमें स्वीकार है । 'ओम्' यह परब्रह्म का वाचक भी है—

५३४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम्

सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपांसि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं सङ्ग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् (कठोप० २.१५) । (२६) अवश्यम्* = जरूर, अवश्य । अवश्यं यातारश्चिरतरमुषित्वाऽपि विषयाः (वैराग्य० १२) । समास में कृत्यप्रत्ययान्त शब्द के परे होने पर 'अवश्यम्' के मकार का लोप हो जाना है—तुम्पेदवश्यमः कृत्ये (वा०) । यथा—अवश्यपाच्यम्, अवश्य- लाव्यम्, अवश्यस्तुत्यः । (२७) सम्प्रति* = अब । सम्प्रति मित्रलाभः प्रस्तूयते यस्यायमाद्य श्लोकः (हितोप० १) । (२८) साम्प्रतम्* = अब, आजकल । धनं साम्प्रतं वन्द्यमास्ते न विद्या (कस्य- चित्) । उचित, युक्त, मुनासिब— हन्त स्थानं क्रोधस्य साम्प्रतं देव्याः (वेणीसंहार० १) । युक्ते द्वे साम्प्रतं स्थाने—इत्यमरः । (२९) सुष्ठु* = अच्छा, ठीक, युक्त । अथवा सुष्ठु खल्विदमुच्यते । सुष्ठूक्तं त्वया । बहुत अच्छी तरह – सुष्ठु शोभसे आर्यपुत्र एतेन विनयमाहात्म्येन (उत्तरराम० १) । इस का स्वरभेदार्थ चादियों में भी परिगणन किया गया है । (३०) दुष्ठु = बुरा । यन्न मां दुष्ठु मन्यसे (बुद्धचरित० ४.८४) । निन्दायां दुष्ठु सुष्ठु प्रशंसने—इत्यमरः । (३१) मिथु या मिथुर् (?) = दोनों, परस्पर । ब्रह्मादयस्तनुभृतो मिथुरर्द्य- मानाः (भागवत० ११.६.१४) । (३२) असाम्प्रतम्* = अयुक्त । विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुमसांप्रतम् (कुमार० २.५५) । (३३) कु* = कुत्सित, बुरा । कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति (देवी- क्षमा० १) । थोड़ा, अल्प— सुपूरा स्यात् कुनदिका (पञ्च० १.२६) । पृथिवीवाचक 'कु' अव्यय नहीं है उवागन्त स्त्रीलिङ्ग है— गोत्रा कुः पृथिवी पृथ्वी क्ष्मावनिर्मेदिनी मही—इत्यमरः । कौ मोदन इति कुमुदम् । (३४) सु* = अच्छा, अच्छी तरह । सुजीर्णमन्नं सुविचक्षणः सुतः सुशासिता स्त्री नृपतिः सुसेवितः । सुचिन्त्य चोक्तं सुविचार्य यत्कृतं सुदीर्घकालेऽपि न याति विक्रि- याम् (हितोप० १.२२) । (३५) चिरेण* = चिर काल बाद । कियच्चिरेण आर्यपुत्रः प्रतिपत्तिं दास्यति (शाकुन्तल० ६), कितने चिर बाद आर्यपुत्र सन्देश भेजेंगे ? । चिरेण संज्ञां प्रतिलभ्य भूयो विचिन्तयामास विशालनेत्रा (रामायण० सुन्दर० ३२.८), बहुत काल के बाद होश में आकर वह विशालाक्षी पुनः सोचने लगी। नचिरेण, अचिरेण = शीघ्र । 'न' अव्यय के साथ सुप्त्सुपा-समास हो कर 'नचिरेण' तथा 'नञ्' अव्यय के साथ नञ्तत्पुरुषसमास होकर 'अचिरेण' बनता है । योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति (गीता० ५.६) । अचि- रेणैव सीदति (मनु० ७.१३४) । (३६) चिराय* = चिर काल तक, देर तक । प्रीतोऽस्मि ते सौम्य चिराय जीव

