लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)
Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary
आचार्य वरदराज द्वारा
५४२ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नोट- 'जितना' अर्थ में त्रिलिङ्गी 'यावत्' शब्द का भी बहुधा प्रयोग देखा जाता है। यथा—यावान् अर्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके। तावान् सर्वेषु वेदेषु ब्राह्म- णस्य विजानतः (गीता० २।४६)। यावती सम्भवेद् बुद्धिस्तावतीं दातुमर्हति (मनु० ८।१५५)। यावन्ति पशुरोमाणि (मनु० ५।३८)। [२८] तावत्* ॥ १ तब तक—तावच्च शोभते मूर्खो यावत् किञ्चिन्न भाषते (हितोप० १)। २ पहले (अन्य कार्य करने से पूर्व)—आर्ये ! इतस्तावदागम्यताम् (शाकुन्तल० १)। ३. तो—एव कृते तव तावत् क्लेशं विना प्राणयात्रा भविष्यति (पञ्च० १ कथा ८)। विग्रहस्तावदुपस्थित (हितोप० ३)। ४. निश्चित ही—त्वमेव तावत् प्रथमो राजद्रोही (मुद्रा० १)। ५ यावत् के प्रतिसम्बन्ध मे --एकस्य दुःखस्य न यावदन्तं गच्छाम्यहं पारमिवार्णवस्य। तावद् द्वितीय समुपस्थित मे छिद्रेष्वनर्था बहुलीभवन्ति (पञ्च० २।१०६)। यावत् त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्य समाचरेत् (मनु० २ २३५), माता, पिता और गुरु जब तक जीवित रहे तब तक उन की ही सेवा मे रत रहे। नोट—'उतना' अर्थ मे त्रिलिङ्गी 'तावत्' शब्द का भी बहुधा प्रयोग होता है। उदाहरण ऊपर 'यावत्' के नोट मे देखें। [२९] त्वै ॥ १ विक्षेप—अयं त्वै प्रकृत्यते (गणरत्न०)। २. वितर्कं—कस्त्या एषोऽभि- गच्छति (गणरत्न०)। नोट—यह निपात ब्राह्मणग्रन्थो के कतिपय प्रयोगो के अतिरिक्त अन्यत्र कही उपलब्ध नही हुआ। शतपथ (माध्यन्दिनीय) के (१२.२.२१२) में इस का प्रयोग देखा जाता है। एवम् अन्य ब्राह्मणो मे भी क्वाचित्क प्रयोग है। [३०] न्वै ॥ १ वितर्कं—को न्वा एषोऽभिगच्छति (गणरत्न०)। पादपूरणेऽपि—इति वर्धमान। नोट- कई लोग 'त्वै' के स्थान पर 'न्वै' का पाठ मानते हैं। परन्तु ब्राह्मण- ग्रन्थों मे दोनो का पाठ देखा जाता है। निदर्शनार्थं 'न्वै' का पाठ माध्यन्दिनीय शतपथ मे (१२ ४ १ ३) के स्थान पर देखें। [३१] द्वै ॥ १ वितर्कं। इस का प्रयोग वर्तमान उपलब्ध वैदिक वा लौकिक वाङ्मय मे हमे कही नही मिला। [३२] रै ॥ १ अनादर—त्य ह रे किं करिष्यसि (गणरत्न०)। दान—रै करोति (गण- रत्न०), दान ददातीत्यर्थ। नोट- इस के उदाहरण अन्वेष्टव्य हैं। वर्धमानोक्त उदाहरण ही दीक्षित ने शब्दकौस्तुभ मे उद्धृत किये हैं। किसी को भी अन्य कोई उदाहरण नही मिला।
अव्यय-प्रकरणम् ५४३ [३३-३७] श्रौषट्, वौषट्, स्वाहा, स्वधा, वषट् ॥ इन की व्याख्या स्वरादियों में की जा चुकी है। इन का यहां पुनर्ग्रहण स्वर (आद्युदात्त) के लिये ही समझना चाहिये। [३८] तुम् ॥ १. तूं तूं कह कर निरादर करना—गुरुं हुंकृत्य तुंकृत्य विप्रं निर्जित्य वादतः । श्मशाने जायते घोरे काकगृध्रोपसेविते (सुप्रसिद्ध) । नोट—यहां 'तुम्' से उपर्युक्त उदाहरणगत 'तुम्' के ग्रहण में हमारा मन सन्देह करता है। किसी कोषकार ने इस का उल्लेख नहीं किया । [३६] तथाहि* ॥ १. क्योंकि, कारण कि, इसीलिये—तं वेधा विदधे नूनं महाभूतसमाधिना । तथाहि सर्वे तस्यासन् परार्थैकफला गुणाः (रघु० १.२६) । २. इस तरह, इस प्रकार —तथाहि रामो भरतेन ताम्यता प्रसाद्यमानः शिरसा महीपतिः । न चैव चक्रे गमनाय सत्त्ववान् मतिं पितुस्तद्वचने व्यवस्थितः (रामायण० २.१०६.३३) । नोट—यह निपात 'तथा' और 'हि' इन दो निपातों को मिला कर बना है । [४०] खलु* ॥ १. शैलीवशात् दबाव (Stress) डालते हुए वाक्यालंकार में—न खलु धीमतां कश्चिदविषयो नाम (शाकुन्तल० ४) । न खलु स उपरतो यस्य वल्लभो जनः स्मरति (सुभाषित०) । २. अनुनय करना—न खलु न खलु बाणः सन्निपात्योऽयमस्मिन् । मृदुनि मृगशरीरे तूलराशाविवाग्निः (शाकुन्तल० १)। न खलु न खलु मुग्धे साहसं कार्य- मेतत् (नागानन्द० ३)। ३. निश्चय ही, निस्सन्देह, सचमुच—अनुत्सेकः खलु विक्रमाऽ- लङ्कारः (विक्रमो० १), निश्चय ही अभिमानशून्यता वीरता का अलङ्कार है । न खल्वनिर्जित्य रघुं कृती भवान् (रघु० ३.५१), निश्चय ही रघु को जीते बिना आप कृतकृत्य नहीं हो सकते। दूरीकृताः खलु गुणैरुद्यानलता वनलताभिः (शाकुन्तल० १.१६), निस्सन्देह वन की वेलों ने बाग की वेलों को मात दे दी । पुत्रादपि प्रियतरं खलु तेन दानम् (पञ्च० २.५५), सचमुच दान पुत्र से भी अधिक प्रिय होता है। ४. प्रश्न पूछने में—न खलु तामभिक्रुद्धो गुरुः (विक्रमो० ३), तो क्या गुरु उस पर क्रुद्ध नहीं हुए ? न खलु विदितास्ते तत्र निवसन्तःइचाणक्यहतकेन (मुद्रा० २), तो क्या उन्हें वहां रहते हुए दुष्ट चाणक्य ने नहीं जाना ? ५. निषेध में—पीत्वा खलु (मत पिओ), यहां अलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा (८७८) सूत्र से क्त्वा प्रत्यय हो जाता है । निर्धारितेऽर्थे लेखेन खलूक्त्वा खलु वाचिकम् (माघ० २.७०), लेख द्वारा अर्थ के जान लेने पर फिर मौखिक अभिप्राय समझाना व्यर्थ है। ६. हेत्वर्थ में (कारण कि, क्योंकि) —न विदीर्ये कठिनाः खलु स्त्रियः (कुमार० ४.५), मैं विदीर्ण नहीं हो रही कारण कि स्त्रियां कठोर होती हैं । नोट—न पादादौ खल्वादयः (वामनसूत्र ५.१.५) यह सूत्र निषेधार्थक से भिन्न 'खलु' के लिये है ।
५४४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [४१] किल* ॥ १ वार्ता अर्थात् ऐतिह्य बात कहने मे—बभूव योगी किल कार्तवीर्यः (रघु० ६.३८), सुनते हैं कि कार्तवीर्य नाम वाला एक ब्रह्मवेत्ता था। जघान कंसं किल वासु- देवः (महाभाष्ये ३ २ १११), कहते हैं कि वासुदेव ने कंस को मार डाला। २ निश्चय मे—इदं किलाव्याजमनोहरं वपुः (शाकुन्तल० १.१८), निश्चय से यह शरीर स्वाभाविक सुन्दर है। स्वादुष्किलायं मधुमाँ उतायम् (ऋ० १.४७ १) निश्चय ही यह सोम स्वादु है और मधुर है। ३ अलीक अर्थात् अवास्तविक बात कहने मे— प्रसह्य सिंहः किल तां चकर्ष (रघु० २ २७), सिंह ने बलपूर्वक उस नन्दिनी को दबो- चने का बहाना किया। अयि कठोर यशः किल ते प्रियम् (उत्तरराम० ३ २७), ऐ निर्दय ! तुझे यश प्यारा है— यह झूठ है। द्राघीयसा वयोऽतीतं परिक्लांन्तः किला- ध्वना (किरात० ११.२), वह बूढ़ा कपटरूप से दीर्घ मार्ग के कारण थका हुआ प्रतीत हो रहा था। ४ सम्भावना मे—पार्थः किल विजेष्यते कुरून् (गणारत्न०), आशा है कि अर्जुन कौरवो को जीतेगा। गुरुन् किलातिशेते शिष्यः (व्या० व०), सम्भावना है कि शिष्य गुरुओ से बढ़ जायेगा। ५ अरुचि मे—एवं किल केचिद्वदन्ति (गणारत्न०), [हम तो नहीं मानते] परन्तु कुछ लोग ऐसा कहते हैं। ६ निरादर मे—त्वं किल योत्स्यसे (गणरत्न०), तू और फिर युद्ध करेगा अर्थात् युद्ध करना तेरे बूते से बाहर है। ७. हेतु अर्थ मे (क्योंकि)—क्षतात् किल त्रायत इत्युदग्रः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः (रघु० २ ५३), क्योकि घाव से बचाता है इस कारण उग्र क्षत्रशब्द तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। {४२} अथो ॥ इस के भी प्राय 'अथ' की तरह अर्थ होते हैं। १. समुच्चय ('च' के अर्थ) में—स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् । विविधानि च शिल्पानि समादे- यानि सर्वतः (मनु० २.४०)। २ अनन्तर—अथो वयस्यां परिपार्श्ववर्त्तिनीं विवर्त्तिता- ऽनञ्जननेत्रमंक्षकं (कुमार० ५.५१), तब अञ्जनशून्य नेत्रों वाली पास खड़ी सखी को पार्वती ने देखा। नोट—'अथो' निपात (५३) है अतः इस के आगे स्वर वर्ण आने पर ओत् (५६) सूत्र द्वारा प्रगृह्यसंज्ञा हो जाती है। तब प्रकृतिभाव होने से सन्धि नहीं होती। यथा—अनेन व्याकरणमधीतमथो एनं छन्दोऽध्यापयेति (सि० कौ०) । [४३] अथ* ॥ इस का विवेचन स्वरादियों में हो चुका है। स्वरादियो में इस के पढ़ने का प्रयोजन यह है कि मङ्गलप्रशस्तववाचक 'अथ' शब्द की भी अव्ययसंज्ञा सिद्ध हो जाये । यथा नैषध० (१५.६) में— उदस्य कुम्भोरय शातकुम्भजाद्यदम्बुकं चारुसितापि वेदिकोदरे। यथाङ्गुराचारमथावनोन्द्रजा पुरन्ध्रिवर्गः स्नपयाम्बभूव ताम् ॥ यहाँ 'अथ स्नपयाम्बभूव' का 'मङ्गलं स्नपनं चकार' ऐसा अर्थ है। निपातो में पढ़ा
अव्यय-प्रकरणम् ५४५ गया यह 'अथ' अन्य अर्थ का वाचक होता हुआ केवल स्वरूपमात्र से मङ्गल का द्योतन कराता है। यथा - अथातो ब्रह्मजिज्ञासा (वेदान्तदर्शन १.१.१), यहां आनन्तर्य अर्थ का वाचक 'अथ' शब्दस्वरूप अर्थात् ध्वनिमात्र में माङ्गलिक (मङ्गलद्योतक) है। कहा भी है— ओंकारश्चाथशब्दश्च द्वावेतौ ब्रह्मणः पुरा । कण्ठं भित्त्वा विनिर्यातो तेन माङ्गलिकावुभौ ॥ [४४] सुष्ठु* ॥ इस का विवेचन स्वरादियों के आकृतिगणत्वेन परिगणित संग्रह में कर चुके हैं। यहां निपातों में इस का पुनर्ग्रहण निपाता आद्युदात्ताः (फिद्मसूत्र ८०) द्वारा आद्यु- दात्तस्वर के लिये ही किया गया है। स्वरादियों में प्रायः फिषोऽन्त उदात्तः (फिद्मसूत्र १) से अन्तोदात्त स्वर होता है। जिन में दोनों स्वर अभीष्ट होते हैं उन अनेकाचों का दोनों जगह पाठ किया जाता है। ध्यान रहे कि एकाचों में स्वरसंबंधी कोई अन्तर नहीं होता। [४५] स्म* ॥ १. भूतकाल में—भासुरको नाम सिंहः प्रतिवसति स्म (पञ्च० १) । क्रीणन्ति स्म प्राणमूल्यैर्यशांसि (माघ० १८.१५)। इस के योग में भूतकाल में भी लट् का प्रयोग होता है—देखें लट् स्मे (७६३) तथा अपरोक्षे च (३.२.११६) । २. शब्द सौन्दर्य बढ़ाने के लिये प्रायः 'मा' (माङ्) के साथ—भर्तृविप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः (शाकुन्तल० ४.१८)। मा स्म सीमन्तिनी काचिज्जनयेत् पुत्रमीदृशम् (हितोप० २.७)। ३. पादपूर्ति के लिये—तु हि च स्म ह वै पादपूरणे —इत्यमरः । [४६] आदह् ॥ १. हिंसा—आदहारीन् पुरन्दर (गणरत्न०) । २. उपक्रम—आदह भक्तस्य भोजनाय (गणरत्न०)। ३. कुत्सन—कुर्वादह् यदि करिष्यसि (गणरत्न०)। नोट—इस अव्यय का हमें कहीं प्रयोग नहीं मिल सका । भट्टोजिदीक्षित को भी इस का प्रयोग उपलब्ध नहीं हुआ, यह उन्होंने शब्दकौस्तुभ में स्पष्ट स्वीकार किया है। उपसर्ग-विभक्ति-स्वर-प्रतिरूपकाश्च (गणसूत्रम्) ॥ अर्थः—उपसर्गप्रतिरूपक, विभक्तिप्रतिरूपक तथा स्वरप्रतिरूपक भी चादियों में पड़ने चाहिये । जो वस्तुतः उपसर्ग तो न हों पर आकृत्या उपसर्ग के समान प्रतीत हों उन्हें 'उपसर्गप्रतिरूपक' कहते हैं। इसी प्रकार विभक्ति अर्थात् विभक्त्यन्त के समान प्रतीत होने वाले 'विभक्तिप्रतिरूपक' तथा स्वर अर्थात् अच् के समान प्रतीत होने वाले 'स्वरप्रतिरूपक' कहलाते हैं। उपसर्गप्रतिरूपक यथा— [४७] अवदत्तम् ॥ १. दिया जा चुका । किमन्नम् अवदत्तं त्वया ? ल० प्र० (३५)
५४६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् नोट—अव + दा + क्त = अव + दद् + त = अवदत्तम् । यहां 'अव' उपसर्ग नहीं अपितु उपसर्गप्रतिरूपक (उपसर्ग के सदृश दिखाई देने वाला) निपात है । अतः उपसर्ग न होने से इस से परे 'दा' धातु के आकार को अच उपसर्गात्त (७।४।४७)१ सूत्रद्वारा त् आदेश नहीं होता । दो दद् घो (८२७)२ द्वारा सम्पूर्ण 'दा' के स्थान पर दद् आदेश ही होता है । ध्यान रहे कि 'अव' उपसर्ग के योग में 'दा' के आकार को त् आदेश करने पर—अव + द त् + क्त = अवत्तम् रूप बनता है । इसी प्रकार— अवदत्तं विदत्तं च प्रदत्तञ्चादिकर्मणि । सुदत्तमनुदत्तञ्च निदत्तमिति चेष्यते ॥ (महाभाष्य) इन में अनु, प्र, सु, वि और नि को भी उपसर्गप्रतिरूपक निपात समझना चाहिये । विभक्तिप्रतिरूपक यथा— [४८] अहंयु ॥ १ अहङ्कारवान्—स शुश्रुवांस्तद्वचनं मुमोह राजाऽसहिष्णु सुतविप्रयोगम् । अहंयुनाऽथ क्षितिपं शुभंयुस्तच्चे वचस्तापसकुञ्जरेण (भट्टि० १।२०), महाराज दशरथ विश्वामित्र के उन वचनों को सुन कर पुत्रवियोग को सहन न करते हुए मोह को प्राप्त हो गए । तब अहङ्कारवान् तापसश्रेष्ठ विश्वामित्र ने अपना कल्याण चाहने वाले राजा को यह वचन कहा । नोट—'अहम्' यह अहङ्कारवाचक विभक्तिप्रतिरूपक निपात है । 'अस्मद्' शब्द के प्रथमैकवचनान्त के समान प्रतीत होता है, परन्तु है यह उस से नितान्त ही भिन्न । इस निपात (अव्यय) से मत्वर्थ में अहञ्शुभमोर्युस् (११६२) सूत्रद्वारा युस् प्रत्यय हो जाता है । अहम् (अहङ्कार ) यस्यास्तीति—अहंयु । 'अहंयु' शब्द उकारान्त त्रिलिङ्गी हो जाता है । ध्यान रहे कि इसे सकारान्त समझना भूल है । प्रत्यय का सित्त्व पदसञ्ज्ञार्थ है । अतः भसञ्ज्ञा न हो कर पदसञ्ज्ञा के कारण मोऽनुस्वार (७७) से मकार को अनुस्वार हो जाता है । 'अहंयु' शब्द में यदि 'अस्मद्' शब्द होता तो प्रत्ययोत्तरपदयोश्च (७ २ ६८) द्वारा मपर्यन्त मद् आदेश होकर 'मद्यु' ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता । इसी प्रकार 'शुभम्' (सुख, कल्याण) इस विभक्तिप्रतिरूपक निपात से भी युस् प्रत्यय हो कर—शुभम् यस्यास्तीति 'शुभंयु' निष्पन्न होता है । इस का साहित्यगत प्रयोग भी ऊपर के श्लोक में आ चुका है । अहङ्कारवानहंयुः शुभंयुस्तु शुभान्वित — इत्यमर । चिरेण, चिराय, चिरात्, चिरे, चिरस्य—इत्यादि अव्ययो को भी कई लोग १ अच उपसर्गात्त (७।४।४७) — अजन्त उपसर्ग से परे घुसंज्ञक दा धातु के आकार को त्' आदेश हो जाता है तकारादि कित् प्रत्यय परे हो तो । २ दो दद् घो (८२७)—घुसंज्ञक दा धातु को 'दद्' यह सर्वादेश हो जाता है तकारादि कित् प्रत्यय परे हो तो ।
