लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअव्यय-प्रकरणम् ५३५ (रघु० १४.५६) । काकोऽपि जीवति चिराय बलिञ्च भुङ्क्ते (पञ्च० १.२५) । (३७) चिररात्राय = चिरकाल के लिये । प्रतियाते महारण्यं चिररात्राय राघवे । बभूव नगरे मूर्च्छा बलमूर्च्छार्जुनस्य च (रामायण० २.४०.१८), राम के चिरकाल के लिये वन को चले जाने पर नगर में मूर्छा छा गई । (३८) चिरात्* = बहुत काल के बाद । भो भगिनीसुत ! किमिति चिराद् दृष्टोऽसि (पञ्च० ४), हे भान्जे ! क्या कारण है बहुत काल के बाद दिखाई दिये हो ? । चिर तक, बहुत काल तक—तदक्षयं महत् दुःखं नोत्सहे सहितुं चिरात् (रामा- यण० २.२०.४६), मैं उस अक्षय महान् दुःख को बहुत काल तक न सह सकूँगी । नचि- रात्-अचिरात् = शीघ्र । तेषामहं समुद्धर्त्ता मृत्युसंसारसागरात् । भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् (गीता० १२.७) । अचिरादुपकर्त्तुराचरेदयवाऽऽत्मौपयिकीमुपक्रि- याम् । पृथुरित्यमयाणुरस्तु सा न विशेषे विदुषामिह ग्रहः (नैषध० २.१४) । (३९) चिरस्य = चिरकाल के बाद । समानयंस्तुल्यगुणं वधूवरं चिरस्य वाच्यं न गतः प्रजापतिः (शाकुन्तल० ५.१५), तुल्य गुणों वाले वधू-वर का जोड़ा बनाते हुए आज चिरकाल के बाद प्रजापति निन्दा को प्राप्त नहीं हुआ । चिरस्य बत पश्यामि दूराद् भरतमागतम् (रामायण० २.१००.५) । (४०) चिरे = देर तक । चिरे कुर्यात् (शतपथब्रा०)। इस का लोक में प्रयोग बहुत कम होता है । इस प्रकार शिष्टग्रन्थों के प्रयोग से अन्य स्वरादि भी जानने चाहियें । स्वरादिनिपातमव्ययम् (३६७) सूत्र में निपातों की भी अव्ययसंज्ञा की गई है । निपातों का सम्पूर्ण वर्णन अष्टाध्यायी में प्राग्रीश्वरान्निपाताः (१.४.५६) सूत्र के अधिकार में किया गया है । इस अधिकार के दो सूत्र चादयोऽसत्त्वे (५३) तथा प्रादयः (५४) पीछे अच्सन्धिप्रकरण में निर्दिष्ट किये जा चुके हैं । चादि तथा प्रादि गणों में पठित शब्द असत्त्व अर्थ में निपात होते हैं । इन में से प्रादिगण का निर्देश (३५) सूत्र पर पीछे किया जा चुका है अब चादिगण का परिगणन करते हैं । निपात होने से चादि अव्यय हैं—यह नहीं भूलना चाहिये ।१ १. चादिगण को यदि स्वरादिगण में सम्मिलित कर देते तो भी इस की अव्ययसंज्ञा सिद्ध हो सकती थी तो पुनः इस की निपातसंज्ञा का यह प्रयोजन है कि चादयो- ऽसत्त्वे (५३) सूत्र में 'असत्त्व' कथन के कारण द्रव्यवाचक चादियों की निपात- संज्ञा और उस के कारण अव्ययसंज्ञा न हो । यथा— 'पशु' शब्द चादिगण में पढ़ा गया है । 'पशु' शब्द के दो अर्थ होते हैं । एक—पशु = चौपाया, जानवर, दूसरा पशु = सम्यक्, अच्छी तरह । चौपाया अर्थ वाला 'पशु' शब्द द्रव्यवाचक होने से न निपातसंज्ञक होता है और न अव्यय- संज्ञक । यथा—पशुं पश्य (चौपाये को देखो), यहां अव्ययसंज्ञा न होने से पशु शब्द से परे द्वितीयाविभक्ति का लुक् (३७२) नहीं होता । पशु पश्य (ठीक