अव्यय-प्रकरणम् ५३५ (रघु० १४.५६) । काकोऽपि जीवति चिराय बलिञ्च भुङ्क्ते (पञ्च० १.२५) । (३७) चिररात्राय = चिरकाल के लिये । प्रतियाते महारण्यं चिररात्राय राघवे । बभूव नगरे मूर्च्छा बलमूर्च्छार्जुनस्य च (रामायण० २.४०.१८), राम के चिरकाल के लिये वन को चले जाने पर नगर में मूर्छा छा गई । (३८) चिरात्* = बहुत काल के बाद । भो भगिनीसुत ! किमिति चिराद् दृष्टोऽसि (पञ्च० ४), हे भान्जे ! क्या कारण है बहुत काल के बाद दिखाई दिये हो ? । चिर तक, बहुत काल तक—तदक्षयं महत् दुःखं नोत्सहे सहितुं चिरात् (रामा- यण० २.२०.४६), मैं उस अक्षय महान् दुःख को बहुत काल तक न सह सकूँगी । नचि- रात्-अचिरात् = शीघ्र । तेषामहं समुद्धर्त्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् (गीता० १२.७) । अचिरादुपकर्त्तुराचरेदयवाऽऽत्मौपयिकीमुपक्रि- याम् । पृथुरित्यमयाणुरस्तु सा न विशेषे विदुषामिह ग्रहः (नैषध० २.१४) । (३९) चिरस्य = चिरकाल के बाद । समानयंस्तुल्यगुणं वधूवरं चिरस्य वाच्यं न गतः प्रजापतिः (शाकुन्तल० ५.१५), तुल्य गुणों वाले वधू-वर का जोड़ा बनाते हुए आज चिरकाल के बाद प्रजापति निन्दा को प्राप्त नहीं हुआ । चिरस्य बत पश्यामि दूराद् भरतमागतम् (रामायण० २.१००.५) । (४०) चिरे = देर तक । चिरे कुर्यात् (शतपथब्रा०)। इस का लोक में प्रयोग बहुत कम होता है । इस प्रकार शिष्टग्रन्थों के प्रयोग से अन्य स्वरादि भी जानने चाहियें । स्वरादिनिपातमव्ययम् (३६७) सूत्र में निपातों की भी अव्ययसंज्ञा की गई है । निपातों का सम्पूर्ण वर्णन अष्टाध्यायी में प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) सूत्र के अधिकार में किया गया है । इस अधिकार के दो सूत्र चादयोऽसत्त्वे (५३) तथा प्रादयः (५४) पीछे अच्सन्धिप्रकरण में निर्दिष्ट किये जा चुके हैं । चादि तथा प्रादि गणों में पठित शब्द असत्त्व अर्थ में निपात होते हैं । इन में से प्रादिगण का निर्देश (३५) सूत्र पर पीछे किया जा चुका है अब चादिगण का परिगणन करते हैं । निपात होने से चादि अव्यय हैं—यह नहीं भूलना चाहिये ।१ १. चादिगण को यदि स्वरादिगण में सम्मिलित कर देते तो भी इस की अव्ययसंज्ञा सिद्ध हो सकती थी तो पुनः इस की निपातसंज्ञा का यह प्रयोजन है कि चादयो- ऽसत्त्वे (५३) सूत्र में 'असत्त्व' कथन के कारण द्रव्यवाचक चादियों की निपात- संज्ञा और उस के कारण अव्ययसंज्ञा न हो । यथा— 'पशु' शब्द चादिगण में पढ़ा गया है । 