अव्यय-प्रकरणम् ५४७ स्वरादियों में न पढ़ कर चादियों में ही पढ़ते है । ये सब विभक्तिप्रतिरूपक निपात या अव्यय हैं । विभक्ति न होने पर भी इन में विभक्ति का सा भ्रम होता है । सुब्विभक्त्यन्त का भ्रम होने से इन को सुबन्तप्रतिरूपक निपात भी कहते हैं । अत्र तिङन्तप्रतिरूपक निपात का उदाहरण देते हैं— [४६] अस्तिक्षीरा ।। अस्तिक्षीरा = क्षीरवती (गाय आदि) । अस्ति (विद्यमानम्) क्षीरं (दुग्धम्) यस्याः सा—अस्तिक्षीरा । बहुव्रीहिसमासः । यहां 'अस्ति' यह विद्यमानार्थक तिङन्त- प्रतिरूपक निपात (अव्यय) है । यदि यह वस्तुतः तिङन्त होता तो इस का सुबन्त क्षीरशब्द के साथ बहुव्रीहिसमास न हो सकता [देखें—अनेकमन्यपदार्थे (६३५)]। किसी घटना, कथा या वर्णन को आरम्भ करने में भी 'अस्ति' निपात का प्रयोग देखा जाता है । यथा—अस्ति पूर्वमहं व्योमचारी विद्याधरोऽभवम् (कथासरित्० २२.५६)। इसी निपात से अस्तिकायः, अस्तित्व आदि शब्द बनते हैं । कुछ लोगों का कहना है कि 'अस्ति' का पीछे स्वरादियों में पाठ आ चुका है अतः इसे तिङन्तप्रतिरूपक के रूप में उदाहृत करना बेकार है¹। इस के स्थान पर अस्मि (मैं) का उदाहरण यहां के लिये उपयुक्त है । 'अस्मि' के उदाहरण यथा— त्वामस्मि वच्मि विदुषां समवायोऽत्र तिष्ठति (साहित्य० ४), अस्मि = अहं वच्मि इत्यर्थः । दासे कृतागसि भवत्युचितः प्रभूणां पादप्रहार इति सुन्दरि नास्मि दूथे (साहित्य० १०), हे सुन्दरि ! अपराधी सेवक पर प्रभु पादप्रहार करें यह उचित ही है अतः मैं दुःखी नहीं हो रहा हूं । अन्यत्र यूयं पुष्पावचयं कुरुध्वमत्रास्मि करोमि सख्यः (काव्यप्र० ३.२०), हे सखियो ! आप दूसरी जगह फूल चुनो मैं यहां चुनता हूं । नृमांसमस्मि विक्रीणे गृह्यतामित्युवाच सः (कथासरित्०), मैं नरमांस बेच रहा हूं लीजिये ऐसा उस ने कहा । योगशास्त्र में प्रसिद्ध अस्मिता शब्द भी इसी निपात से निष्पन्न होता है । इसी प्रकार—'अस्तु' आदि अन्य भी तिङन्तप्रतिरूपक निपात समझ लेने चाहियें । १. उन का यह भी कहना है कि 'अस्ति' शब्द का अर्थ 'धन' भी होता है इस से अस्तिमान् (धनवान्) शब्द निष्पन्न होता है। अतः सत्त्ववाचक होने से स्वरादियों में ही इस का पाठ उचित है । क्योंकि यहां चादयोऽसत्त्वे (५३) में 'असत्त्वे' कथन के कारण धनवाचक 'अस्ति' शब्द की निपातसंज्ञा न हो सकेगी । परन्तु अन्य लोग उन के इस विचार से सहमत नहीं उन का कथन है कि (५.२.६४) सूत्रस्थ महाभाष्य के अवलोकन से यह सुतरां प्रमाणित होता है कि इस का स्वरादियों में पाठ अप्रामाणिक है चादियों में ही पाठ उचित है । अस्तिमान् का वास्तविक अर्थ 'सत्ता वाला' है । लोक में सत्ता प्रायः धनमूलक मानी जाती है अतः इस का अर्थ 'धनवान्' भी हो गया है ।
५४८ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् स्वरप्रतिरूपक यथा— [५०] अ ॥ १ सम्बोधन—अ अनन्त । २ आक्षेप (निन्दा) में—अपचसि जाल्म (सि० कौ०) हे दुष्ट ! तुम गर्हितरीत्या पकाते हो । अनेक वैयाकरण इस अर्थ में नञ् के नकार का नञो नलोपस्तिङि क्षेपे (वा०) वार्तिक द्वारा लोप हुआ मानते हैं, स्वतन्त्रतया 'अ' निपात का प्रयोग नहीं । [५१] आ ॥ १ पूर्व प्रक्रान्त वाक्य के अन्यथा करने में—आ एव नु मन्यसे (काशिका), अब तू ऐसा मानता है अर्थात् पहले त ऐसा नहीं मानता था अब मानने लगा है। २ स्मरण में—आ एव किल तत् (काशिका), ओह ! वह ऐसा ही है । इस का विवेचन पीछे निपात एकाजनाङ (५५) सूत्र पर कर चुके हैं । [५२] इ ॥ १ सम्बोधन—इ इन्द्र पश्य (काशिका), ऐ ! इन्द्र को देखो । २ विस्मय— इ इन्द्र (सि० कौ०), ओह ! यह इन्द्र है । [५३] ई ॥ १ सम्बोधन—ई ईश ! । ई ईदृश ससार (गणरत्न०) । [५४] उ ॥ १ सम्बोधन—उ उत्तिष्ठ (गणरत्न०) । २ वितर्क—उ उमेश (सि० कौ०), जान पड़ता है कि उमेश है । [५५–५६] ऊ । ए । ऐ । ओ । औ ॥ १ सम्बोधन—ऊ उपरे बीजं वपति । ए इतो भव । ऐ वाचं देहि । ओ धावय (गणरत्न०)। औ महात्मन् ! । नोट—इन स्वरप्रतिरूपक निपातों की अच् परे होने पर 'निपात एकाजनाङ् (५५) सूत्रद्वारा प्रगृह्यसंज्ञा हो कर प्रकृतिभाव हो जाता है, अतः स्वरसन्धि नहीं होती । [६०] पशु ॥ १ ठीक तरह में —सोध नयन्ति पशु मन्यमाना (ऋ० ३।५३।२३) । [६१] शुकम् ॥ १ शीघ्र—शुकं गच्छति (गणरत्न०), शीघ्र जाता है । नोट—इस के प्रयोग अन्वेषणीय हैं। कुछ कोषकार यहां 'शकम्' पाठ मानते हैं । १ स्वरादिरिति सम्बोधन भर्त्सनाऽनुकम्पा-पादपूरण-प्रतिषेधेषु यथासम्भवं भवति— इति गणरत्नमहोदधौ वर्धमानः ।
अव्यय-प्रकरणम् ५४६ [६२] यथाकथाच ॥ १. अनादर—यथाकथाच दीयते (गणरत्न०) । यथाकथाच दक्षिणा (गण- रत्न०) । यथाकथाच दीयते क्रियते वा याथाकथाचम् (व्या० च०) । 'याथाकथाचम्' तद्धितान्त प्रयोग है । नोट—यह निपातसमुदाय है । इस के प्रयोग अन्वेष्टव्य हैं । [६३-६४] पाट् । प्याट् ॥ १. सम्बोधन—पाट् पान्थ, प्याट् पावक (हेमचन्द्र)¹ । [६५] अङ्ग* ॥ १. सम्बोधन—अङ्ग कच्चित्कुशली तातः (कादम्बरी०) । प्रभुरपि जनका- नामङ्ग भो याचकास्ते (महावीर० ३.५) । अङ्गाधीष्व भक्तं ते दास्यामि (काशिका ८.२.६६), अरे भाई पढ़ो मैं तुम्हे भात दूंगा । २. किम् + अङ्ग = किमङ्ग = कितना अधिक—तृणेन कार्यं भवतीश्वराणां किमङ्ग वाग्हस्तवता नरेण (पञ्च० १.७१) । ३. बात ही क्या—शक्तिरस्ति कस्यचिद्विदेहराजस्य च्छायामप्यवस्कन्दयितुं किमङ्ग जामातरम् (महावीर० ३) । नोट—कोषकारों ने इस निपात के ये अर्थ गिनाये हैं—क्षिप्रं च पुनरर्थं च सङ्गमासूययोस्तथा । हर्षे सम्बोधने चैव ह्यङ्गशब्दः प्रयुज्यते । [६६] है ॥ १. सम्बोधन—है राम पाहि माम् । [६७] हे* ॥ १. सम्बोधन—हे कृष्ण हे यादव हे सखेति (गीता० ११.४१) । [६८] भोस्* ॥ १. सम्बोधन—भोस्तपोधनाः! चिन्तयन्नपि न खलु स्वीकरणमत्रभवत्याः स्म- रामि (शाकुन्तल० ५) । भो भोः पण्डिताः श्रूयताम् (हितोप० प्रस्तावना) ।² [६९] अये* ॥ १. सम्बोधन—अये गौरीनाथ ! त्रिपुरहर ! शम्भो ! त्रिनयन ! (वैराग्य० ८७) । २. आश्चर्य—अये कुमारलक्ष्मणः प्राप्तः (उत्तरराम० १) । १. सम्बोधनेऽङ्ग भोः प्याट् पाट् हे है हंहो अरेडीय रे—इत्यभिधानचिन्तामणिः । २. कुछ वैयाकरण 'भो' इस प्रकार का ओदन्त निपात भी मानते हैं। अहो आहो हो उताहो च नो अंहो अयो इमे । भो प्रयुक्ताश्च ओदन्ता अष्टावित्यागमे स्मृताः (शाकटायन लघुवृत्ति पृ० २६ बनारससंस्करण) । भो सुन्दरि (जैनेन्द्रमहावृत्ति ५.४.३) । साहित्य में इस के प्रयोग अन्वेष्टव्य हैं [पाणिनीयतन्त्र में इस प्रकार की मान्यता हमारे दृग्गोचर कहीं नहीं हुई] ।
