भारतकोश
लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

लघुसिद्धान्तकौमुदी (वरदराजाचार्य - भैमी एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या सहित)

Laghu Siddhanta Kaumudi of Varadaraja with Hindi Commentary

आचार्य वरदराज द्वारा

DevanagariHindipublished633 पृष्ठ

पृष्ठ 570, कुल 633 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 570

मुझे छोड़ कर मर कर भी इस से लिपटे हुए हो। त्वञ्चातीव दुर्गतस्तेन तत्तुन्यं दातुं सयत्नोऽहम् (हितोप० १)। (३४) बत* = १. सम्बोधन में—वत वितरत तोयं तोयवाहा नितान्तम् (गणरत्न०), ऐ बादलो खूब पानी वरसाओ। त्यजत मानमलं बत विग्रहैर्न पुनरेति गतं चतुरं वयः (रघु० ६.४७), हे ललनाओ ! मान का त्याग कर दो, कलह करना छोड़ दो, उपभोगयोग्य यह जवानी फिर वापस नहीं आती। २. खेद या दुःख प्रकट करने में—अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् (गीता० १.४५), आश्चर्य तथा खेद है कि हम इतना बड़ा पाप करने में उद्यत हो रहे हैं। ३. अनुकम्पा प्रकट करने में—क्व बत हरिणकानां जीवितञ्चातिलोलं क्व च निशितनिपाता वज्रसाराः शरास्ते (शाकुन्तल० १.१०), हाय ! कहां तो इन बेचारे हरिणों का अतिचञ्चल जीवन और कहां वज्र की तरह तीक्ष्ण धार वाले तुम्हारे बाण। ४. आश्चर्य प्रकट करने में—अहो बत महच्चित्रम् (कादम्बरी०)। ५. प्रसन्नता या सन्तोष प्रकट करने मे—अपि वतासि स्पृहणीयवीर्यः (कुमार० ३.२०)। (३५) अद्यापि* = आज भी, अब तक भी—अद्यापि नोञ्झति हरः किल कालकूटम् (चौरपञ्चा० ५०)। अद्यापि रत्नाकर एव सिन्धुः (सुभाषित०)। गुरुः खेदं खिन्ने मयि भजति नाद्यापि कुरुषु (वेणी० १.११)। तृष्णे जृम्भसि पापकर्मपिशुने नाद्यापि संतुष्यसि (वैराग्य० २)। (३६) प्रभृति* = तब से ले कर (आज तक)। शैशवात् प्रभृति पोषितां प्रियाम् (उत्तरराम० १.४५)। इस के योग में पञ्चमी का प्रयोग होता है। तद्दिनात् प्रभृति, ततः प्रभृति, अतः प्रभृति, अद्यप्रभृति आदि। इस का विशेष विवेचन (५५२) सूत्रस्थ टिप्पण में देखें। (३७) तु* = १. किन्तु, परन्तु, लेकिन—स सर्वेषां सुखानामान्तं ययौ। एकं तु सुतमुखदर्शनसुखं न लेभे (कादम्बरी०)। मनस्वी म्रियते कामं कार्पण्यं न तु गच्छति (हितोप० १.१३३)। इस अर्थ में किम् या परम् के साथ इस का प्रयोग बहुधा देखा जाता है। 'किन्तु' और 'परन्तु' ये निपातसमुदाय 'तु' की तरह अर्थ देते हैं—भाग्येनैतत् सम्भवति किन्त्वस्मिन्नात्मसन्देहे प्रवृत्तिर्न कार्या (हितोप० १)। अवैमि चैनामनघेति किन्तु लोकापवादो बलवान् मतो मे (रघु० १४.४०)¹। २. अवधारण (ही) अर्थ में —भीमस्तु पाण्डवानां रौद्रः (गणरत्न०), भीम ही पाण्डवों में भयङ्कर था। धर्मे स्वीयमनुष्ठानं कस्यचित्तु महात्मनः (हितोप० १.१०३)। स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला (वैराग्य० ५३)। ३. वैपरीत्यप्रतिपादन करने में—अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम् (हितोप० १.७०)। १. ध्यान रहे कि 'तु' का वाक्य के आदि में प्रयोग नहीं होता लेकिन 'किन्तु' 'परन्तु' का हो सकता है—किन्तु वध्वां तवैतस्यामदृष्टसदृशप्रजम्। न मामवति सद्वीपा रत्नसूरपि मेदिनी (रघु० १.६५)।