'पशु' शब्द के दो अर्थ होते हैं । एक—पशु = चौपाया, जानवर, दूसरा पशु = सम्यक्, अच्छी तरह । चौपाया अर्थ वाला 'पशु' शब्द द्रव्यवाचक होने से न निपातसंज्ञक होता है और न अव्यय- संज्ञक । यथा—पशुं पश्य (चौपाये को देखो), यहां अव्ययसंज्ञा न होने से पशु शब्द से परे द्वितीयाविभक्ति का लुक् (३७२) नहीं होता । पशु पश्य (ठीक

५३६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [१] च*॥ १ समुच्चय¹—अजरामरवत्प्राज्ञो विद्यामर्थञ्च चिन्तयेत् (हितोप० ३)। स शापो न तया राजन् न च सारथिना श्रुतः (रघु० १।७८)। २ अन्वाचय—भो भिक्षामट गाञ्चानय (गणरत्न०), भिक्षा के लिये घूमो और (यदि मार्ग में गौ मिल जाये तो) गाय को भी लेते आना। ३ इतरेतरयोग—तयोर्जगृहतुः पादान् राजा राज्ञी च मागधी। तौ गुरुर्गुरुपत्नी च प्रीत्या प्रतिननन्दतुः (रघु० १।५७)। ४ समा- हार—पाणी च पादौ च पाणिपादम् (गणरत्न०)। ५ परन्तु लेकिन—शान्तमिदमा- श्रमपदं स्फुरति च बाहुः कुतः फलमिहास्य (शाकुन्तल० १।१५)। यज्जातसूनूस्तूर्णां घर्माद्योन चाग्निम (हितोप० १३)। ६ तुल्ययोगिता (ज्यों ही त्यों ही)—ते च प्रापुरु- दन्वन्तं बुबुधे चादिपुरुषः (रघु० १०।६), ज्योंही वे क्षीरसागर पर पहुंचे त्योंही आदिपुरुष (विष्णु) जाग गये। ७ अवधारण (ही)—अतीत पन्थानं तव च महिमा वाङ्मनसयोः (गणरत्न०) हे देव ! यस्तव महिमा स वाङ्मनसयोः पन्थानमति- क्रान्त एव। कर्मक्षयाच्च निर्वाणम् (व्या० च०), कर्मों के क्षय से ही मोक्ष प्राप्त होता है। ८ यदि (अगर)—जीवेतु चेच्छसि मूढ हेतुं मे गदतः शृणु (महाभारत), हे मूढ ! यदि तुम जीना चाहते हो तो मुझ से कारण सुनो। ९ पादपूर्ति—भीमं पायस्तथैयुश्च (गणरत्न०)। [२] वा*॥ १ विकल्प—यवैर्वा व्रीहिभिर्वा यजेत (सुप्रसिद्धा श्रुति)। २ अथवा, या— काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा (हितोप० १।१)। श्वशुरगृहनिवासः स्वर्गतुल्यो नराणां यदि भवति चिवेशी पञ्च वा षड् दिनानि (समयोचित०)²। ३ समुच्चय—अस्ति ते माता स्मरसि वा तातम् तरह न देखो), यहां 'पशु' शब्द द्रव्यवाचक नहीं अतः निपात होने से उस की अव्ययसंज्ञा हो कर सुँब्लुक् हो जाता है। इसीप्रकार लक्ष्मीवाचक 'मा' शब्द की अव्ययसंज्ञा नहीं होती, निषेधवाचक की ही होती है। अत्र यदि चादियों का पाठ स्वरादियों में ही होता और उन की निपात- संज्ञा न की जाती तो 'पशु पश्य' इत्यादि स्थलों की तरह 'पशु पश्य' इत्यादियों में भी अव्ययसंज्ञा हो जाने से अनिष्ट हो जाता जो अब नहीं होता। सार यह है कि—स्वरादियों में तो द्रव्यवाचक की भी अव्ययसंज्ञा हो जाती है, यथा— स्वं पश्य (स्वर्ग को देख)। परन्तु चादियों में द्रव्यवाचक की नहीं होती। किञ्च—निपाता आद्युदात्ता (फिट्सूत्र ८०) द्वारा आद्युदात्तस्वर भी निपात- संज्ञा का प्रयोजन है। १ समुच्चय, अन्वाचय, इतरेतरयोग, समाहार—शब्दों की विस्तृत व्याख्या इस व्याख्या के द्वन्द्वसमासप्रकरण में चार्थे द्वन्द्व (६८२) सूत्र पर देखें। २ इस श्लोक का उत्तरार्ध इस प्रकार है—दधि-मधु-घृतलोभान्मासमेकं वसेच्चेद् भवति विगतलज्जो मानवो मानहीनः। (मालिनी छन्द है)।

अव्यय-प्रकरणम् ५३७

(उत्तररामचरित ४) । ४. इव = सदृश —जातां मन्ये तुहिनमथितां पद्मिनीं वाऽन्य- रूपाम् (मेघ० २.२०), मैं मानता हूं कि वह मेरी प्रिया हिममर्दित कमलिनी की तरह विकृतरूप को प्राप्त हो गई है। हृष्टो गर्जति चातिदर्पितवलो दुर्याधनो वा शिखी (मृच्छ० ५.६), प्रसन्न एवम् अतिगर्वित वल वाले दुर्योधन के समान मोर गरज रहा है। ५. वाक्यालंकार—परिवर्त्तिनि संसारे मृतः को वा न जायते (पञ्च० १.२८) । [३] ह ॥ १. कहते हैं, सुनते हैं—इस प्रकार पिछली अतीत घटना को बताने में—तस्य ह शतं जाया बभूवुः (ऐतरेयब्रा०), कहते हैं कि उस की सौ स्त्रियां थीं। द्वया ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च (बृहदारण्यकोप० १.३.१), सुनते हैं कि देव और असुर दोनों प्रजापति की सन्तानें हैं। उपस्तिर्ह चाक्रायण इभ्यग्रामे प्रद्राणक उवास (छान्दो- ग्योप० १.१०.१), कहते हैं कि चक्र का गोत्रापत्य उपस्ति महावतों के ग्राम में दुर्गत ववस्था में रहता था। पादपूर्ति में—इति ह स्माहुराचार्याः (गणरत्न०) । नोट—इस का प्रयोग बहुधा वैदिक ब्राह्मणसाहित्य में देखा जाता है । [४] अह ॥ १. आचारातिक्रमण—स्वयमह ओदनं भुङ्क्त आचार्यं सक्तून् पाययति । स्व- यमह रथेन याति, उपाध्यायं पदाति गमयति (काशिका ८.२.१०४) । २. पूजा— वह माणवको भुङ्क्ते (गणरत्न०)। ३. विनियोग—त्वमह ग्रामं गच्छ। अयमहारण्यं गच्छतु (गणरत्न०) । [५] एव* ॥ १. अवधारण (ही)—सत्यमेव जयते नानृतम् (मुण्डकोप० ३.१.६) । कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः (गीता० ३.२०) । भवितव्यं भवत्येव नारिकेल- फलाम्बुवत् (सुभाषित०) । अयोष्मणा विरहितः पुरुषः स एव (पञ्च० ५.२६) । २. ज्यों ही, as soon as—उपस्थितेयं कल्याणी नाम्नि कीर्तित एव यत् (रघु० १.८७) । ३. की तरह—श्रोस्तवैव मेऽस्तु (गणरत्न०), तेरे समान मेरा धन हो । नोट—ध्यान रहे कि 'च' से लेकर 'एव' तक का प्रयोग पाद या वाक्य के आदि में नहीं होता। पादादौ न च वक्तव्याश्चादयः प्रायशो बुधैः (वाग्भटालङ्कार)। इसी तरह 'खलु' 'तु' आदि के विषय में भी जानना चाहिये । [६] एवम्* ॥ १. इस प्रकार, इस तरह, ऐसे—एवमुक्त्वार्जुनः संख्ये रथोपस्थ उपाविशत् । विसृज्य सशरं चापं शोकसंविनमानसः (गीता० १.४७) । तस्मादेवं विदित्वैनं नानु- शोचितुमर्हसि (गीता० २.२५) । यावदर्थपदां वाचमेवमादाय माधवः । विरराम मही- यांसः प्रकृत्या मितभाषिणः (माघ० २.१३) । [७] नूनम्* ॥ १. निश्चय से, सचमुच—नूनं हिते कविवरा विपरीतयोधा ये नित्यमाहुरबला इति कामिनीस्ताः । याभिर्विलोलतरतारकदृष्टिपातः शक्रादयोऽपि विजितास्त्वबलाः

५३८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् कय ता (शृङ्गार० १०) । क्षुद्रेऽपि नूनं शरणं प्रपन्ने ममत्वमुच्चैः शिरसां सतीव (कुमार० १.१२) । नूनं न दृष्टः कविनापि तेन दारिद्र्यदोषो गुणराशिनाशी¹ (सुभा- षितसुधा०) । तन्नूनं सा वानरी भविष्यति यतस्तस्यां अनुरागतः सकलमपि दिनं तत्र गमयसि (पञ्च० ४) । २ तर्क करना, अनुमान करना, ख्याल दौड़ाना—पूर्वं मया नूनमभीप्सितानि पापानि कर्माण्यसकृत्कृतानि । तत्रायमद्यापतितो विपाको दुःखेन दुःखं यदहं विशामि (रामायण० ३.६३.४)। वेद में इस अव्यय के 'अब, अभी, आज' आदि अन्य अर्थ भी होते हैं । [८] शश्वत्* ॥ १ नित्य, हमेशा, सदा, निरन्तर—जीवन्पुनः शश्वदुपप्लवेभ्यः प्रजाः प्रजानाथ पितेव पासि (रघु० २.४८) । क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति (गीता० ९.३१) । शश्वद्भवः शाश्वतः वैरम्, तत्र भव (१०८६) इत्यण् । अनित्योऽव्ययानां टिलोपः, बहिरुपष्टिलोपोवचनाज्ज्ञापकात् । २ पुनः पुनः, बार बार—उपदा विविशुः शश्वन्नोत्सेकाः कोसलेश्वरम् (रघु० ४.७०), कोसलेश्वर रघु को बार बार उपहार प्राप्त हुए परन्तु उन में गर्व उत्पन्न नहीं हुआ । ३ साथ-साथ, एक साथ—शश्वद् भुञ्जते (गणरत्न०) । शश्वत्ते मुनयस्तत्र तमसोन्वन्त योगिनम् (व्या० च०) ।² [६] युगपत्* ॥ १. एक साथ—युगपत्पतमानांश्च युगपच्च हतैर्भृशम् युगपत्पतितांश्चैव विशीर्णा वसुधाऽभवत् (रामायण० ३.२५.४१) । इस अव्यय का उल्लेख पीछे स्वरादियों में न० (११) पर हो चुका है । [१०] भूयस्* ॥ १ पुनः, फिर—गायन्ति देवा किल गीतकानि धन्या नरा भारतभूमिभागे । स्वर्गापवर्गास्पदमार्गभूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् (विष्णुपुराण २.३.२४) । भूयो- भूय = पुनः पुनः, बार बार—भूयोभूयो दर्शनेन यत्र यत्र धूमस्तत्र तत्राग्निरिति व्याप्ति १ अनन्तरत्नप्रभवस्य यस्य हिमं न सौभाग्यविलोपि जातम् । एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाङ्कः ॥ (कुमार० १.३) कालिदास की इस सुन्दर उक्ति पर किसी कवि की सुन्दर चुटकी यथा— एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोरिति यो बभाषे । नूनं न दृष्टः कविनापि तेन दारिद्र्यदोषो गुणराशिनाशी ॥ (सुभाषितसुधा०) २. 'ह' और 'शश्वत्' के योग में भूतानद्यतन परोक्ष काल में लिट् और लङ् दोनों का प्रयोग हो सकता है—हशश्वतोर्लङ् च (३.२.११६) । यथा—इति ह अक- रोत्, इति ह चकार । शश्वदकरोत्, शश्वच्चकार । यथा च भट्टिकाव्ये (६.१४३)— दैवं न विदधे नूनं युगपत्सुखमावयोः । शश्वद् बभूव तद्दुःखं यतो नाविति हाकरोत् ॥

अव्यय-प्रकरणम् ५३६ गृहीत्वा (तर्कसंग्रह) । भूयोभूयः शरान् घोरान् विससर्ज महामृधे (रामायण० ६.४५.१४) । २. अधिक—रामभद्र ! उच्यतां किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि (उत्तरराम० अन्ते) । इस अव्यय का वर्णन पीछे (पृष्ठ ५३२) स्वरादियों के आकृतिगणत्व के कारण परिगृहीत शब्दों में भी आ चुका है । [११] कूपत् ॥ १. प्रश्न या प्रशंसा में—कूपदयं गायति (गणरत्न०) । नोट—इस के प्रयोग अन्वेषणीय हैं । [१२] सूपत् ॥ १. प्रश्न या प्रशंसा में । इस का प्रयोग कहीं उपलब्ध नहीं हुआ । [१३] कुवित् ॥ १. बहुत—कुवित् सोमस्यापाम् (ऋ० १०.११६.१), मैं ने बहुत सोम पिया । नोट—इस के प्रयोग वैदिक साहित्य में बहुत हैं पर लोक में नहीं । [१४] नेत् ॥ १. ऐसा न हो—नेज्जिह्मायन्त्यो नरकं पताम (ऋ० खिलपाठ, ३.२२), ऐसा न हो कि कुटिल आचरण करती हुई हम नरक में पड़ जायें । नेच्छत्रुः प्राशं जयाति (अथर्व० २.२७.१), ऐसा न हो कि शत्रु हमारा भक्ष्य छीन ले । नोट—वेद में 'नेत्' का प्रयोग तो अनेक बार आया है परन्तु पदपाठकारों ने सर्वत्र 'न + इत्' ऐसा छेद ही माना है । अतः यह निपातसमुदाय है । [१५] चेत्* ॥ १. अगर, यदि—लोभश्चेदगुणेन किं पिशुनता यद्यस्ति किं पातकैः । सत्यं चेत्तपसा च किं शुचि मनो यद्यस्ति तीर्थेन किम् (नीति० ४४) । उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् (गीता० ३.२४) । अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्य- भाक् । साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः (गीता० ९.३०)। किमप्यहिंस्यस्तव चेन्मतोऽहं यशःशरीरे भव मे दयालुः (रघु० २.५७) । अथ चेत् (और अगर)—अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि । ततः स्वधर्मं कीर्तिञ्च हित्वा पापमवाप्स्यसि (गीता० २.३३) । नोट—इस अव्यय का प्रयोग वाक्य के आदि में नहीं होता । [१६] चण् ॥ १. यदि, अगर— इन्द्रश्च मृडयाति नः (नागेशद्वारा उद्धृत), इन्द्र यदि हमें सुखी करे । अयं च मरिष्यति (काशिका ८.१.३०), यदि यह मरेगा । नोट—इस निपात में णकार इत्संज्ञक है अतः उस का लोप हो कर 'च' ही अवशिष्ट रहता है । इस णित् 'च' निपात के योग में निपातैर्यद्-यदि-हन्त-कुविन्ने- च्चेच्चण्-कच्चिद्य-यत्र-युक्तम् (८.१.३०) सूत्र द्वारा तिङन्त को निघातस्वर का निषेध हो जाता है । समुच्चयाद्यर्थक पूर्वोक्त निरनुबन्ध 'च' से पृथक् रखने के लिये ही इसे णित् किया गया है । अतः पूर्वोक्त 'च' के योग में निघातस्वर का निषेध नहीं होता ।