५५० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् [७०] द्य । १ पादपूर्ति २ हिंसा ३ प्रातिलोम्य । द्य हिनस्ति मृगं व्याध (प्रक्रिया० प्रसाद) । नोट—इस निपात का प्रयोग हमे कही नही मिला । अथर्ववेद मे द्य का पाठ तीन स्थाना पर आया है परन्तु वहा सर्वत्र अव्यय का प्रयोग न हो कर धातु का रूप प्रयुक्त किया गया है । [७१] विषु ॥ १ साम्य समता । विषु (साम्यम्) अस्त्यस्येति विषुवान् । समरात्रन्दिव काल (Equinox) इत्यर्थ । विषुवद् वृत्तम् = भूमध्यरेखा = Equator । २ चहुँ ओर नाना दिशाओ मे—विषु (सर्वासु दिक्षु) अञ्चतीति विष्वक् । छायासुप्तमृग शकुन्तनिबर्हिश्चिष्वग्विलुप्तच्छद (पञ्च० २.२) । समन्ततस्तु परित सर्वतो विष्व गित्यपि—इत्यमर । [७२] एकपदे* ॥ १ एकदम एकसाथ—निहत्यरीनेकपदे य उदात्त स्वरानिव (माघ० २.६५) । २ अकस्मात् अचानक—अथमेकपदे तया वियोग प्रियया घोरनत सुदुस्सहो मे (विक्रमो० ४.३) । कथमकपदे निरागस जनमाभाष्यमम न मन्यसे (रघु० ८.४८) । [७३] युत् ॥ १ कुत्सा, गर्हा । उदाहरणमृग्यम् । नोट—शब्दकौस्तुभ, प्रौढमनोरमा, व्याकरणसिद्धान्तसुधानिधि आदि ग्रन्थो मे यहाँ पुत्' पाठ दे कर—पुत् कुत्सितमवयव छादयतीति पुच्छम—ऐसा उदाहरण भी लिखा हुआ मिलता है । [७४] आात्स् ॥ १ इतोऽपि = इस कारण से भी—आतश्च सूत्रत एव (महाभाष्य० पस्पशा ह्निव) । आतस्त्वां प्रति कोपनस्य तरल शापोदक दक्षिण (व्या० मि० सु०) । आकृतिगणोऽयम् ॥ यह चादि भी आकृतिगण है । प्रयोग मे देखे जाने वाले कुछ अन्य अव्यय यथा— (१) अयि*=१ कोमल सम्बोधन । अयि कठोर यश किल ते प्रियम् (उत्तरराम० ३.२७) । अयि विद्युत प्रमदानां त्वमपि च दुख न जानासि (मृच्छ० ५.३२) । अयि मातर्देवयजनसम्भवे देवि सीते (उत्तरराम० ४) । २ पूछने मे—अयि जानीषे रेभिलस्य सार्थवाहस्योद्वसितम् ? (मृच्छ० ४) । अपि जीवितनाथ जीवसि (कुमार० ४.३) । (२) रे*=सम्बोधन । रे रे चातक सावधानमनसा मित्र क्षण श्रूयताम्
अव्यय-प्रकरणम् ५५१ (नीति०) । रे पान्थ ! विह्वलमना न मनागपि स्याः (भामिनी० १.३६) । दिने दिने त्वं तनुरेधि रेऽधिकम् (नैषध० १.६०) । (३) अरे=अपने से निकृष्टों के सम्बोधन में - आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः (बृ० उ० २.५), अरी ! आत्मा ही देखने योग्य, सुनने योग्य तथा मनन करने योग्य है। यहां याज्ञवल्क्य अपनी पत्नी मैत्रेयी को सम्बो- धित कर रहे हैं। (४) अरेरे=क्रोध या निरादर से सम्बोधन करने में - अरेरे राधागर्भभार- भूत सूतापसद (वेणी० ३) । (५) भगोस् = देवों या मान्यों के सम्बोधन में - भगो नमस्ते (भगवन् ! आप को नमस्कार हो) । सा होवाच मैत्रेयी यन्नु मे इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति (बृ० उ० २.४.२), वह मैत्रेयी बोली - हे भग- वन् ! यदि यह सम्पूर्ण पृथ्वी धन से परिपूर्ण हुई मेरी हो जाये तो भी मैं कैसे उस से मुक्त हो जाऊंगी ? (६) अघोस् = निकृष्ट पापी या दुष्ट को सम्बोधित करने में - अघो याहि (रे दुष्ट ! तू जा) । (७) हंहो=प्रायः मध्यमदर्जे के जनों को सम्बोधित करने में - हंहो ब्राह्मण ! मा कुप्य (मुद्रा० १) । हंहो तिष्ठ सखे ! विवेक ! बहुभिः प्राप्तोऽसि पुण्यैर्मया (हेम- चन्द्र), हे मित्र विवेक ! तू मेरे पास रह जा, मैं ने तुम्हें बड़े पुण्यों से पाया है। (८) हा* = १. दुःख, शोक या खेद प्रकट करने में - हा कष्टं ललिता लवङ्ग- लतिका दावाग्निना दह्यते (भामिनी० १.५५) । हा पितः ! क्वासि हे सुभ्रु ! (भट्टि० ६.११) । हाहा तथापि विषया न परित्यजन्ति (वैराग्य० १५) । हाहा देवि ! स्फुटति हृदयं संस्रते देहबन्धः (उत्तरराम० ३. ३८) । २. आश्चर्य प्रकट करने में - हा कथं महाराजदशरथस्य धर्मदाराः प्रियसखी मे कौशल्या (उत्तरराम० ४) । (६) अहह = १. खेदातिशय प्रकट करने में - तुषाराद्रेः सूनोरहह पितरि क्लेशविवशे, न चासौ सम्पातः पयसि पयसां पत्युरुचितः (नीति० २८), पिता हिमा- लय के क्लेशविवश होने पर उस के पुत्र मैनाक का समुद्र में डुबकी लगाना अच्छा न था । २. आश्चर्य या अद्भुत अर्थ में - अहह महतां निःसीमानश्चरित्रविभूतयः (नीति० २७), आश्चर्य है कि महापुरुषों के चरित का माहात्म्य सीमारहित होता है। (१०) अहो* = १. महत्त्व या आश्चर्य प्रकट करने में - अहो मधुरमासां दर्शनम् (शाकुन्तल० १) । अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता (किरात० १.३३) । अहो कामी स्वतां पश्यति (शाकुन्तल० २.२) । अहो रूपमहो वीर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः । अहो दीप्तिरहो कान्तिरहौ शीलमहो बलम् । अहो शक्तिरहो भक्तिरहो प्रज्ञा हनूमतः (रामचरित० १.५२) । २. खेद या दुःख प्रकट करने में - अहो दुष्पन्तस्य संशयमा- रूढाः पिण्डभाजः (शाकुन्तल० ५) । विधिरहो बलवानिति मे मतिः (नीति० ८५) ।
५५२ भीमव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् (गीता० १।४४) । ३ सम्बोधन—अहो हिरण्यक ! श्लाघ्योऽसि । अतोऽहमपि त्वया सह मैत्रीमिच्छामि (हितोप०) । (११) सह*=के साथ । शशिना सह याति कौमुदी सह मेघेैन तडित् प्रलीयते (कुमार० ४।३३) । सहैव दशभि पुत्रैर्भारं वहति गर्दभी (चाणक्य०) । (१२) जातु*=सर्वथा, बिलकुल, कभी भी— न जातु काम कामानामुप- भोगेन शाम्यति । हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते (मनु० २।९४) । अलब्ध- ज्ञानोत्पषणा नृपाणां न जातु मौलौ मणयो वसन्ति (भामिनी० १।७०) । (१३) इत् = ही—अक्षैर्मा दीव्य कृषिमित् कृषस्व (ऋ० १०।३४।१३), जुआ मत खेल, खेती ही कर । अर्यन्नित् सद्म भद्रमश्नुते (निरुक्त) । लौकिक साहित्य में इस का स्थान प्राय 'एव' ने ले लिया है । (१४) नो*=नही, नञ् के अर्थ मे । भार्या साधु सुवंशजापि भजते नो यान्ति मित्राणि च, न्यायारोपितविक्रमाण्यपि नृणां येषा नहि स्पार्द्धनम् (पञ्च० ५।२४) । पुष्पाणा प्रकर स्मितेन रचितो नो कुन्दजात्यादिभि. (अमर० ४३) । विदुषा वदना- द्वाच. सहसा यान्ति नो बहिः । याताश्चेन्न पराञ्चन्ति द्विरदानां रदा इव (भामिनी० १।६४) । (१५) नोचेत्*=यदि नहीं तो—नोचेच्चेन प्रविश सहसा निर्विकल्पे समाधौ (वैराग्य० ६६) । धर्मं चर्यमाणमर्या अनूत्पद्यन्ते, नोचेद् अनूत्पद्यन्ते न धर्महानिर्भवति (आपस्त० ध० १.२० ३.४) ।¹ (१६) नहि*=नही, निश्चित निषेध । नहि तापयितुं शक्य सागराम्भ- स्तृणोल्कया (हितोप० १।८६) । अनुहुङ्कुरुते घनध्वनिं नहि गोमायुरुतानि केसरी (माघ० १६।२५)। नहि प्रफुल्लं सहकारमेत्य वृक्षान्तरं काङ्क्षति षट्पदाली (रघु० ६।६६) । कियन्मात्र जलं विप्र ! जानुदघ्न नराधिप । तथापीयमवस्था ते नहि सर्वे भवादृशा (सुभाषितरत्न०) । (१७) उत*= १. अथवा, या, विकल्प—वीरो रसः किमयमेश्पुत दर्प एव (वीरचरित०)। किमिद गुरुभिरूपदिष्टमुत धर्मशास्त्रेषु पठितमुत मोक्षप्राप्तियुक्तिरियम् (कादम्बरी०) । तत्किमप्रमातपदोष स्यादुत यया मे मनसि वर्तते (शाकुन्तल० ३)। एकमेव वर पुसामुत राज्यमुताश्रमः (गणरत्न०) । २. भी, 'अपि' के अर्थ मे—प्रिय १. इन अव्ययो या निपातो मे अनेक शब्द दो अव्ययो के सयोग से बने हैं । यथा— नोचेत्, नहि, प्रत्युत, यद्यपि, यतीव, किमपि, किञ्च आदि । क्या इन को एक ही अव्यय मानें या दो का समुदाय ? इस विषय मे हम कुछ कहने की स्थिति मे नही हैं । कारण कि पाणिनिद्वारा अव्ययो के निरूपण का मूल आधार स्वरव्यव- स्था थी जो उस समय लोक और वेद दोनो मे समानरूप से व्याप्त थी । अद्यत्वे स्वरव्यवस्था लोक मे सर्वथा उठ चुकी है अतः इन लौकिक अव्ययो मे कौन संयुक्त और कौन एक अव्यय है—यह निर्देश करना एक दुष्कर कार्य है ।
अव्यय-प्रकरणम् ५५३ मा कृणु देवेषुच शूद्रं उतार्ये (अथर्व० १६.६२.१). मुझे देवताओं का प्यारा बना, शूद्र और आर्य का भी । ३. श्लोक के अन्त में पादपूर्त्यर्थ—धर्मे नष्टे कुलं कृत्स्नम- धर्मोऽभिभवत्युत (गीता० १.४०) । (१८) किम्* = १. क्यों, क्या । किं बद्धः सरितां नाथः क्लेशिताः किं वनौ- कसः। त्यक्तव्या यदि वैदेही किं हतो दशकन्धरः (रामचरित० ४० ६३), यदि मुझे सीता का त्याग ही करना था तो समुद्र को क्यों बांधा, वनवासी वानरों को क्यों क्लेश दिया, रावण को क्यों मारा ? । न जाने संसारः किममृतमयः किं विषममयः (वैराग्य० ८६) । २. कुत्सा, निन्दा अर्थ मे—स किंसखा साधु न शास्ति योऽधिपम् (किरात० १.५), वह कुत्सित मित्र है जो राजा को ठीक सलाह नही देता । (१९) किमुत* = कहना ही क्या । ऋषिप्रभावान्मयि नान्तकोऽपि प्रभुः प्रहर्तुं किमुतान्यहिंस्राः (रघु० २.६२), ऋषि के प्रभाव से मुझ पर यम भी प्रहार नहीं कर सकता दूसरे हिंसक जीवों का तो कहना ही क्या ? (२०) किमु* = १. कहना ही क्या । यौवनं धनसम्पत्तिःप्रभुत्वमविवेकिता । एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम् (हितोप० प्रस्तावना) । २. अथवा क्या—किमु विषविसर्पः किमु मदः (उत्तरराम० १.३५) । ३. क्या—प्रियसुहृत्सार्थः किमु त्यज्यते (आटे०) । (२१) किमिति* = किस कारण से, किस लिये—किमित्यपास्याभरणानि यौवने धृतं त्वया वार्धकशोभि वल्कलम् (कुमार० ५.४४)। तत् किमित्युदासते भरताः (मालती० १), तो नटवर्ग क्यों उदास है ? (२२) किमिव* = क्या (इव वाक्यालंकार में है)—किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाऽऽकृतीनाम् (शाकुन्तल० १.१८) । स्पृशन्त्यास्तारुण्यं किमिव न हि रम्यं मृगदृशः (शृङ्गार० ६) । (२३) किमपि* = १. कुछ अनिर्वाच्य—किमपि कमनीयं वपुरिदम् (शाकुन्तल० ३.७), यह शरीर इतना सुन्दर है कि बखान नहीं किया जा सकता । २. कुछ—जानन्ति ते किमपि तान् प्रति नैष यत्नः (मालती० १.८)। (२४) प्रत्युत* = के विपरीत, उल्टा—कृतमपि महोपकारं पय इव पीत्वा निराशङ्कः । प्रत्युत हन्तुं यतते काकोदरसोदरः खलो जगति (भामिनी० १.७५), किये हुए महोपकार को दूध की तरह पी कर निःशङ्क हुआ दुर्जन सांप की तरह उल्टा मारने को दौड़ता है । विषादे कर्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम् (वैराग्य० ५८), दुःख प्रकट करना चाहिये पर मूढ़ लोग इस के विपरीत प्रसन्नता प्रकट करते हैं। (२५) अकाण्डे* = अचिन्तित रूप से, अचानक—दर्भाङ्कुरेण चरणः क्षत इत्यकाण्डे तन्वी स्थिता कतिचिदेव पदानि गत्वा (शाकुन्तल० २.१३); कुछ कदम चल कर वह सुन्दरी कुशाङ्कुर से पांव छिल गया है इस का बहाना कर अचानक रुक गई । (२६-२७) चित्*, चन* । ये दोनों निपात प्रायः किसी भी विभक्त्यन्त या
५५४ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् प्रत्ययान्त किम् शब्द के अन्त में जुड़ कर असाकल्य या अनिश्चितता को प्रकट करते हैं। यथा—कश्चित् (कोई), काचित्, किञ्चित्, केनचित्, कस्मैचित्, कस्मिंश्चित्, क्वचित्, कुत्रचित्, कथञ्चित्, कदाचित्, कुतश्चित् । इसी प्रकार—कश्चन, काचन, केचन, कदाचन आदि । उदाहरण यथा—न कश्चित् कस्यचिन्मित्रं न कश्चित् कस्य- चिद्रिपु । व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा (हितोप० १७१) । नाऽपृष्टः कस्यचिद् ब्रूयात् (मनु० २.११०) । कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति(देवी- क्षमा० १)। कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता० २.४७)। यदा किञ्चिज्ज्ञो- ऽहं द्विप इव मदान्ध समभवम् (नीति० ७) । (२८) अमा=अमा सह समीपे च इत्यमर । साथ या समीप—अमा (सह) वसन्तश्चन्द्राकौं अस्यां साऽमावस्या । अमा (राज्ञ समीपे) वर्तत इत्यमात्य । वेद में इस के गृह आदि अन्य अर्थ भी होते हैं । (२६) आहो*= अथवा, या—वैखानस किमनया व्रतमाप्रदानाद् व्यापाररोधि मदनस्य निषेवितव्यम् । अत्यन्तमेव सदृशेक्षणवल्लभाभिराहो निवत्स्यति समं हरिणा- ङ्गनाभि.(शाकुन्तल० १.२४) । दारत्यागी भवाम्याहो परस्त्रीस्पर्शपांसुल (शाकुन्तल० ५.२६) । (३०) उताहो*= अथवा, या—उताहो हतवीर्यास्ते बभूवु पृथिवीक्षितः (रामायण० ७.३१.४) । कच्चित् त्वमसि मानुषी उताहो सुराङ्गना (व्या० च०) । (३१) स्वित् = वितर्क मे—दनुज. स्विदय क्षपाचरो वा वनजेनेति बल बलास्ति सत्त्वे (किरात० १३.८), क्या यह दानव हो सकता है या राक्षस ? क्योकि जगली प्राणी मे तो इतना बल नही हो सकता । तपोबलेनैष विधाय भूयसीस्तनूरदूर्ध्वा स्विदिषून् निरस्यति (किरात० १४.६०), क्या यह तपस्वी अपने तपोबल से अनेक शरीरो को रच कर बाण छोड़ रहा है ? । किम् (सर्वनाम न कि अव्यय) शब्द के साथ जुड़ कर वितर्कपूर्वक जिज्ञासा मे—कास्विदयमवगुण्ठनवती (शाकुन्तल० ५.१३), यह घूंघट वाली स्त्री कौन हो सकती है ? । किम्+स्वित्=केवल प्रश्न में—कस्य- स्विद् हृदय नास्ति कस्विद्वेगेन वर्धते । अश्ममो हृदय नास्ति नदी वेगेन वर्धते ॥ किँस्विद् गुरुतर भूमे. किँस्विदुच्चतर च खात् । माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतर- स्तथा ॥ महाभारतवनपर्वस्य यक्षोपाख्यान मे इस के बहुत सुन्दर उदाहरण हैं। इन स्थानो पर 'किस्स्वित्' का अर्थ 'कौन सी वस्तु' है। (३२) आहोस्वित्*= अथवा—आहोस्वित् प्रसवो ममापचरितैर्विष्टम्भितो वीरुधाम् (शाकुन्तल० ५.६), अथवा मेरे पापो के कारण पौधो मे पुष्पादिका आना रुक गया है। (३३) अतीव*= बहुत ही, अत्यन्त । भक्तास्तेऽतीव मे प्रिया (गीता० २.२०) । यतीव खलु ते कान्ता वसुधा वसुधाधिप । गतासुरपि यां गात्रैर्मा विहाय निषेवसे (रामायण० ४.२०.६), तारा अपने पति की मृत्यु पर विलाप करती हुई कहती है—हे राजन् ! निश्चय से तुम्हे वसुधा मेरे से भी अधिक प्यारी है जो तुम