५४० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [१७] यत्र* ॥ १ जिस स्थान या काल मे, जहा—प्रायो गच्छति यत्र भाग्यरहितस्तत्रैव यान्त्यापदः (नीति० ८४) । यत्र विद्वज्जनो नास्ति श्लाघ्यस्तत्राल्पधीपि । निरस्त- पादपे देशे एरण्डोऽपि द्रुमायते (हितोप० १.६६) । यत्राकृतिस्तत्र गुणा वसन्ति (सुभा- षित०) ।१ नोट—त्रल्प्रत्ययान्त होने से यद्यपि तद्धितश्चाऽसर्वविभक्ति (३६८) सूत्र द्वारा ही इस की अव्ययसञ्ज्ञा हो सकती है तथापि यहा चादयो मे पाठ निपातसञ्ज्ञा के लिये है । निपातसञ्ज्ञा का प्रयोजन निपातैर्यद्यदिहन्त० (८.१ ३०) सूत्र से निघातस्वर का प्रतिषेध करना है । [१८] कच्चित्* ॥ १ इष्ट बात के पूछने मे—आयस्ते विपुलः कच्चित् कच्चिदल्पतरो व्ययः । अपात्रेषु न ते कच्चित् कोशो गच्छति राघव (रामायण० २.१०० ५४), राम भरत से पूछते हैं—हे राघव (भरत) क्या तुम्हारा खर्च तुम्हारी आमदनी से कम तो है ? क्या तेरा धन कही कुपात्रो पर तो खर्च नही हो रहा ? । कच्चित् स्वादु कृतं भोज्य- मेको नाश्नासि राघव । कच्चिदाशासमानेभ्यो मित्रेभ्यः सम्प्रयच्छसि (रामायण० २.१००.७५), हे भरत ! क्या तुम स्वादिष्ट भोज्य वस्तु इच्छुक मित्रो को दिये बिना अकेले तो नही खा जाते ? । आपाद्यते न व्ययमन्तरायैः कच्चिन्महर्षे स्त्रिविधं तपस्तत् (रघु० ५ ५), महर्षि का त्रिविध तप कहीं विघ्नो से नष्ट तो नही हो रहा ? [१९] नह ॥ १. प्रत्यारम्भ=निश्चितनिषेध—नह भोक्ष्यसे (गणरत्न०), तू नही खायेगा (न खा) । चोदितस्यावधीरणा उपालिप्सया प्रतिषेधयुक्त आरम्भः प्रत्यारम्भः (काशिका ८.१.३१) । २. निषेधमात्र— नह वै तस्मिंश्च लोके दक्षिणामिच्छन्ति (अनुपलब्ध- मूल काशिकाया प्रत्युदाहरणम्) । दिप्सन्त इद् रिपवो नह देभुः (ऋ० १.१४७ ३), शत्रु धोखा देना चाहते थे पर दे न सके । नोट—यह निपात 'न+ह' इन दो निपातो के समुदाय से बना है । [२०] हन्त* ॥ १ हर्ष प्रकट करना—हन्त भो. शकुन्तलां पतिकुल विसृज्य लब्धमिदानीं स्वा- स्थ्यम् (शाकुन्तल० ४) । हन्त प्रवृत्तं संगीतकम् (मालविका० १) । २. अनुकम्पा— हा हन्त ! हन्त ! नलिनीं गज उज्जहार (सुभाषित०) । ३. वाक्यारम्भ मे—हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः (गीता० १०.१६) । ४ विषाद मे—काचमूल्येन विक्रीतो हन्त चिन्तामणिर्मया (सुभाषित०) । हन्त हर्षेऽनुकम्पायां वाक्यारम्भविषादयोः —इत्यमरः । [२१] माकिर् ॥ १. मत (मत कोई)—माकिर्नो दुरिताय धायीः (ऋ० १.१४७ ५) । मा- १. यत्र—अनवक्लृप्यमर्षगर्हाऽऽश्चर्येषु । नाऽवक्लृपयामि, न मर्षये, गर्हे, आश्चर्यं वा, यत्र भवान् वृषलं याजयेत्—इति तत्त्वबोधिनी ।

अव्यय-प्रकरणम् ५४१ किस्तोक्स्य नो रिषत (ऋ० ८.६७.११)। शाकटायन इसे सान्त मानते हैं। [२२] माकीम् ॥ १. मत (मत कोई)—माकिर्नेश्नन्माकीँ रिषन्माकीँ संशारि केवटे (ऋ० ६.५४.७)। गण में 'माकिम्' पाठ अपपाठ है। [२३] नकिर् ॥ १. न कोई—सत्यमद्धा नकिरन्यस्त्वोवान् (ऋ० १.५२.१३), सचमुच तेरे जैसा अन्य कोई नहीं है। नकिर् वक्ता ना दादिति (ऋ० ८.३२.१५), कोई यह कहने वाला नहीं है कि इन्द्र नहीं देता। नकिस्तं घ्नन्त्यन्तितो न दूरात् (ऋ० २.२७.१३), उसे कोई भी न तो समीप से मार सकता है और न दूर से। [२४] नकीम् ॥ १. न कोई—नकीम् इन्द्रो निकर्तवे (ऋ० ८.७८.५), कोई इन्द्र का तिर- स्कार नहीं कर सकता। इस गण में उपलभ्यमान 'नकिम्' पाठ अपपाठ है। नोट—माकिर् आदि चारों निपात वेद में ही उपलब्ध होते हैं। [२५] माङ्* ॥ १. निषेध (मत)—धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः। तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतो वधीत् (मनु० ८.१५)। नोट—अनुबन्ध ङकार का लोप हो कर 'माङ्' का 'मा' ही अवशिष्ट रहता है। ध्यान रहे कि इस का स्वरादियों में भी पाठ किया गया है। नागेशभट्ट के विचार में इस का स्वरादियों में पाठ व्यर्थ है; क्योंकि वहां पढ़ने से स्वर (अन्तोदात्त) में तो कोई अन्तर आता ही नहीं, उल्टा यहां पढ़ने के कारण लक्ष्मीवाची 'मा' शब्द की अव्ययसंज्ञा नहीं होती—जो न करनी ही अभीष्ट है। विशेष विचार सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्याओं में देखें। [२६] नञ्* ॥ १. नहीं—न हि सुशिक्षितोऽपि वटुः स्वस्कन्धमारोढुं पटुः (भुवनेश०)। नोट—इस का स्वरादियों में विवेचन कर चुके हैं। नागेशभट्ट के अनुसार इस का भी स्वरादियों में पाठ अप्रामाणिक है। [२७] यावत्* ॥ १. अवधि (पर्यन्त)—स्तन्यत्यागं यावत् पुत्रयोरवेक्षस्व (उत्तरराम० ७)। सर्पकोटरं प्रावत् (पञ्च० १)। २. यदा, जब—यावदुत्थाय निरीक्षते तावद् हंसोऽव- लोकितः (हितोप० ३)। ३. जब तक—यावत्स्वस्थमिदं कलेवरगृहं यावच्च दूरे जरा (वैराग्य० ७५)। यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावन्निजपरिवारो रक्तः (मोहमुद्गर० ८)। ४. तब तक, तब तक के लिये—यावदिमां छायामाश्रित्य प्रतिपालयामि (शाकुन्तल० १)। तद् यावद् गृहिणीमाहूय सङ्गीतकमनुतिष्ठामि (शाकुन्तल० १)। ५. निश्चय ही—यावद् भुङ्क्ते (वह निश्चय ही खायेगा)। यावत्पुरानिपातयोर्लट् (३.३.४) इति लट्।