मुझे छोड़ कर मर कर भी इस से लिपटे हुए हो। त्वञ्चातीव दुर्गतस्तेन तत्तुन्यं दातुं सयत्नोऽहम् (हितोप० १)। (३४) बत* = १. सम्बोधन में—वत वितरत तोयं तोयवाहा नितान्तम् (गणरत्न०), ऐ बादलो खूब पानी वरसाओ। त्यजत मानमलं बत विग्रहैर्न पुनरेति गतं चतुरं वयः (रघु० ६.४७), हे ललनाओ ! मान का त्याग कर दो, कलह करना छोड़ दो, उपभोगयोग्य यह जवानी फिर वापस नहीं आती। २. खेद या दुःख प्रकट करने में—अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् (गीता० १.४५), आश्चर्य तथा खेद है कि हम इतना बड़ा पाप करने में उद्यत हो रहे हैं। ३. अनुकम्पा प्रकट करने में—क्व बत हरिणकानां जीवितञ्चातिलोलं क्व च निशितनिपाता वज्रसाराः शरास्ते (शाकुन्तल० १.१०), हाय ! कहां तो इन बेचारे हरिणों का अतिचञ्चल जीवन और कहां वज्र की तरह तीक्ष्ण धार वाले तुम्हारे बाण। ४. आश्चर्य प्रकट करने में—अहो बत महच्चित्रम् (कादम्बरी०)। ५. प्रसन्नता या सन्तोष प्रकट करने मे—अपि वतासि स्पृहणीयवीर्यः (कुमार० ३.२०)। (३५) अद्यापि* = आज भी, अब तक भी—अद्यापि नोञ्झति हरः किल कालकूटम् (चौरपञ्चा० ५०)। अद्यापि रत्नाकर एव सिन्धुः (सुभाषित०)। गुरुः खेदं खिन्ने मयि भजति नाद्यापि कुरुषु (वेणी० १.११)। तृष्णे जृम्भसि पापकर्मपिशुने नाद्यापि संतुष्यसि (वैराग्य० २)। (३६) प्रभृति* = तब से ले कर (आज तक)। शैशवात् प्रभृति पोषितां प्रियाम् (उत्तरराम० १.४५)। इस के योग में पञ्चमी का प्रयोग होता है। तद्दिनात् प्रभृति, ततः प्रभृति, अतः प्रभृति, अद्यप्रभृति आदि। इस का विशेष विवेचन (५५२) सूत्रस्थ टिप्पण में देखें। (३७) तु* = १. किन्तु, परन्तु, लेकिन—स सर्वेषां सुखानामान्तं ययौ। एकं तु सुतमुखदर्शनसुखं न लेभे (कादम्बरी०)। मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं न तु गच्छति (हितोप० १.१३३)। इस अर्थ में किम् या परम् के साथ इस का प्रयोग बहुधा देखा जाता है। 'किन्तु' और 'परन्तु' ये निपातसमुदाय 'तु' की तरह अर्थ देते हैं—भाग्येनैतत् सम्भवति किन्त्वस्मिन्नात्मसन्देहे प्रवृत्तिर्न कार्या (हितोप० १)। अवैमि चैनामनघेति किन्तु लोकापवादो बलवान् मतो मे (रघु० १४.४०)¹। २. अवधारण (ही) अर्थ में —भीमस्तु पाण्डवानां रौद्रः (गणरत्न०), भीम ही पाण्डवों में भयङ्कर था। धर्मे स्वीयमनुष्ठानं कस्यचित्तु महात्मनः (हितोप० १.१०३)। स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला (वैराग्य० ५३)। ३. वैपरीत्यप्रतिपादन करने में—अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् (हितोप० १.७०)। १. ध्यान रहे कि 'तु' का वाक्य के आदि में प्रयोग नहीं होता लेकिन 'किन्तु' 'परन्तु' का हो सकता है—किन्तु वध्वां तवैतस्यामदृष्टसदृशप्रजम्। न मामवति सद्वीपा रत्नसूरपि मेदिनी (रघु० १.६५)।
५५६ भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् मृद्घटवत् सुखभेद्यो दुःसन्धानश्च दुर्जनो भवति। सुजनस्तु कनकघटवद् दुर्भेद्यश्चाशु सन्धेय (हितोप० १।६२)। ३ विशेषता या उच्चता प्रतिपादन करने में—मिष्टं पयो मिष्टतरं तु दुग्धम् (गणरत्न०), पानी मीठा होता है पर दूध उस से अधिक मीठा होता है। सकृदङ्गु ल्यग्रावाप्तावन्तिमस्तु पदे पदे (हितोप० प्रस्तावना १३)। ४ हेतु (क्योंकि)—वृद्धानां वचनं ग्राह्यमापत्काले ह्युपस्थिते। सर्वत्रैव विचारे तु भोजनेऽप्यप्र- वर्तनम् (हितोप० १।२३)। हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् (गीता० २।५)। ५ और अब (दूसरी तरफ)—अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम (गीता० १।७)। सुखं त्विदानीं त्रिविधं शृणु मे भरतर्षभ (गीता० १८।३६)। ६ पादपूर्ति के लिये—अर्थेन तु विहीनस्य पुरुषस्याल्पमेधसः। क्रिया सर्वा विनश्यन्ति ग्रीष्मे कुसरितो यथा (हितोप० १।१२५)। (३८) ननु*। १ अवधारण (निश्चय ही, वस्तुत, सचमुच)—ननु प्रवातेऽपि निष्कम्पा गिरय (शाकुन्तल० ६), तूफान में भी निश्चय ही पर्वत निश्चल रहते हैं। ननु वज्रिण एव वीर्यमेतद् विजयन्ते द्विषतो यदस्य पक्षा (विक्रमो० १।१७), वस्तुत यह इन्द्र का ही बल है जो उस के पक्षपाती शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हैं। मन्नि- न्दया यदि जनः परितोषमेति नन्वप्रयत्नसुलभोऽयमनुग्रहो मे (शान्तिशतक), मेरी निन्दा में यदि लोग प्रसन्न होते हैं तो यह निश्चय ही मुझे बिना यत्न उन का अनुग्रह प्राप्त हो रहा है। ननु वक्तृविशेषनिःस्पृहा गुणगृह्या वचने विपश्चितः (किरात० २।५), सच- मुच भाषण के विषय में गुणग्राही विद्वज्जन वक्ता की ओर ध्यान नहीं दिया करते वे तो भाषण की सारसारता को ही देखा करते हैं। २ सम्बोधन—ननु मूर्खा पठितमेव युष्माभिस्तत्काण्डे (उत्तरराम० ४), ऐ मूर्खो ! उस काण्ड में यह विषय तो तुम पढ़ ही चुके हो। ३ प्रार्थना, याचना—ननु मां प्रापय पत्युरन्तिकम् (कुमार० ४।३२), कृपया मुझे मेरे पति के पास पहुँचा दो। ४ पूछताछ (Enquiry) करने में— ननु समाप्तकृत्यो गौतम (मालविका० ४), क्या गौतम ने अपना काम समाप्त कर लिया है ?। परवर्त्ती भारतीय तर्क शैली में प्राय 'ननु' से ही शङ्का का आरम्भ किया जाता है। (३६) हि*। १ केवल, सिर्फ—धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभि समाना (हितोप० १।२६)। मूढो हि मदनेनायास्यते (कादम्बरी०)। २. हेत्वर्थ में (क्योंकि)—अग्निरिहास्ति धूमो हि दृश्यते (गणरत्न०)। जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च (गीता० २।२७), हि=यतः। ३ अवधारण (ही, वस्तुतः, निश्चय से आदि)—न हि सुशिक्षितोऽपि वटुः म्वस्कन्धमारोढुं पटु (नीतिश० २२०)। देव प्रयोगप्रधानं हि नाट्यशास्त्रं किमत्र वाग्व्यवहारेण (मालविका० १)। प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् (नीति० ५२)। ४ उदाहरण प्रदर्शन करन में— प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो वलिमग्रहीत्। सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः (रघु० १।१८)। ५ पादपूर्ति या वाक्यालङ्कार के लिये—भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि (गीता० १.११)। 'हि' का वाक्य के आदि में प्रयोग नहीं होता।
अव्यय-प्रकरणम् . ५५७ (४०) नाम* । १. नामक, नाम वाला, नाम से प्रसिद्ध - अस्ति दाक्षिणात्ये जनपदे महिलारोप्यं नाम नगरम् (पञ्च० १) । अस्ति मगधदेशे चम्पकवती नाम अरण्यानी (हितोप० १) । अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः (कुमार० १.१) । २. वस्तुतः - वीणा हि नाम असमुद्रोत्थितं हि रत्नम् (मृच्छ० ३), वीणा वस्तुतः एक ऐसा रत्न है जो समुद्र से उत्पन्न नहीं हुआ । विनीतवेषेण प्रवेष्ट- व्यानितपोवनानि नाम (शाकुन्तल० १), वस्तुतः तपोवन में विनीतवेष से प्रवेश करना चाहिये । तन्नाम निष्ठुराः पुरुषाः (मृच्छ० ५.३२), वस्तुतः पुरुष कठोर होते हैं । ३. सम्भावना - को नाम राज्ञां प्रियः (पञ्च० १.१५६) राजाओं का कौन प्यारा हो सकता है ? को नाम पाकाभिमुखस्य जन्तुर्द्वाराणि दैवस्य पिधातुमीष्टे (उत्तरराम० ७.४), जब दैव फल देने को उद्यत हो तो भला कौन पुरुष उस के द्वार बन्द कर सकता है ? अतनुषु विभवेषु ज्ञातयः सन्तु नाम (शाकुन्तल० ५.८), धन के आधिक्य में बन्धुओं के बन जाने की सम्भावना है । अये पदशब्द इव, मा नाम रक्षिणः (मृच्छ० ३), अरे पांव की आहट सुनाई दे रही है । मेरे विचार में रक्षी का शब्द न होगा । ४. अपमानाश्रित क्रोध प्रकट करने में - ममापि नाम दशाननस्य परैः परिभवः (गण- रत्न०), क्या शत्रुओं द्वारा मुझ रावण का भी तिरस्कार ! । ममापि नाम सत्त्वैरभि- सूयन्ते गृहाः (शाकुन्तल० ६), क्या हमारे भवनों पर भी भूतों द्वारा आक्रमण किया जा रहा है ? ५. मिथ्या-छल-कपट प्रकट करने में - परिश्रमं नाम विनीय च क्षणम् (कुमार० ५.३२), क्षण भर थकावट को दूर करने का बहाना कर के । कार्तान्तिको नाम भूत्वा (दशकु०), कपट से ज्योतिषी बन कर । ६. आश्चर्य में - आश्चर्यमन्धो नाम पर्वतमRolesष्यति (काशिका ३.३.१५१), आश्चर्य है कि अन्धा होता हुआ भी पहाड़ पर चढ़ रहा है । आश्चर्यं बधिरो नाम व्याकरणमध्येष्यते (काशिका ३.३.- १५१) । आश्चर्यं यदि मूको नामाधीयीत (सि० कौ०) । ऐसे स्थलों पर शेषे लृड्यदौ (३.३.१५१) सूत्र से लूँट् का प्रयोग होता है । परन्तु 'यदि' शब्द का भी साथ में प्रयोग हो तो लिँङ् ही होता है । (४१) इव* । १. सादृश्य (के समान, की तरह) - छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् (रघु० २.६), छाया के समान राजा दिलीप उस नन्दिनी का अनुसरण करता था । असत्पुरुषसेवेव दृष्टिविफलतां गता (मृच्छ० १.३४), दुर्जन पुरुष की सेवा के समान दृष्टि अन्धकार में व्यर्थ अर्थात् असफल हो रही है । शुनः पुच्छमिव व्यर्थं जीवितं विद्यया विना (चाणक्य०), विद्या के बिना मनुष्य का जीवन कुत्ते की पूंछ की तरह व्यर्थ है । २. उत्प्रेक्षा (जैसा कि, मानो) - साक्षात् पश्यासीव पिनाकिनम् (शाकुन्तल० १.६), जैसा कि मानो मैं साक्षात् शिव को देख रहा हूं। वर्षतीवाञ्जनं नभः (मृच्छ० १.३४), आकाश मानो सुरमा बरसा रहा है । ३. स्वल्प - कडार इवायम् (गणरत्न०), यह कुछ कुछ पीला है । ४. वाक्यालंकार - कथमिवैतद्भविष्यति (गणरत्न०) । (४२) इति* । १. समाप्ति अर्थ में - इति रघुवंशे प्रथमः सर्गः । २. हेत्वर्थ में - वैदेशिकोऽस्मीति पृच्छामि (उत्तरराम० १), मैं विदेशी हूं इसलिये पूछ रहा हूं ।
५५८ भैमोव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् पुराणमित्येव न साधु सर्वम् (मालविका० १.२), पुराना है इसलिये सब ठीक नहीं होता। हन्तीति पलायते (नि० कौ०), मारता है इसलिये भागता है। अयं रत्नाकरोऽ- म्भोधिस्त्यिसेवि धनाशया । धन दूरेऽस्तु वदनमपूरि क्षारवारिभिः (साहित्य०)। शरीरस्य विनाशो मा भूदिति भयेदमुक्तिक्षप्य समानीतम् (कादम्बरी०) । ३ पूर्वोक्त या कथित के निर्देश में - इत्यममुं विलपन्तममुञ्चद् दीनदयालुतयाऽवनिपालः । रूपम- दर्शि धृतोऽसि यदर्थं गच्छ यथेच्छमयेत्यभिधाय (नैषध० १.१४३) । इत्युक्तवन्तं परिरभ्य दोर्भ्याम् (किरात० ११.८०) । ज्ञास्यसि कियद्भुजो मे रक्षति मौर्वीकिणाङ्क इति (शाकुन्त० १.१३) । ४ शब्दानिर्देश में-- सख्यशिश्वीति भाषायाम् (४.१.६२) । विदाङ्कुर्वन्वित्यन्यतरस्याम् (५७०) । अहो, अयो इति निपातेषु पठितौ। अमरा निर्जरा देवा इत्यमरः । ५ वक्ष्यमाण के निर्देश में - रामाभिधानो हरिरित्युवाच (रघु० १३.१) राम ने वक्ष्यमाण प्रकारेण वचन कहे । ६ के विषय में, के सम्बन्ध में - शीघ्रमिति सुकरं निभृतमिति चिन्तनीयम् (शाकुन्त० ३), जहां तक शीघ्रता का सम्बन्ध है वह आसान है पर जहां गुप्तरूप का सम्बन्ध है वह चिन्तनीय है। ७ विवक्षा में - तदस्यास्त्यस्मिन्निति मतुप् (११८१), वह उस का है अथवा उस में है ऐसी विवक्षा होने पर प्रथमान्त समर्थ से मतुँप् प्रत्यय होता है। (४३) दिष्ट्या * । हर्ष का विषय, आनन्द का विषय, सौभाग्य - दिष्ट्या प्रतिहतममङ्गलम् (मालती० ४), हर्ष का विषय है कि अमङ्गल नष्ट हो गया है । दिष्ट्या धर्मपत्नीसमागमेन पुत्रमुखदर्शनेन चाऽऽयुष्मान् वर्धते (शाकुन्तल० ७) । दिष्ट्या सोऽयं महाबाहुरञ्जनानन्दवर्धनः । यस्य वीर्येण कृतिनो वय च भुवनानि च (उत्तरराम० १.३२) । यह विभक्तिप्रतिरूपक निपात है। (४४) नु* । १ सन्देहमिश्रित प्रश्न में - स्वप्नो नु माया नु मतिभ्रमो नु (शाकुन्तल० ६.१०), क्या यह स्वप्न था या कोई माया अथवा बुद्धि का व्यामोह ही था ? इस का 'किम्' शब्द या किम्शब्दोत्पन्न कथम्, क्व आदि शब्दो के साथ बहुधा प्रयोग उपलब्ध होता है । तब 'क्या' के साथ 'सम्भवतः' या 'वस्तुत' का भाव भी जुड़ा रहता है-ततो दुःखतरं नु किम् ? (गीता० २.३३), वस्तुत इस से अधिक और क्या दुख हो सकता है । क्व नु गुणवद् विन्देयं कलत्रम् (दशकु०), गुणवती भार्या को पाना कैसे मेरे लिये सम्भव हो सकेगा ? (४५-४६) यद्, तद् । चूंकि - इसलिये । यदचेतनोऽपि पादैः स्पृष्टः प्रज्व- लति सवितुरिनकान्तः । तत्तेजस्वी पुरुषः परकृतनिकृति कथं सहते (नीति० २६) । चूंकि अचेतन सूर्यकान्त भी सूर्य के पादों (किरणों) से छुआ हुआ जलने लग जाता है इसी कारण तेजस्वी पुरुष दूसरों के किये तिरस्कार को कैसे सह सकता है ? केवल 'यद्' का भी बहुत प्रयोग देखा जाता है - किं शेषस्य भरव्यथा न वपुषि क्ष्मा न क्षिपत्येष यत् (मुद्रा० २.१८), क्या शेषनाग के शरीर में भारजनित पीड़ा नहीं होती जो वह पृथ्वी को फेंक नहीं देता ।
अव्यय-प्रकरणम् ५५६ (४७) यदपि = यद्यपि । वक्रः पन्था यदपि भवतः प्रस्थितस्योत्तरास्याम् (मेघ० १.२७) । (४८-४६) ते, मे । ये दोनों विभक्तिप्रतिरूपक निपात हैं जो क्रमशः 'त्वया' और 'मया' के अर्थों में प्रयुक्त होते हैं । श्रुतं ते वचनं तस्य (वामनवृत्ति ५.२.१०), त्वया तस्य वचनं श्रुतमित्यर्थः । वेदानधीत इति नाधिगतं पुरा मे (वही, ५.२.१०), मे = मया । बिलस्य वाणी न कदापि मे श्रुता (पञ्च० ३.२१२), मया न श्रुतेत्यर्थः । श्रुतं ते राजशार्दूल । श्रुतं मे भरतर्षभ (गणरत्न०) । वामन ने अपने सूत्रों में भी इन को निपात माना है—ते-मे-शब्दौ निपातेषु (वामनसूत्र० ५.२.१०) । (५०) मम = मेरा । इसे निपात मान कर 'ममत्व, ममता, निर्मम' आदि शब्द सिद्ध होते हैं - क्षुद्रेऽपि नूनं शरणं प्रपन्ने ममत्वमुच्चैः शिरसां सतीव (कुमार० १.१२), ममशब्दात् त्वप्रत्यय इति मल्लिनाथः । ममेति षष्ठ्यन्तप्रतिरूपको निपात इति वल्लभः । (५१) वाम् = तुम दोनों । इसे भी कई वैयाकरण विभक्तिप्रतिरूपक निपात मानते हैं । गेये केन विनीतौ वाम् (रघु० १५.६६), वाम् = युवाम् इत्यर्थः । प्रथमा के द्विवचन में 'वाम्' दुर्लभ है अतः इसे निपात माना है। (५२) अस्तु = १. स्वीकृति—एवमस्तु को नाम दोषः (गणरत्न०) । अस्तु- द्वारः = 'अस्तु' करने वाला । अस्तोश्चेति वक्तव्यम् इति वार्तिकेन मुँम् । अस्विति तिङन्तप्रतिरूपकमव्ययम् इति तत्त्वबोधिनी । २. असूया (क्रोध) - अस्तु ज्ञास्यसि कालेन सोऽल्पेनेव न भूयसा (मूलं मृग्यम्) । ३. पीड़ा (दुःख) - अस्तु नाम विधुरेण वेधसा साधुरप्यलमुपाधिभिर्भृशम् । बाध्यते- (मूलं मृग्यम्), दुःख का विषय है कि प्रतिकूल दैव सज्जन को भी नाना छलों से बहुत दुःखी करता है । ४, निषेध- अस्तु साम्ना (गणरत्न०), अब सामप्रयोग (शान्त्युपाय) को रहने दो इस से कुछ सिद्ध न होगा । (५३) नास्ति = अविद्यमान । यह भी तिङन्तप्रतिरूपक निपात है। इसी से 'नास्तिकः, नास्तिवादः, नास्तिक्यम्, नास्तिक्षीरा' प्रभृति शब्द सिद्ध होते हैं। देखें पाणिनिसूत्र-अस्ति-नास्ति-दिष्टं मतिः (४.४.६०) । (५४) येन = जिस से । वितर गिरमुदारां येन मूकाः पिकाः स्युः (गणरत्न०), ऐसी वाणी बोलो जिस से कोयलें चुप हो जायें । (५५) तेन = इस से, इस कारण से । अपराधोऽहमत्रभवत्सु, न च मर्षितः, तेन तप्ये नितान्तम् (न्या० च०) । येन दाता तेन श्लाघ्यः (गणरत्न०)। (५६) अकस्मात्* = अचानक, एकदम, विना कारण के । इक्ष्वाकुवंशप्रभवः कथं त्वां त्यजेदकस्मात् पतिरार्यवृत्तः (रघु० १४.५५) । नाऽकस्माच्छाण्डिली मातर्विक्री- णाति तिलैस्तिलान् (पञ्च० २.७२)। अकस्माद्भवः-आकस्मिकः । (५७) प्रसह्य* = बलपूर्वक, जबरदस्ती । प्रसह्य मणिमुद्धरेद् मकरवक्त्रदंष्ट्रान्त- रात् (नीति० ३) । प्रसह्य सिंहः किल तां चकर्ष (रघु० २.२७) । प्रसह्य वित्तानि
५६० भैमीव्याख्योपेतायां लघुसिद्धान्तकौमुद्याम् हरन्ति चोरा (हेमचन्द्र)। इसी से ही 'प्रसह्यकारी, प्रसह्याहरणम्' आदि शब्द बनते हैं। (५८) अह्नाय शीघ्र, फौरन। अह्नाय तावदहनेन तमो निरस्तम् (रघु० ५।७१)। (५९) व — सदृश। मणीव उष्ट्रस्य लम्बेते प्रियो वत्सतरी मम (महाभारत १२ ।७२।१२)। अत्र तु इवार्थे वशब्दो वाशब्दो वा बोध्य —सि० कौ०। (६०) समन्तात्* = चारों ओर¹। हेमचन्द्र ने इसे विभक्तिप्रतिरूपक निपात माना है। लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्तात् (गीता० ११।३०)। कालागुरूद्गर्हनमध्यगत समन्तात् लोकोत्तर परिमलं प्रकटीकरोति (भामिनी० १।६६)। (६१) भवतु अलम् (बम निषेध) का अर्थ। गोत्रेण पुष्करावर्त्त ! किं त्वया गर्जितं कृतम्। विद्युताऽत्र भवत्वङ्गिहिंसा ऊर्द्धबिलं घनम् (दृष्टा०)। (६२) बलवत् पूरी तरह से, पूर्णरूपेण। बलवदपि शिक्षितानामात्मन्यप्रत्ययं चेत (शाकुन्त० १।२)। पुनर्बशित्वाद् बलवन्निगृह्य (कुमार० ३ ६६)। (६३) तदपि — तो भी। तदपि तव गुणानामीश पारं न याति (शिवमहिम्न स्तोत्र)। (६४) यस्मात् = जिस कारण से, क्योकि। अवजानासि मां यस्मादतस्ते न भविष्यति। मत्प्रसूतिमणाराध्य प्रजेति त्वां शशाप सा (रघु० १ ।७७)। (६५) तस्मात् — इसलिये। तस्माद् युध्यस्व भारत (गीता० २ १८)। (६६) या (स्)। १ स्मरण में—आ, उपनयतु भवान् भूर्जपत्रम् (विक्रमो० २)। २ क्रोध प्रकट करने में—आ कथमद्यापि राक्षसत्रास (उत्तरराम० १)। आ पापे तिष्ठ तिष्ठ (मालती० ८)। ३ क्रोधपूर्वक अपाकरण में—आ क एष मयि स्थिते चन्द्रमभिभवितुमिच्छति बलात् (मुद्रा० १)। आ ! धूयामङ्गलपाठक (वेणी० १)। ४ सन्ताप (दुःख) प्रकट करने में—विद्यामातरमा प्रदर्श्य नृपशून् भिक्षामहे निस्त्रपा (उद्भट)। (आ स्मरणेऽपाकरणे कोपसन्तापयोस्तथा—इति मेदिनी)। (६७) ही। विस्मय म—हतविधिलसितानां ही विचित्रो विपाक (माघ० ११।६४), आश्चर्य है कि अभाग विधाता की चेष्टाआ का विचित्र फल है। (६८) वै* = अवधारण (ही)—पिता वै गार्हपत्योऽग्नि (मनु० २ ।२३१)। आपो वै नरसूनवः (मनु० १ ।१०)। आत्मा वै पुत्रनामासि (कौषी० ब्रा० २ ।१६)। (६९) किञ्च* = और भी, इसके व्यतिरिक्त, पुनः। किञ्च सर्वगुणसम्पन्नोऽपि भेदेन बध्यते (पञ्च० ४)। किञ्च काव्यस्योपादेयत्वमग्निपुराणेऽप्युक्तम् (साहित्य० १)। किञ्च काव्याद् धर्मप्राप्तिर्भगवान्नारायणचरणारविन्दवन्दनादिना (साहित्य० १)। (७०) यदि* = अगर (पक्षान्तर) —यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोष १ इसी अर्थ में 'समन्ततः' अव्यय भी बहुत प्रसिद्ध है। यथा—मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः (गीता० ६ २४)। समन्ततस्तु परितः सर्वतो विश्वगित्यपि-- इत्यमरः। समन्तादिति समन्ततः आद्यादित्वात्तसिरित्यमरव्याख्यायां नानूजि- दीक्षितः।
अव्यय-प्रकरणम् ५६१ (पञ्च० २.१३८) । नोलूकोऽप्यवलोकते यदि दिवा सूर्यस्य किं दूषणम् (नीति० ६३)। (७१) यद्यपि = अगरचे, यद्यपि — यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः (गीता० १.३७)। यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम् । स्वजनः श्वजनो मा भूत्सकलं शकलं सकृच्छकृत् (सुभाषित०)। (७२) यद्वा* = अथवा । यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः (गीता० २.६) । (७३) यदि वा* = अथवा । स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि । आराधनाय लोकानां मुञ्चतो नास्ति मे व्यथा (उत्तरराम० १.१२) । (७४) अथवा* । १. 'वा' के अर्थ में—व्यवहारं परिज्ञाय वध्यः पूज्योऽथवा भवेत् (हितोप० १.५८)। २. पक्षान्तर में—अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन् पूर्वसूरिभिः (रघु० १.४) । (७५) वारं वारम्* = बारंबार—मनसि विचारय वारं वारम् (चर्पट० ११)। (७६) प्रेत्य । १. परलोक—अन्यो धनं प्रेत्यगतस्य भुङ्क्ते (गणरत्न०)। २. इस संसार से गया हुआ—प्रेत्यभावः, प्रेत्यलोकः । प्रेत्यामुत्र भवान्तरे इत्यमरः । (७७) पुरतः (स्)* = सामने, आगे । यं यं पश्यसि तस्य तस्य पुरतो मा ब्रूहि दीनं वचः (नीति०)। स्यात्पुरः पुरतोऽग्रतः—इत्यमरः । (७८) प्रायेण* = प्रायः, अक्सर, बहुधा । प्रायेणाऽधममध्यमोत्तमगुणः संवासतो जायते (पञ्च० १.२७३) । प्रायेण नीचा व्यसनेषु मग्ना निन्दन्ति दैवं न तु दुष्कृतं स्वम् (महाभारत० ८.६१.१) । वामन शिवराम आप्टे आदि कोषकारों ने इसे अव्यय माना है। परन्तु अनेक वैयाकरण 'प्राय' (पुं०) शब्द से प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम् (वा०) द्वारा तृतीया विभक्ति हुई मान कर इसे अव्यय नहीं मानते । (७६) प्रायशः (स्)* = प्रायः, अक्सर, बहुधा । आशाबन्धः कुसुमसदृशं प्रायशो ह्यङ्गनानां सद्यःपाति प्रणयि हृदयं विप्रयोगे रुणद्धि (मेघ० १.१०) । इसे तद्धितशस्-प्रत्ययान्त माना जा सकता है। तब तद्धितश्चासर्वविभक्तिः (३६८) से अव्यय- संज्ञा हो जायेगी । (८०) वस्तुतः (स्)* = यथार्थतः, दर असल, हकीकत में, सत्यतः, मूलतः— वस्तुतः लृकारस्य ऋकारग्राहकत्वं न कुत्राप्युपलभ्यते (तत्त्वबोधिनी संज्ञाप्रकरण) । (८१) अथ किम्* = जी हां । सर्वथा अप्सरःसम्भवैषा । अथ किम् (शाकुन्तल० १)। अपि वृषलमनुरक्ताः प्रकृतयः ? अथ किम् (मुद्रा० १)। (८२) अन्वक् = पीछे । तां देवतापितॄतिथिक्रियार्थामन्वग्ययौ मध्यमलोकपालः (रघु० २.१६)। अन्वगन्वक्षमनुगेऽनुपदं क्लीबमव्ययम्—इत्यमरः । (८३) अपि वा* = अथवा । हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धिः श्यामिकापि वा (रघु० १.१०)। (८४) कस्मात्* = क्यों, किस कारण, किस लिये । अचेतनं नाम गुणं न लक्षयेन्मयैव कस्मादवधीरिता प्रिया (शाकुन्तल० ६.१३) । इस विभक्तिप्रतिरूपक ल० प्र० (३६)